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ओ पहाड़, मेरे पहाड़!

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हमारे पहाड़ों में एक चिड़िया होती है जिसका नाम है घुघूती, इसका जिक्र अक्सर किसी ना किसी गीत में सुनने को मिल ही जाता है। बरसों पहले की बात है, ऐसी ही एक घुघूती ने एक दिन अपने पंख फैलाये, मुँह में बासुती का एक तिनका दबाया और उड़ चली मैदानों की ओर एक नई दुनिया तलाशने, एक नया घरोंदा बनाने।

विशाल समुद्र को देख ठीठक कर रूकी और वहीं आशियाना बना डाला, वक्त बीतता गया, नयी दुनिया को जानने, समझने, आशियाना और घर संभालने में वो पहाड़ चुपके से कब बैकग्राउंड में चला गया उस घुघूती को पता नही चला। लेकिन वो पहाड़ निश्चल शांत दिल के अंदर पड़ा रहा, छुटा नही। फिर एक दिन फुरसत के चंद लम्हों में घुघूती को नजर आया वो पहाड़ और उसके नजर आते ही खुल पड़ी यादों की वो गठरी जो ना जाने कब से बंद सी दिल के किसी कोने में पड़ी थी और उस घुघूती का दिल गा उठा - ओ पहाड़, मेरे पहाड़!

ओ पहाड़, मेरे पहाड़,
बुला ले वापिस पहाड़
मन व्याकुल है पाने को
तेरी ठंडी बयार।

तेरे चीड़ और देवदार
दाड़िम,काफल और हिसालू
आड़ू,किलमोड़े और स्ट्रॉबेरी
मन होता है खाने को बारबार।

तेरी साँपों सी वे सड़कें
शेर के मुँह वाले वे नलके
वे चश्मे और वे नौले
वह स्वाद ठंडे मीठे पानी का।

ऊबड़ खाबड़ वे रस्ते
वे चीड़ के पत्तों की फिसलन
वे सीढ़ीदार खेत तेरे
वे खुशबू वाले धान तेरे।

नाक से बालों तक जाते
लम्बे और शुभ टीके
वे गोरी सुन्दर शाहनियाँ
वे सुन्दर भोली सैणियाँ।

स्वस्थ पवन का जोर जहाँ
घुघुती का मार्मिक गीत जहाँ
काफल पाक्यो त्यूल नईं चाख्यो
की होती गूँज जहाँ।

हर पक्षी कितना अपना है
हर पेड़ जहाँ पर अपना है
कभी शान्त तो कभी चट्टानें
बहा लाने वाली तेरी नदियाँ।

वे रंग बिरंगे पत्थर
मन चाहे समेटूँ मैं उनको
हीरे भी मुझे न मोह सकें
पर तेरे पत्थरों पर मोहित हूँ।

वह छोटा सा शिवाला है
वह गोल द्याप्त का मन्दिर है
हर शुभ काम में साथ मेरे
वे गोल देव जो द्याप्त तेरे।

वह चावल पीस एँपण देना
वह गेरू से लीपा द्वार मेरा
चूड़े अखरोट का नाश्ता
वे सिंहल और वे पुए।

पयो भात के संग पालक कापा,
और रसीला रसभात तेरा
बाल मिठाई और चॉकलेट
अब और कहूँगी तो रो दूँगी।

ओ पहाड़, मेरे पहाड़,
सुन ले तू पुकार
मेरे मन की पुकार
ओ पहाड़, मेरे पहाड़!

ये कविता घुघूतीजी ने लिखी है जो घुघूती बासूती के नाम से इसी नाम का ब्लोग चलाती हैं। ये शब्द भले ही उनके हों लेकिन हर उस पहाड़ी के दिल में कभी ना कभी ऐसे ही उद्गार और भावनायें जोर मारती होंगी। पहाड़ के प्रति ये प्यार ही है जो जहाँ देबिया को जिंदा रखे है वहीं घुघूती से भी पहाड़ छूटने के बावजूद कभी ना कभी गीत गवा ही देता है, कविता पढ़कर शायद आप भी कह उठें “घुघूती घुरोण लगी मेरे मैत की“।

शब्दार्थः

शाहनियाँ: शाह स्त्रियाँ, शाह कुमाँऊ(उत्तराखंड का पूर्वी भाग ) के साहूकार लोग होते हैं शायद।
सैणियाँ: स्त्रियाँ
घुघुती: एक पक्षी, देखिए घुघूती बासूती क्या है कौन है?
काफल पाक्यो त्यूल नईं चाख्यो: काफल ( एक फल) पक गया है , तूने नहीं चखा है। पहाड़ में एक पक्षी काफल पाक्यो बोलता है और बच्चे उसको चिढ़ाने को कहते हैं कि तूने नहीं चखा है ।
गोल द्याप्त: गोल देवता, हमारे इष्ट देव।
एँपण: कुँमाऊ में फर्श पर दी जाने वाली रंगोली
चूड़ा: घर में पूरे पकने से पहले कूटकर धान से बनाया हुआ स्वादिष्ट पोहा
सिंहल:पुए जैसा एक कुँमाऊनी पकवान जो हर शुभ काम में बनता है ।
पयो: कुमाँऊनी कढ़ी
कापा: पालक पीस कर बनाई एक विशेष सब्जी
रसभात: एक विशेष तरह का व्यंजन, रसभात वास्तव में रस और भात २ अलग-अलग हैं, भात पके हुए चावल को कहते हैं और रस विभिन्न दाने दार दालों से बना व्यंजन होता है जिसमें दालों को पकाकर फिर अलग कर दिया जाता है और उसे अलग से साईड डिश की तरह खाते हैं और दालों के दानों को अलग करने से बने या बचे रसदार व्यंजन को रस कहते हैं। रस को भात के साथ खाया जाता है इसलिये रसभात कहते हैं। रस उसमें पड़े मसालों और दालों की वजह से ठंडी में गर्मी देता है इसलिये ज्यादातर सर्दियों में बनता है।
बाल मिठाई: खोये की बनी एक कुमाँउनी मिठाई
चॉकलेट: एक मिठाई जो बाल मिठाई जैसी ही होती है । बाल मिठाई के बाहर होम्योपैथिक गोलियों जैसे मीठे दाने लगे होते हैं चॉकलेट के नहीं ।

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