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कुमाऊँनी लोकगीतः ओ भिणा कसके जाणूँ द्वरहटा

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कुमाँऊ का ये एक बहुत प्रसिद्ध लोकगीत है, मुझे याद है बचपन में स्कूल में हमने इस पर डांस भी किया था। ये गीत जीजा साली के बीच हो रहे संवादों से बना है। रानीखेत से आगे एक जगह पड़ती है द्वाराहाट, जहाँ हर साल मेला लगता है (पहले लगता था इसलिये कह सकता हूँ कि अब भी लगता होगा) जो पहले बहुत प्रसिद्ध था।

एक जीजा अपनी साली को इसी मेले में चलने के लिये कह रहा है और साली मेले में ना जाने के एक के बाद एक बहाने बना रही है। मसलन साली का बहाना है पहनने के लिये अच्छे कपड़े नही हैं, जीजा का कहना है वहीं द्वराहाट में दर्जी भी होगा तो वहीं सिला लेंगे। फिर साली कहती है नाक में गहना नही है कैसे जा सकते हैं, जीजा उत्तर देता है कि वहाँ सुनार भी है वहीं बना लेंगे। ऐसे ही साली अलग अलग बहाने बनाती जाती है जीजा प्रति उत्तर देता जाता है। और अंत में साली राजी हो जाती है और दोनों कौतिक यानि मेले के लिये चले जाते हैं।

इस गीत को मैं बहुत समय से ढूँढ रहा था और फिर एक दिन बगैर ढूँढे मिल गया, आजकल विस्तार से लिखने वाले लेखों के लिये वक्त नही मिल पा रहा है। उत्तरांचल में कुछ पोस्ट किये मुद्दत हो गयी तो सोचा आज जीजा साली की ये नोकझोंक ही सुना दी जाय। इस गीत में पुरूष स्वर दिया है हिरदा कुमाऊँनी ने महिला स्वर का अगर आप में से किसी को पता हो जरूर बतायें।

ओ भिणा कसके जाणूँ द्वरहटा” सुनने के लिये प्ले के साईन पर क्लिक करें:

डिस्क्लेमर:उत्तरांचल में पोस्ट होने और बजने वाले गीत सिर्फ कुमाँऊ और गढवाल के संगीत को बढावा देने के लिये विज्ञापन मात्र ही हैं, ये कहीं से भी असली सीडी और कैसेट का विकल्प नही है। पसंद आने पर कृप्या असली कैसेट और सीडी ही खरीदें।

पहाड़ी गीतः पुष्पा छोरी पौड़ीखाल की

 

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