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पिथौरागढ़ः एक शहर जो अब भी याद आता है - ४

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पिथौरागढ़ पर पिछला अंक लिखे जमाना हो गया शायद भूल गये हों बात कहाँ से शुरू करके अंत में कहाँ छोड़ी थी। आज मैं बता रहा हूँ पिथौरागढ़ कैसे पहुँचा जाये और उसके आसपास के दर्शनीय स्थलों के बारे में।

पिथौरागढ़ कैसे पहुँचा जायेः यहाँ या तो टैक्सी से पहुँचा जा सकता है या बस से। नई दिल्ली से सीधी बस सर्विस पिथौरागढ़ के लिये चलती है। अगर ट्रैन से आना चाहें तो दिल्ली से आप हल्द्ववानी या काठगोदाम तक के लिये ट्रैन ले सकते हैं फिर वहाँ से या तो बस या फिर टैक्सी (अगर अकेले हैं तो साझा टैक्सी यानि किसी और के साथ शेयर) से अपना सफर जारी रख सकते हैं। हल्दवानी से बस भवाली, अल्मोड़ा, दन्या और घाट होते हुए जाती है। पहले जब हम लोग पिथौरागढ़ में रहते थे तब दन्या से घाट तक सड़क काफी संकरी होती थी और गेट सिस्टम चलता था यानि की एक वक्त में एक ही तरफ का ट्रैफिक चलता था। ज्यादातर दन्या या घाट में बसें आलू रायता, पकौड़ी चाय आदि के लिये रूकती थीं, अब भी रूकती हैं।

पिछले अंक - भाग 1, भाग 2, भाग 3

पिथौरागढ़ जाने का एक दूसरा रास्ता टनकपुर होते हुए जाता है, ये खासकर पूर्व या लखनऊ की तरफ से आने वालों के लिये आसान या पास पड़ता है। लखनऊ से बरेली पीलीभीत होते हुए टनकपुर तक ट्रैन जाती है और फिर वहाँ से पिथौरागढ़ के लिये बस मिल जाती हैं। मुझे याद है जब मैं छोटा था तब पिथौरागढ़ जाने वाली रोडवेज की बसें ट्रैन स्टेशन के बाहर खड़ी रहती थीं। टनकपुर से बस का रूट चम्पावत, लोहाघाट और घाट होते हुए जाता है, इन जगहों पर बसें आलू रायता, पकौड़ी चाय आदि के लिये रूकती थीं, अब भी रूकती हैं।

पिथौरागढ़ में नैनीसैणी के पास ही एक छोटा सी हवाईपट्टी है लेकिन ये शायद अभी आम पब्लिक के लिये रेगुलर रूप चालू नही हुई है (अगर कोई जानता है कि ये चालू है तो अपडेट कराये)। साथ ही पंतनगर में भी एक छोटा हवाई अड्डा है।

पिथौरागढ़ में दो बस अड्डे हैं (तब थे), एक जिसे उस समय नया बस अड्डा कहते थे क्योंकि वो तब नया नया बना था और दूसरा सिल्थाम में। दिल्ली, लखनऊ, अल्मोड़ा की तरफ से आने वाली गाड़िया (तब) नये बस अड्डे तक (या से) जाती हैं। सिल्थाम से पिथौरागढ़ के दूसरी तरफ जाने वाली गाड़िया मिलती हैं जो मुन्सयारी, डीडीहाट, धारचूला, अस्कोट, गंगोलीहाट की तरफ को जाती हैं।

पिथौरागढ़ में क्या देखें: वैसे तो पूरा पिथौरागढ़ प्राकृतिक सुन्दरता से भरपूर है लेकिन फिर भी कुछ जगहें हैं जो उल्लेखनीय हैं -

भाटकोट (कुछ लोग भटकोट भी कहते हैं): शहर की सीमा से लगी ये जगह सूर्यास्त या सूर्योदय देखने के लिये आदर्श जगह है, ये पुराने जमाने में ईसाई कॉलोनी थी। सिल्थाम से आप जोगिंग या वाकिंग करके यहाँ जा सकते हैं।

चंडाकः ये पिथौरागढ़ से करीब ६-७ किमी दूर है, यहाँ के लिये भी बसें सिल्थाम होते हुए जाती हैं (थीं उस वक्त)। यहाँ से पिथौरागढ़ शहर का मनोहारी दृश्य देखने को मिलता है। चंडाक में एक बहुत पुराना मंदिर है, जिसे मोष्टमानो मंदिर कहते हैं, जहाँ हर साल एक बार (अगस्त में) मेला लगता है। मुझे याद है उन दिनों मंदिर के प्रांगण में एक बहुत बड़ा झूला लगा रहता था, शायद अब भी हो। चंडाल में खड़िया निकालने की खान (फैक्टरी) भी थी।

मंदिरः उत्तराखंड (उत्तारंचल) के हर शहर की तरह यहाँ भी बहुत सारे मंदिर हैं, चाहे वो उल्का देवी का मंदिर हो या हनुमान मंदिर। इन मंदिरों में आप बस से, पैदल और बस और पैदल के कंबीनेशन से पहुँच सकते हैं।

थल केदारः शहर से करीबन १५-१६ किमी दूर स्थित जगह जहाँ शिवरात्री के दिन मेला लगता है। ट्रैकिंग के शौकीन लोगों के लिये एक बहुत खुबसूरत छोटा सा ट्रैक है।

ध्वजः यहाँ भी एक मंदिर है जहाँ हर साल मेला लगता है (था), यहाँ जाने के लिये पहले आपको टैक्सी से और उसके बाद पैदल चलना पड़ता है। ये जगह पिथौरागढ़ शहर से शायद ३० किमी की दूरी पर है, मुझे ऐसा याद है यहाँ भी एक बार मेला लगता है।

गंगोलीहाटः ये एक कस्बा (छोटा शहर) है जो पिथौरागढ़ से लगभग ७५ किमी दूर पड़ता है, इस जगह में आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित शक्तिपीठ है। गंगोलीहाट से लगभग १४-१५ किमी की दूरी पर भगवान शिव का मंदिर है जिसे पाताल भुवनेश्वर के नाम से जाना जाता है जो जमीन के नीचे बनी गुफा में है, उस दौरान वहाँ सरक सरक कर जाना पड़ता था और मंदिर में गुफा के अंदर सिर्फ दिये की रोशनी भर होती थी लेकिन आजकल वहाँ भी बिजली पहुँच चुकी है और सुनने में आया है कि जाने के लिये बनी सुरंग को भी थोड़ा चौड़ा कर दिया गया है। बावजूद इसके यहाँ का भ्रमण अपने आप में अभी भी अनोखा है।

डीडीहाटः एक छोटा से कस्बा है (था), जहाँ से हिमालय काफी पास दिखायी देता है, यहाँ जाने के लिये सिल्थाम से रेगुलर इंटरवल पर बसें मिलती रहती हैं (अब तो टैक्सी भी मिलती होंगी)।

धारचूलाः अगर आप पिथौरागढ़ से नेपाल देखना चाहते हैं तो आपको धारचूला जरूर जाना चाहिये क्योंकि यहाँ से नेपाल एक नदी की दूरी भर है। नदी पार कीजिये और आप नेपाल में। उस दौरान तो नेपाल जाना बहुत आसान था, ऐसे ही जैसे इंडिया के किसी दूसरे शहर में। नदी के एक तरफ धारचूला है जो इंडिया में है, नदी की दूसरी तरफ भी धारचूला है जो नेपाल में है।

झूलाघाटः नेपाल देखने और जाने के लिये जो एक दूसरा शहर है वो है झूलाघाट जो काली नदी के किनारे बसा है। ये शहर पिथौरागढ़ से लगभग ३५ किमी की दूरी पर है।

मुनस्यारीः प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर ये शहर राजमा के लिये मशहूर है, ये भी हिमालय के काफी करीब है। मशहूर ग्लेशियर मिलम ग्लेशियर की ट्रैकिंग जाने वालों का बेस कैंप भी मुनस्यारी ही होता है।

पुन्यागिरी मंदिरः ये एक बहुत प्रसिद्ध मंदिर है जो पिथौरागढ़ से नही बल्कि टनकपुर से ज्यादा पास है। टनकपुर से ये लगभग २० किमी की दूरी पर स्थित है जो एक छोटी चोटी के टॉप पर बना है।

चकौरीः ये छोटा पहाड़ी स्टेशन प्राकृतिक सुन्दरता और ट्रैंकिंग के शौकीनों ने लिये बहुत सही जगह है। यहाँ चाय के बागान भी मिलते हैं। चाय के बगानों के लिये एक दूसरी प्रसिद्ध जगह है बेरीनाग, जहाँ की चाय भी काफी प्रसिद्ध होती है। चकौरी पिथौरागढ़ से ११० प्लस किमी की दूरी पर है।

इसके अलावा कुछ अन्य जगह हैं, जैसे वड्डा जो कि एक आर्मी कैंटोनमेंट है, रामगंगा और सरजू नदी के किनारे बना रामेश्वरघाट (३५ किमी दूर), देवीधूरा जो कि चंपावत (७५ किमी दूर, जो कभी चंद राजाओं की राजधानी होती थी) के पास है और यहाँ का मेला भी प्रसिद्ध है, अस्कोट जिसे चंद राजाओं ने बसाया था जहाँ छोटे मोटे दुर्ग देखने को मिलेंगे, अस्कोट में वाइल्ड लाईप सैक्च्यूरी भी है जो कि स्नो लेपार्ड और मस्क डियर के लिये जानी जाती है (थी)।

क्या खरीदें: मुनस्यारी के राजमा, लोकल बनी खेंचवा और बाल मिठाई, धारचूला के बने कार्पेट जिन्हें दन के नाम से पुकारते हैं, मुनस्यारी के ही बने कंबल जिन्हें थुल्मा कहा जाता है जो कि बहुत गर्म होते हैं।

पिथौरागढ़ की यादें यहीं सिमेटते हैं और अगली बार याद करूँगा उत्तराखंड के ही एक दूसरे खुबसूरत शहर की और आप को रूबरू कराऊँगा उस शहर से।

 

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