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पिथौरागढ़ः एक शहर जो अब भी याद आता है - 2

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पिथौरागढ़ का इतिहास
पिथौरागढ़ का इतिहास काफी पुराना है, पुराने समय में पिथौरागढ़ प्रसिद्ध राजपूत राजा पृथ्वी राज चौहान की राजधानी था, जिन्हें राय पिथौरा के नाम से भी जाना जाता था। इन्हीं के नाम पर शायद उस स्थान का नाम पिथौरागढ़ पड़ा हो।

फिर मुस्लिम आक्रमणकारियों से त्रस्त होकर कुछ लोग जान बचाकर (या उनके आक्रमण से बचकर) वहाँ से भागकर यहाँ उत्तराखंड के इस हिस्से की तरफ आ गये। ऐसा माना जाता है कि राजपूत Settlers जब भी कोई नयी जगह बसते थे तो उस जगह का नाम वो ही रखते थे जहाँ से वो आये होते थे, इसलिये चौहान राजपूतों ने अपने उस शहर के नाम पर ही इस नये स्थान का नाम भी पिथौरागढ़ रखा जो कि आज उत्तराखंड का एक महत्वपूर्ण जिला भी है।

सन् १३६४ के बाद से बाकि बची १४वीं शताब्दी में यहाँ पाल वंशजों का राज रहा जो कि पिथौरागढ़ से अस्कोट तक फैला हुआ था। ऐसा देखने (पढ़ने) में आता है कि पाल राजवंश को नेपाल से आये ब्रहम राजवंश ने यहाँ से उखाड़ फेका था लेकिन फिर क्षेत्रपाल के साथ हुई लड़ाई के दौरान इनके राजा ज्ञानचंद की मृत्यु की वजह से यहाँ एक बार फिर पाल वंशजों का आधिपत्य हो गया।

१६वीं शताब्दी में एक बार फिर चंद राजवंश ने पाल राजवंश को उखाड़ के यहाँ अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया और १७९० में एक पहाडी के ऊपर नये किले का निर्माण किया जहाँ आजकल गर्ल्स इंटर कालेज है।

उसके बाद ब्रितानी (British) साम्राज्य के दौरान ये अल्मोडा़ जिले की एक तहसील रहा फिर १९६० में पिथौरागढ को अलग से एक जिला बना दिया गया। अंग्रेजों के शासन के दौरान ही वहाँ आर्मी कैंट (वड्डा में), चर्च, मिशन स्कूल (सिल्थाम के पास की पहाड़ी में, जहाँ हमने भी २ साल पढ़ाई की थी) और ईसाई धर्म का भी फैलाव (विकसित) हुआ।

आगे जारी…….अगली बार पिथौरागढ़ के मौसम की बात करके इस श्रृंखला को आगे बढ़ायेंगे

[पिछली कड़ी - भूमिका]

 

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