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कुमाँऊनी गीतः रंगीली चंगीली पुतई कैसी

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मुझे एक ईमेल/टिप्पणी आयी जिसने मुझे नींद से जगाने का बिल्कुल वैसा ही काम किया जैसा काम इस गीत का नायक नायिका को जगाने के लिये चाय से करवाना चाह रहा है। अगर आपकी शादी हो गयी हो तो शायद आपने भी कभी कोशिश की हो अपनी श्रीमति को जगाने की। शायद श्रीमति की शान में कुछ कसीदे भी पढ़े हों। ऐसी ही एक कोशिश इस गीत में की जा रही है जिसे गाया है वन एडं ओनली गोपाल बाबू गोस्वामीजी ने।

सुबह हो चली है और श्रीमतिजी हैं कि उठने का नाम ही नही ले रही तो मोहतरमा को उठाने के लिये उसके सौन्दर्य की तुलना कभी तितली से की जा रही है तो कभी काकड़ यानि ककड़ी (खीरा) के फूल से। दिन इतना चढ़ चुका है कि गाय-बछड़े भी भूख से बेहाल हो कर आवाज करने लगे हैं। इतना ही नही आसपास की पहाड़ियों से घास काटने के लिये गयी औरतों (घस्यारिनें) की दरातियों के खनकने के स्वर भी सुनायी देने लगे हैं। अरे मेरी नारंगी की दाने जैसे अब तो उठ जा। चल ज्यादा नखरे दिखाना छोड़ के बिस्तर को छोड़ बाहर आजा और गरमा गरम चाय के मजे ले जो मैं तेरे लिये बनाकर लाया हूँ। अरे मेरी पूर्णमासी की चाँद खर्राटे मारना छोड़ और गुड़ के साथ चाय का लुत्फ उठा।

इतनी मिन्नतें और बीबी की शान में कसीदें गड़े जा रहे हैं एक पतिनुमा प्राणी द्वारा, अब आप ही बताओ इतनी मिन्नत भी भला किसी ने की है कभी अपनी श्रीमति को नींद से जगाने की।

रंगीली चंगीली पुतई कैसी, फुल फटंगां जून जैसी, काकड़े फुल्युड़ कैसी ओ मेरी किसाणा
उठ सुआ उज्याउ हैगो, चम चमको घामा, उठ सुआ उज्याउ हैगो, चम चमको घामा
रंगीली चंगीली पुतई कैसी, फुल फटंगां जून जैसी, काकड़े फुल्युड़ जैसी ओ मेरी किसाणा
उठ सुआ उज्याउ हैगो, चम चमको घामा, उठ सुआ उज्याउ हैगो, चम चमको घामा

गोरू बाछा अड़ाट लैगो भुखै गोठ पाना, गोरू बाछा अड़ाट लैगो भुखै गोठ पाना
तेरि नीना बज्यूण हैगे, उठ वे चमाचम, तेरि नीना बज्यूण हैगे, उठ वे चमाचम
घस्यारूं दातुली खणकि, घस्यारू दातुली खणकि, वार पार का डाना,
उठ मेरी नांरिंगे दाणी, उठ वे चमाचम, उठ मेरी नांरिंगे दाणी, उठ वे चमाचम

उठ भागी नाखर ना कर, पली खेड़ खाताड़ा, उठ भागी नाखर ना कर, पली खेड़ खाताड़ा
ले पिले चहा गिलास गरमा गरम, ले पिले चहा गिलास गरमा गरम
उठे मेरी पुन्यू की जूना, उठे मेरी पुन्यू की जूना, छोड़ वे घुर घूरा
ले पिले चहा घुटुकी, गुड़ को कटका, ले पिले चहा घुटुकी, गुड़ को कटका

रंगीली चंगीली पुतई कैसी, फुल फटंगां जून जैसी, काकड़े फुल्युड़ कैसी ओ मेरी किसाणा
उठ सुआ उज्याउ हैगो, चम चमैगो घामा

चलिये अब आप इस गीत को भी सुन लीजिये क्या पता कब जरूरत आन पड़े -

डिस्क्लेमर:उत्तरांचल में पोस्ट होने और बजने वाले गीत सिर्फ कुमाँऊ और गढवाल के संगीत को बढावा देने के लिये विज्ञापन मात्र ही हैं, ये कहीं से भी असली सीडी और कैसेट का विकल्प नही है। पसंद आने पर कृप्या असली कैसेट और सीडी ही खरीदें।

कुमाऊँनी लोकगीतः ओ भिणा कसके जाणूँ द्वरहटा

पहाड़ी गीतः पहाड़ छूटी ग्यो

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