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वो भांगे की चटनी, वो नौले का पानी

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जगजीत सिंह की गायी मशहूर गजल से २-३ लाईनें उधार लेकर अपने बचपन की यादों को इस गीत गजल में समेटने की कोशिश की है। आज ऐसे ही कुछ सफाई कर रहा था तो २-३ साल पहले लिखी ये गजल मुझे मिल गयी। पहाड़ों में बिताये उन अनमोल पलों को समेटने की कोशिश जो अब सिर्फ यादों में ही सिमट के रह गये हैं।

इसमें उपयोग में लाये गये कई शब्दों के शाब्दिक अर्थ शायद सबके समझ ना आये क्योंकि वो पहाड़ की संस्कृति से जुड़े हैं, इसलिये ऐसे कुछ शब्दों का अर्थ और भाव गजल के अंत में मैंने दिया है।

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो
भले छीन लो मुझ से मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो, भांगे की चटनी
वो सना हुआ नींबू, वो नौले का पानी।

वो आमा के खेतों में चुपके से जाना
वो आड़ू चुराना और फिर भाग आना
वो जोश्ज्यू के घर में अंगूर खाना
वो दाड़िम के दाने से चटनी बनाना
भूलाये नही भूल सकता ‘तरूण’ मैं
वो मासूम सा बचपन और उसकी कहानी।

वो पीतल के गिलास में चाय सुड़काना
वो डूबके, वो कापा और रसभात खाना
वो होली की गुजिया, वो भांग की पकौड़ी
पत्ते में लिपटी वो मीठी सिंगौड़ी
छूटा वो सब पीछे अब यादें बची हैं
ना है अब वो बचपन ना उसकी निशानी।

वो काला सा कौवा और उसको बुलाना
वो डमरू, वो दाड़िम वो तलवार को खाना
फूलदेई में सबके घरों में जाकर
घरों की देली को फूलों से सजाना
बेतरतीब से खुद के कपड़े थे रहते
भीगने को जाते जब बरसता था पानी।

होली में एक घर में चीर को लगाना
वो गुब्बारे, हुलियार और होली का गाना
वो चितई का मंदिर और मोष्टमानो का मेला
ना थी कोई चिंता, ना ही झमेला
ना दुनिया का गम था, ना रिश्तों का बंधन
बड़ी खुबसूरत थी वो जिंदगानी।

हिसालू, काफल और किलमोडी खाना
दिवाली में फूलों की माला बनाना
वो क्रिकेट का खेला जब हों खेत बंजर
बो भुट्टों की फुटबाल, कागज का खंजर
अब है झिझक कुछ करने ना देती
गया अब वो बचपन और ढलती जवानी।

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो…

कुछ शब्दों के भाव/अर्थ:

नौलाः पानी का प्राकृतिक स्रोत
भांगः ये दरअसल बीज होता है जिसकी बहुत स्वादिष्ट चटनी बनती है, अपने को बहुत प्रिय है
सना हुआ नीबूः जाड़ों के वक्त घर की छतों में धूप में बैठकर बड़ा नीबू, मूली, संतरा, दही, नमक, भांगा वगैरह मिलाकर बनाया जाता है
हुलियारः होली गाने वाले प्रोफेशनल
फूलदेईः पहाड़ों का एक प्रसिद्ध त्यौहार जिसमें बच्चे घर घर जाकर घर की एंट्रेस में फूल और चावल डालते हैं
सिंगौड़ीः अल्मोड़े की प्रसिद्ध स्वादिष्ट मिठाई जो पत्ते में लपेट के दी जाती है
डूबके, कापा, रसभातः पहाड़ी व्यंजन
सुड़कानाः जोर जोर से आवाज करके चाय पीना
दाड़िमः अनार की तरह का ही फल लेकिन छोटे रूप में

ओ पहाड़, मेरे पहाड़!

हाँ वही ‘देबिया’

लोकगीतः ठंडो रे ठंडो और ठंडो पानी गीत

म्यार पहाड़

 

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