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वो भांगे की चटनी, वो नौले का पानी

जगजीत सिंह की गायी मशहूर गजल से २-३ लाईनें उधार लेकर अपने बचपन की यादों को इस गीत गजल में समेटने की कोशिश की है। आज ऐसे ही कुछ सफाई कर रहा था तो २-३ साल पहले लिखी ये गजल मुझे मिल गयी। पहाड़ों में बिताये उन अनमोल पलों को समेटने की कोशिश जो अब [...]

[ More ] January 8th, 2009 | 22 Comments | Posted in Uttarakhand's Life |

ओ पहाड़, मेरे पहाड़!

हमारे पहाड़ों में एक चिड़िया होती है जिसका नाम है घुघूती, इसका जिक्र अक्सर किसी ना किसी गीत में सुनने को मिल ही जाता है। बरसों पहले की बात है, ऐसी ही एक घुघूती ने एक दिन अपने पंख फैलाये, मुँह में बासुती का एक तिनका दबाया और उड़ चली मैदानों की ओर एक नई [...]

[ More ] November 25th, 2008 | 16 Comments | Posted in Reader's/Guest Column |

हाँ वही ‘देबिया’

मेरे ब्लोग उत्तरांचल की एक पोस्ट ‘म्यार पहाड़‘ में कल देवेन्द्र कुमार पांडे के नाम से एक टिप्पणी आयी। ऐसी टिप्पणियाँ कभी कभी ही आती हैं और इस तरह की टिप्पणी का सही सम्मान उसको पोस्ट की शक्ल देना ही है। ये पढ़िये म्यार पहाड़ की कहानी देबिया की जुबानी – मैं याने देवकीनंदन पांडे [...]

[ More ] October 8th, 2008 | 29 Comments | Posted in Reader's/Guest Column |

लोकगीतः ठंडो रे ठंडो और ठंडो पानी गीत

वैसे तो ये गीतों की बारी नही थी, लेकिन थोड़ा व्यस्त रहने के कारण जो लेख शुरू किया था वो पूरा नही कर पा रहा हूँ, इसलिये तब तक आप ये दो लोकगीत सुनिये। पहला है “पी जाओ पी जाओ मेर पहाड़ को” गोपाल बाबू गोस्वामीजी की आवाज में (कुमाँउनी बोली में) और दूसरा है [...]

म्यार पहाड़

अगर मेरा गांव मेरा देश हो सकता है तो म्यार पहाड़ क्यों नही? म्यार पहाड़ यानि मेरा पहाड़ लेकिन ऐसा कहने से ये सिर्फ मेरा होकर नही रह जाता ये तो सब का है वैसे ही जैसे मेरा भारत हर भारतवासी का भारत। खैर पहाड़ को आज दो अलग अलग दृष्टि से देखने की कोशिश [...]