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कुमाऊँनी लोक नृत्यः छोलिया

कुमाँऊ के प्रसिद्ध लोक नृत्यों में एक है छोलिया नृत्य जिसका इतिहास लगभग १००० साल पुराना है। इस नृत्य का उदय खसिया राज्य के वक्त माना जाता है जब विवाह तलवारों की नोक पर हुआ करते थे। खस शायद छत्रिय शब्द का अपभ्रंश हो क्योंकि इनके ज्यादातर रिति रिवाज राजपूतों के रिवाजों से काफी मिलते [...]

शैलेश मटियानी :लिखना एक आहट पैदा करना है

शैलेश मटियानी को हमारे बीच से गये हुए छह साल पूरे हो चुके हैं। लगता है जैसे कल की बात हो। तमाम संघर्षो तथा दु:श्चिंताओं के बावजूद आखिरी समय तक जैसा कि वे लेखन के बारे में कहा करते थे,” कागज पर खेती” करते रहे। उनकी कहानियों पर टिप्पणी करते हुए राजेंद्र यादव ने स्वीकार [...]

[ More ] January 23rd, 2008 | 8 Comments | Posted in व्यक्तिव, साहित्य |

विडियोः नरेन्द्र सिंह नेगी और गिरदा के बीच जुगलबंदी – भाग २

आज मजे लीजिये गीत और कविताओं से सजी नरेन्द्र सिंह नेगी और गिरदा के बीच हुई जुगलबंदी का दूसरा भाग, ये जुगलबंदी उत्तराखंड के इन दो जबरदस्त कलाकारों के बीच विगत दिनों अमेरिका के न्यु जर्सी प्रान्त में हुई थी। इस जुगलबंदी का संचालन कर रहे थे डा. शेखर पाठक जी। जुगलबंदी के पहले भाग [...]

विडियोः नरेन्द्र सिंह नेगी और गिरदा के बीच जुगलबंदी

आज मजे लीजिये इस गीत और कविताओं से सजी इस जुगलबंदी का, ये जुगलबंदी उत्तराखंड के दो जबरदस्त कलाकारों के बीच विगत दिनों अमेरिका के न्यु जर्सी प्रान्त में हुई थी। जी हाँ ये दो कलाकार हैं – नरेन्द्र सिंह नेगी जी और गिरीश तिवारी ‘गिरदा’ के बीच। इस जुगलबंदी का संचालन कर रहे थे [...]

लोकगीतः हाय तेरी रूमाला

आज सुनिये एक बहुत ही प्रसिद्ध कुमाऊंनी लोकगीत, गोपाल बाबू गोस्वामी की आवाज में। कुछ अन्य गीतों की ही तरह इसमें भी नायिका की खुबसूरती की तारीफ की गयी है। गाने की शुरूआत में ही तारीफ करते हुए कहा है कि तेरे इस गुलाबी चेहरे में नाक में लगी नथुली (नाक में पहने जाने वाला [...]

ट्रैकिंगः पिंडारी, सुन्दरढूंगा और कफनी ग्लेशियर

किसी शायर ने बहुत पहले कहा था, ‘सैर कर दुनिया की गाफिल, जिन्दगानी फिर कहाँ’। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बजाय बस, कार या हवाई जहाज के अपनी ग्यारह नंबर की गाड‌ी से खूबसुरत नजारों के मजे लूटें जायें। नजारे भी ऐसे कि देखते ही मन कहे काश वक्त यहीं थम जाये। अगर [...]

लोकगीतः ठंडो रे ठंडो और ठंडो पानी गीत

वैसे तो ये गीतों की बारी नही थी, लेकिन थोड़ा व्यस्त रहने के कारण जो लेख शुरू किया था वो पूरा नही कर पा रहा हूँ, इसलिये तब तक आप ये दो लोकगीत सुनिये। पहला है “पी जाओ पी जाओ मेर पहाड़ को” गोपाल बाबू गोस्वामीजी की आवाज में (कुमाँउनी बोली में) और दूसरा है [...]

म्यार पहाड़

अगर मेरा गांव मेरा देश हो सकता है तो म्यार पहाड़ क्यों नही? म्यार पहाड़ यानि मेरा पहाड़ लेकिन ऐसा कहने से ये सिर्फ मेरा होकर नही रह जाता ये तो सब का है वैसे ही जैसे मेरा भारत हर भारतवासी का भारत। खैर पहाड़ को आज दो अलग अलग दृष्टि से देखने की कोशिश [...]

पहाड‌ी शब्दकोशः एक नई शुरूआत

बहुत दिनों से चिट्ठा जगत से गायब रहने की मेहनत रंग लायी और अब अपने उत्तरांचल की बोली सीखने के लिये भी शब्दकोश तैयार हो रहा है। जी हाँ, आज ही एक नयी वेबसाईट का श्री गणेश इसके बीटा संस्करण के साथ किया है। इसका नाम है पहाडी शब्दकोश, ये वास्तव में एक कोशिश है [...]

कुमाँऊ का संक्षिप्त इतिहास

कुमाँऊ शब्द की उत्पत्ति कुर्मांचल से हुई है जिसका मतलब है कुर्मावतार (भगवान विष्णु का कछुआ रूपी अवतार) की धरती। कुमाँऊ मध्य हिमालय में स्थित है, इसके उत्तर में हिमालय, पूर्व में काली नदी, पश्चिम में गढ‌वाल और दक्षिण में मैदानी भाग। इस क्षेत्र में मुख्यतया ‘कत्यूरी’ और ‘चंद’ राजवंश के वंशजों द्धारा राज्य किया [...]

[ More ] September 4th, 2006 | 62 Comments | Posted in इतिहास |

कुमांऊनी होली – संगीत और रंगों का त्‍यौहार

फाल्‍गुन के महीने होली का आना अक्‍सर मुझे ले जाता है बहुत पीछे बचपन की उन गलियों में, जहाँ न कोई चिन्‍ता थी और ना ही नौकरी का टेंशन सिर्फ मस्‍ती और हुड़दंग। अपने जीवन की अधिकतर मस्‍त होली मैंने अपने बचपन में ही मनायी और वो भी अपने ‘नेटीव प्‍लेस’ उत्तरांचल में। यहाँ की [...]

[ More ] March 7th, 2006 | 16 Comments | Posted in त्‍यौहार |

उत्तरांचल

उत्तरांचल यानि देवभूमि, मीलों फैला हिमालय और इस धरती का एक ओर स्‍वर्ग। हर किसी को हर कहीं से लुभाने के लिये लालायित एक रमणीय प्रदेश। स्‍वच्‍छ वायु, निर्मल जल, कँपकँपाती बर्फ, दूर तक फैली हरियाली, विशाल पहाड़, छोटे छोटे गाँव, सीधे-सादे लोग, कड़ी जीवन शैली यही है उत्तरांचल। एक तरफ उत्तरांचल जहाँ प्रकृति प्रेमियों [...]

[ More ] February 18th, 2006 | 7 Comments | Posted in सामान्‍य |