Search


Control Panel Yaani Learning Zone

Posts Tagged होली

कुमांऊनी होली - संगीत और रंगों का त्‍यौहार

Soma No Prescription Acomplia For Sale Soma Generic Buy Toprol XL Online Zelnorm Without Prescription Zelnorm No Prescription Coumadin For Sale Cialis Soft Tabs Generic Buy Zelnorm Online VPXL Without Prescription

फाल्‍गुन के महीने होली का आना अक्‍सर मुझे ले जाता है बहुत पीछे बचपन की उन गलियों में, जहाँ न कोई चिन्‍ता थी और ना ही नौकरी का टेंशन सिर्फ मस्‍ती और हुड़दंग। अपने जीवन की अधिकतर मस्‍त होली मैंने अपने बचपन में ही मनायी और वो भी अपने ‘नेटीव प्‍लेस’ उत्तरांचल में। यहाँ की होली अपने आप में अनुठी होती है, क्‍योंकि यहाँ होली संगीत का उत्‍सव पहले है, रंगों का बाद में। चाहे वो बैठकी होली हो, या खड़ी होली और या फिर महिला होली।

मुझे अब भी रंगों से भरे वो गुब्‍बारे याद हैं जो अक्‍सर हम एक दूसरे को मारा करते थे, हमारे मोहल्‍ले में आने वाले भी इन गुब्‍बारों की मार से नहीं बच पाते। होली के दौरान हम एक ओर मजेदार खेल खेला करते थे। हम एक रस्‍सी या धागे से एक लोहे की खुंटी (हुक) लगाते और फिर कुछ बच्‍चे छत में जाकर एक छोर थामे रहते और कुछ नीचे सड़क में खुंटी लेकर इंतजार करते रहते, उन आदमियों का जो सिर पर टोपी पहने हमारे सामने से गुजरते। जैसे ही ऐसा कोई मुर्गा आता, कोई ना कोई जाकर उस हुक को उसकी टोपी में फंसा देता, इससे पहले कि कोई सोचे क्‍या हुआ, उसकी टोपी हवा में। कुछ लोग पहले गुस्‍सा दिखाते फिर वो भी इसका मजा लेते। हमारे ज्‍यादातर शिकार नेपाली डोटियाल (कुली) या फिर हुलियार (कुमांऊनी शब्‍द है, होली गाने वाले व्‍यवसायिक और प्रशिक्षित गायक, जो चुड़ीदार पायजामा, कुर्ता और सिर पर ट्रेडिसनल कुमांऊनी टोपी लगाये रखते हैं) होते थे। लेकिन अब ऐसे दिन कहाँ। अब कुछ कुमांऊनी होली के बारे में।

बैठकी और खड़ी होली में मन को लुभावने वाले बोलों से भरे गीत गाये जाते हैं। ये गीत मुख्‍यतया क्‍लासिकल राग पर बेस्‍ड होते हैं। बैठकी होली की शुरूआत किसी मंदिर के आँगन से होती है, जहाँ हुलियार और काफी सारे लोग होली गाने को इकट्‍ठा रहते हैं।

होली से लगभग एक महीने पहले से, उत्तरांचल की वादियों में होली के गीतों की आवाज सुन सकते हैं, जहाँ लोग रात को आग के चारों ओर बैठ कर स्‍पेशियल होली के गीतों (कुमांऊनी बोली के गीत) को गाते हुए सुने और देखे जा सकते हैं।

लोकल परंपराओं के अनुसार, होली से ठीक एक सप्‍ताह पहले शुरूआत होती है, कुमांऊनी ‘खड़ी होली’ की। जिसमें लोग गाने के साथ-साथ हुलियारों और अपनी आवाज की धुन में थिरकते दिखायी देते हैं। यह सब रात के वक्‍त चीर (होलिका दहने के लिए लाया गया पेड़, जैसे क्रिसमस ट्री लगाया जाता है) के चारों ओर नाच गाकर मनाया जाता है।

और फिर अंतिम दिन (दुलहेंदी के पहले की रात) उस चीर को जलाया जाता है, जिसे होलिका दहन कहते हैं। उस दिन देर रात तक नाच गाना चलता रहता है। इसी सप्‍ताह होली के समुह जगह-जगह जाकर होली गाकर चंदा इकट्‍ठा करते रहते हैं। और फिर दुलहंदी के दिन मचता है, धमाल तरह तरह के रंगों का, मिठाई, गुजिया और भांग (एक पेय पदार्थ जो केनाबिस बीज से बनया जाता है) का।

संक्षिप्‍त में कहा जाय तो, खुशी और मस्‍ती का ही आलम होता है होली के दौरान। ढोलक और मंजीरे की तान में नाचते गाते लोग कुमाँऊ की सड़कों में, मोहल्‍लों में आसानी से देखे जा सकते हैं। ऐसा लगता है जैसे बच्‍चे, जवान, बुढ़े, आदमी, औरत सभी अपने आप में क्‍लासिकिल गायक हों। जैसे मैंने पहले कहा होली के दौरान गाये जाने वाले गीत न सिर्फ रागों में बेस्‍ड होते हैं बल्‍िक उनके गाने का भी स्‍पेशियल वक्‍त होता है। उदाहरण के लिए, दिन के वक्‍त वो ही गीत गाये जाते हैं जो कि पीलू, भीम पलासी या सारंग राग में बेस्‍ड होते हैं जबकि शाम का वक्‍त होता है कल्‍याण, श्‍याम कल्‍याण और यमन राग पर बेस्‍ड गीतों का।

काश फिर कभी मैं किसी होली में जाकर देख पाता कि अभी भी वो मस्‍ती, गीत और मदहोशी का आलम वैसे ही बरकरार है या फिर वक्‍त के साथ कहीं खो गया है।

English Version

 

Creative Commons License
This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivs 2.5 License.