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अपराध बोध

उत्तरांचल के पहाड़ और उन्हें काटती हुई सर्पनुमा सड़कें और सड़कों के ऊपर नीचे दिखते सीढ़ीनुमा खेत बहुत ही सुन्दर लगते हैं। इन्हीं खेतों के इर्दगिर्द नजर आते हैं छोटे छोटे गाँव, शायद किसी सैलानी का मन ये सब देखकर वहीं बसने का करता भी हो। लेकिन दूर से मनलुभावने वाले ये गाँवों के दृश्य [...]

[ More ] January 4th, 2009 | 11 Comments | Posted in Reader's/Guest Column, Uttarakhand's Life |

पहाड़ी गीतः पहाड़ छूटी ग्यो

अपनों से बिछड़ने की व्यथा (यानि Home Sickness) को व्यक्त करता है ये गीत। एक पहाड़ी नौकरी की तलाश में पहाड़ छोड़ कर परदेश (यानि मैदानी इलाके या फिर दूसरे देश) चला जाता है। उसके बाद उसे याद आती है घर की सब बातें, उस पहाड़ की बातें जहाँ देवताओं का धाम है, घर छोड़ते [...]

ओ पहाड़, मेरे पहाड़!

हमारे पहाड़ों में एक चिड़िया होती है जिसका नाम है घुघूती, इसका जिक्र अक्सर किसी ना किसी गीत में सुनने को मिल ही जाता है। बरसों पहले की बात है, ऐसी ही एक घुघूती ने एक दिन अपने पंख फैलाये, मुँह में बासुती का एक तिनका दबाया और उड़ चली मैदानों की ओर एक नई [...]

[ More ] November 25th, 2008 | 16 Comments | Posted in Reader's/Guest Column |

उत्तराखंड सांस्कृतिक कार्यक्रम: रंग बिरंगो कौथिक

15 नवम्बर 2008, को नई दिल्ली में आयोजन होने जा रहा है उत्तराखंड के लोक गीतों का सांस्कृतिक कार्यक्रम – रंग बिरंगो कौथिक। उत्तराखंड दिवस के उपलक्ष्य में उत्तराखंड जन जागृति संघ के सौजन्य से आयोजित होने वाला ये प्रोग्राम शनिवार 15 नवम्बर दोपहर 3 बजे से शुरू होगा। इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने वाले [...]

[ More ] November 7th, 2008 | 9 Comments | Posted in Announcement |

पहाड़ी गीतः म्यर पहाड़

आज एक ऐसे पहाड़ी गीत के बारे में बात करते हैं और सुनते हैं जिसे किसी प्रोफेशनल गायक ने नही गाया। बल्कि ये गीत उस नौजवान पीढ़ी का नतीजा है जो नाम के बजाय काम के प्रति समर्पित है। म्यर पहाड़ पर लिखे अपने आलेख में मैने जिक्र किया था पहाड़ के नौजवानों का जिन्हें [...]

हाँ वही ‘देबिया’

मेरे ब्लोग उत्तरांचल की एक पोस्ट ‘म्यार पहाड़‘ में कल देवेन्द्र कुमार पांडे के नाम से एक टिप्पणी आयी। ऐसी टिप्पणियाँ कभी कभी ही आती हैं और इस तरह की टिप्पणी का सही सम्मान उसको पोस्ट की शक्ल देना ही है। ये पढ़िये म्यार पहाड़ की कहानी देबिया की जुबानी – मैं याने देवकीनंदन पांडे [...]

[ More ] October 8th, 2008 | 29 Comments | Posted in Reader's/Guest Column |

पहाड़ी गीतः हिमला हाउ उनो कोता

इस गीत की सबसे बड़ी मधुरता है इसकी लयबद्दता और संगीत, भाषा समझ ना आये तो भी गीत का आनंद उठाया जा सकता है। लेकिन सबसे पहले गढ़वाल के उस क्षेत्र के बारे में थोड़ा बताता दूँ जहाँ का ये गीत है। गढ़वाल के इस क्षेत्र का नाम है जौनसार रवांई, ये पड़ता है उत्तरकाशी [...]

कनाडा में एक गीतों भरी शाम नरेन्द्र नेगी जी के साथ

स्कारबोरो टोरन्टो कैनाडा में वहां की संस्था उत्तराखन्ड कल्चरल एशोसियेशन ने 2 अगस्त 2008 को उतराखन्ड के इस सदी के महान गढ़वाली बोली के गायक नरेन्द्र सिह नेगी जी के साथ गीतों भरी सांझ का आयोजन किया । इस सुर सम्राट को सुनने कैनाडा के प्रत्येक शहर से, जिनमे मौंट्रियाल से सुधीर रावत जी, नेगी [...]

[ More ] August 7th, 2008 | 18 Comments | Posted in Uttarakhand News |

Interview: गढ़वाली सिनेमा के जनक पराशर गौढ़ के साथ बातचीत – 2

गड़वाली सिनेमा के २५ साल पूरे होने पर हमने जा पकड़ा, पहाड़ी महिला के संघर्ष की कहानी कहती फिल्म “गौरा” और पहली गढ़वाली फिल्म “जग्वाल” के निर्माता पराशर गौढ़ को, और उनके साथ करी एक लंबी बातचीत। आज से उसी बातचीत का सिलसिला यहाँ शुरू कर रहे हैं। पिछली पोस्ट के साथ हमने पराशर गौढ़ [...]

[ More ] July 1st, 2008 | 4 Comments | Posted in व्यक्तिव, सिनेमा |

Interview: गढ़वाली सिनेमा के जनक पराशर गौढ़ के साथ बातचीत

गड़वाली सिनेमा के २५ साल पूरे होने पर हमने जा पकड़ा, पहाड़ी महिला के संघर्ष की कहानी कहती फिल्म “गौरा” और पहली गढ़वाली फिल्म “जग्वाल” के निर्माता पराशर गौढ़ को, और उनके साथ करी एक लंबी बातचीत। आज से उसी बातचीत का सिलसिला यहाँ शुरू कर रहे हैं। “मुश्किल नही है कुछ भी अगर ठान [...]

[ More ] June 26th, 2008 | 24 Comments | Posted in व्यक्तिव, सिनेमा |

पहाड़ी महिला के संघर्ष की कहानी – गढ़वाली फिल्मः गौरा

गढ़वाली सिनेमा की रजत जंयती यानि २५ साल पूरे होने पर गढ़वाली सिनेमा के जनक, पहली गढ़वाली फिल्म ‘जग्वाल’ (४ मई १९८३ को प्रदर्शित) की सौगात देने वाले पराशर गौड़ बतौर निर्माता अब लेकर आये हैं फिल्म ‘गौरा’, यह कनाडा में बसे पराशर गौड़ की दूसरी फिल्म है। रविवार ८ जून को रिलीज हुई यह [...]

[ More ] June 17th, 2008 | 19 Comments | Posted in सिनेमा |

पिथौरागढ़ः एक शहर जो अब भी याद आता है – 3

पिछले अंक – भाग १, भाग २ पिथौरागढ़ के मौसम को चार हिस्सों में बाँटा जा सकता है – दिसम्बर से मार्च तक जाडा़, अप्रैल से जून तक गर्मी, जुलाई से सितम्बर तक मानसून यानि बरसात और सितम्बर से नवम्बर जिसे कई जगह पतझड़ भी कहा जाता है। इसी दौरान शुरू होता है गुलाबी जाड़ा। [...]