कनाडा में एक गीतों भरी शाम नरेन्द्र नेगी जी के साथ
Posted by on August 7, 2008
स्कारबोरो टोरन्टो कैनाडा में वहां की संस्था उत्तराखन्ड कल्चरल एशोसियेशन ने 2 अगस्त 2008 को उतराखन्ड के इस सदी के महान गढ़वाली बोली के गायक नरेन्द्र सिह नेगी जी के साथ गीतों भरी सांझ का आयोजन किया ।
इस सुर सम्राट को सुनने कैनाडा के प्रत्येक शहर से, जिनमे मौंट्रियाल से सुधीर रावत जी, नेगी जी व अन्य बन्धु; आटुवा से हरेन्द्र असवाल व साथी; कारनवाल से खिमा भाई व साथी; लिमिंगटन से डा तिवाडी व साथी; किचनर से हर्ष फरासी व साथी; विंन्डसर उडव्रिज व उसके आस पडोस से कई गढवाली परिवर के साथ साथ अमेरिका न्यू जर्सी से इन्द्र बलोदी परिवार; विजय शर्मा व साथी; न्यूर्याक से कई गढ़वाली परिवार सम्मलित हुए। इस सांझ में भारत से, दो सम्मानित राजनेतिक पार्टी, कांग्रेस के भूतपूर्व राज्य मंत्री धीरेन्द्रप्रताप शर्मा व यु के डी के युवा विधायक श्री त्रिपाठी जी विशेष अतिथि के रूप यहां पधारे।
अपने भाषण में उन्होने संस्था के आयोजकों को व उतराखन्ड से आये इस महान गायक को अपनी शुभकामनायें दी। साथ मे विशेष रूप इस कार्यक्रम को सफल बनाने व नेगी जी को यहां आमत्रित करने व उतराखन्ड की बोली भाषा के हिमायती पाराशर गौड जी का धन्यवाद देना नही भूले।
संस्था के सचिव भारत रावत ने आपने भाषण मे नरेन्द्र नेगी जी व मुख्य अतिथियों का स्वागत करते हुए ठाकुर भुपेन्द्र सिंह असवाल जी व पाराशर गौड जी का, जिन्होने आर्थिक सहायता के साथ अन्य सहायता दी, उन्हे विशेष रूप से धन्यावद देते हुए यहां के प्रत्येक परिवार को जिन्होंने इस सांझ को सफल बनाने में योगदान दिया उनको नमन होकर धन्यवाद देकर मंच नेगी जी के हवाले कर दिया ।
गीत संगीत की इस शाम की शुरूवात नेगी जी ने मांगल व गढवाल कुमाँऊ मे पूजी जानेवाली मां नन्दा देवी की स्तुति से की, उसके बाद जैसे ही “ठन्डो रे ठन्डो मेरा पहाड़े की हव्वा ठन्डी” की धुन बजी हाल मे बैठे लोग अपने आप को रोक नही पाये और मंच पर उतरकर नाचने लगे। उसके बाद एक के बाद एक रसभरे गीत सुनाकर अप्रवासी उत्तराखन्डियों का मन मोह लिया। “भलु लगद बनुली तेरो” वाले गीत में तो पूरी युवा पीढ़ी थिरक उठी। अभी नाचने वाले सांस ले ही रहे थे कि “तेरू मछोई गाड बगीगे ले अबत खैले माछा” ने सब को उठाकर नाचने पर मजबूर कर दिया।
रंगारंग संगीतमई सांझ अपने पूरे यौवन पर थी, माहौल की नाजुकता को पहचानना तो कोई नेगी जी से सीखे, कि कब क्या गाना है। उन्होंने अपने मित्र पाराशर जी के लिए एक गीत गा कर मित्रता तो निभाई ही निभाई साथ में उन्हे उनकी समधन जो कि अभी अभी भारत से आई थी को भी फ्लोर पर नचवा कर ही छोडा। जनता ने भी गीत के रिदम के साथ तालिया बजाकर इन दोनो का साथ दिया। इस तरह के गीतों को गा कर नेगी जी ने इस शाम को और भी खुशनुमा बना दिया।
फिर दौर था फरमाईसी गीतों का जिनमें कई गीत गाये गये “धुधुती धुरौण लगी म्यारा मैत की”, “कु ठुंगी नी पुजी”, “शुरूमा औजई बसन्त ऋतु”, “मेरा मुल्क जई, कन्वु लडिक बिगडि म्यरू आदि आदि। सब ने जनता का भरपूर मनोरंजन किया। फरमाईसी गीतो की लिस्ट बड़ती ही जा रही थी साथ में समय भी बडी तेजी से गुजरता जा रहा था, पता ही नही चला कि कब 12 बज गये। नेगी जी के पास “नौ छम्मी नारैयंण” वाले गीत की बार बार फरमाईश के बाद आखिर उन्हें सुनाना ही पडा। इस गीत ने हाल मे बैठे सभी लोगों को नचा डाला। इस संध्या का यह आखिरी गीत था।
अन्त में भारत से आये रावत जी, जो कि किसी इन्टरनेशलन कंपनी के सैक्ट्ररी जर्नल है उन्होंने शाल उडाकर नेगी जी को सम्मानित किया। श्रीमती उषा नेगी जी को संस्था की उपाध्यक्षा माधुरी बहुगुणा ने भी शाल उडाकर सम्मानित किया। अन्त में अध्यक्षा पुष्पा भदुरिया ने एक स्मृति चिन्ह देकर दोनों का सम्मान किया। इस तरह यह गीतों भरी सांझ रात्री भोजन के साथ समाप्त हुई। यह संध्या यहां पर बसे अप्रवासी उत्तराखन्डियों को हमेशा याद रहेगी।
- कनाडा से सचिन गौड (दिनाक 4 अगस्त 08)

















