Holi: क्या हम अपनी पारम्परिक होली को फास्ट फारर्वड करते जा रहे हैं?
Posted by on February 26, 2010
मेरा ये मानना रहा है कि हमारी संस्कृति को सबसे बड़ा खतरा बाहर के लोगों से नही बल्कि अपनों से होता है। अगर ऐसा नही होता तो काँटा लगा माफिक पुराने गीतों की मिक्सिंग गोरे कर रहे होते लेकिन ये रिमिक्स की अंधी दौड़ अपन लोगों ने ही शुरू की। दरअसल आजकल गीत आडियो के मार्फत कम विडियो के मार्फत ज्यादा सुने जाते हैं, शायद इसीलिये संगीत का ढर्रा बदलता जा रहा है।
अभी जब मैंने होली के गीतों पर बना ये “कैले बाँधी चीर” नानॅ स्टॉप एलबम सुना तो बाल नोचने को मन कर आया। हो सकता है किसी को ये पसंद भी आये लेकिन इसके गीतों को सुनकर मुझे लगता है बनाने वाले और गाने वालों ने अपने उत्तराखंड की होली का ज्ञान ताक पर रखकर ये एलबम बनाया है। सारा का सारा एलबम एक ही सुर और एक ही ताल में शुरू होकर उसी में पूरा हो गया। आप जरा सैंपल सुनकर देखिये क्या ऐसा ही नही है?
एक ही सुर एक ही ताल:
चीर के चारों ओर घेरा बाँधकर गाने वालों के लिये अगर इस ऐलबम को चला दिया जाय तो उनकी समझ ही ना आये की कदम कब आगे की ओर बढ़ाने हैं कब पीछे। गीतों को सुनकर लगता है हम फास्ट फारर्वड में गीत सुन रहे हैं। वक्त की कमी हो शायद या थोड़े में ही बहुत कुछ समेटने की चाह, ये तो बनाने वाले ही जानें।
मैंने कुछ होलियाँ देखी भी हैं, इन्हें गाया भी है और गाते हुए पहाड़ियों को सुना भी है लेकिन इस फास्ट फार्वड लय और सुर में पहली बार सुना। हो सकता है आने वाले कुछ समय में कोई उत्तराखंड या कुमाऊँ की पारम्परिक होलियों को अच्छी रिकार्डिंग के साथ वेब में उपलब्ध करा सके फिलहाल ऐसा नही है। कुछ गीत मौजूद हैं लेकिन वो इतने क्लीयर नही कि इन पारम्परिक होली को ना जानने वाले उन्हें सुनकर कुछ आनंद उठा सकें या ठीक से समझ सकें।।
उस एलबम को इतना गरियाने के बाद कम से कम इतना तो कर सकता हूँ कि एक पहाड़ी होली आपको सुनाता चलूँ, (शक की कोई गुंजाईश ना हो इसलिये पहले ही बता दूँ ये मैंने नही गायी है)। हमारे यहाँ होली कुछ ऐसे ही गायी जाती है, दरअसल ये खड़ी होली के लिये गायी गयी है। जिसमें चीर के चारों ओर घुम घुम के इसे गाया जाता है, गीत के उतार चढ़ाव के साथ साथ ही कदम थिरकते हैं। बैठ के गायी जाने वाली होली और ज्यादा शास्त्रीय पुट लिये होती हैं।
अब इस होली को सुनिये और फर्क देखिये, होली है -
हाँ हाँ हाँ मोहन गिरधारी
ऐसो अनाड़ी चुनर गयो फाड़ी
हँसी हँसी दे गयो गारी
मोहन गिरधारी।
आप सभी को रंग बिरंगी होली की बहुत बहुत शुभकामनायें।
















