कुमाँऊनी होली: गीत-संगीत और रंगों का त्यौहार
Posted by on March 10, 2009 Filed under Uttarakhand's Life, कुमाऊँनी संगीत, त्यौहार
[Whenever holi comes it take me down to memory lane, way back when I was kid. Most of the best holi I ever had when I was a kid and all those holi I celebrated in my native place (Uttaranchal/Uttarakhand). It’s unique because the Kumaoni Holi lies in being a musical affair, whether it’s the Baithki Holi, the Khari Holi or the Mahila Holi. OK, let me tell you something about our Kumaoni holi.]
भारत विविधता का देश है, यहाँ एक ही त्यौहार मनाने के कई अंदाज हैं। ऐसा ही एक त्यौहार आ रहा है होली, बचपन में मनायी होली को अपनी यादों से निकाल कर उसी बहाने आपसे रूबरू करवा रहा हूँ कुमाँऊनी होली। उत्तरांचल उत्तराखंड में आने वाले समस्त टूरिस्ट पाठकों को होली की रंगबिरंगी शुभकामनायें, आप सब की ये होली रंगों भरी और मस्ती भरी रहे।
फाल्गुन के महीने होली का आना अक्सर मुझे ले जाता है बहुत पीछे बचपन की उन गलियों में, जहाँ न कोई चिन्ता थी और ना ही नौकरी का टेंशन सिर्फ मस्ती और हुड़दंग। अपने जीवन की अधिकतर मस्त होली मैंने अपने बचपन में ही मनायी और वो भी अपने ‘नेटीव प्लेस’ उत्तरांचल में। यहाँ की होली अपने आप में अनुठी होती है, क्योंकि यहाँ होली संगीत का उत्सव पहले है, रंगों का बाद में। चाहे वो बैठकी होली हो, या खड़ी होली और या फिर महिला होली।
मुझे अब भी रंगों से भरे वो गुब्बारे याद हैं जो अक्सर हम एक दूसरे को मारा करते थे, हमारे मोहल्ले में आने वाले भी इन गुब्बारों की मार से नहीं बच पाते। होली के दौरान हम एक ओर मजेदार खेल खेला करते थे। हम एक रस्सी या धागे से एक लोहे की खुंटी (हुक) लगाते और फिर कुछ बच्चे छत में जाकर एक छोर थामे रहते और कुछ नीचे सड़क में खुंटी लेकर इंतजार करते रहते, उन आदमियों का जो सिर पर टोपी पहने हमारे सामने से गुजरते। जैसे ही ऐसा कोई मुर्गा आता, कोई ना कोई जाकर उस हुक को उसकी टोपी में फंसा देता, इससे पहले कि कोई सोचे क्या हुआ, उसकी टोपी हवा में। कुछ लोग पहले गुस्सा दिखाते फिर वो भी इसका मजा लेते। हमारे ज्यादातर शिकार नेपाली डोटियाल (कुली) या फिर हुलियार (कुमांऊनी शब्द है, होली गाने वाले व्यवसायिक और प्रशिक्षित गायक, जो चुड़ीदार पायजामा, कुर्ता और सिर पर ट्रेडिसनल कुमांऊनी टोपी लगाये रखते हैं) होते थे। लेकिन अब ऐसे दिन कहाँ। अब कुछ कुमांऊनी होली के बारे में।
बैठकी और खड़ी होली में मन को लुभावने वाले बोलों से भरे गीत गाये जाते हैं। ये गीत मुख्यतया क्लासिकल राग पर बेस्ड होते हैं। बैठकी होली की शुरूआत किसी मंदिर के आँगन से होती है, जहाँ हुलियार और काफी सारे लोग होली गाने को इकट्ठा रहते हैं।
होली से लगभग एक महीने पहले से, उत्तरांचल की वादियों में होली के गीतों की आवाज सुन सकते हैं, जहाँ लोग रात को आग के चारों ओर बैठ कर स्पेशियल होली के गीतों (कुमांऊनी बोली के गीत) को गाते हुए सुने और देखे जा सकते हैं।
लोकल परंपराओं के अनुसार, होली से ठीक एक सप्ताह पहले शुरूआत होती है, कुमांऊनी ‘खड़ी होली’ की। जिसमें लोग गाने के साथ-साथ हुलियारों और अपनी आवाज की धुन में थिरकते दिखायी देते हैं। यह सब रात के वक्त चीर (होलिका दहने के लिए लाया गया पेड़, जैसे क्रिसमस ट्री लगाया जाता है) के चारों ओर नाच गाकर मनाया जाता है।
और फिर अंतिम दिन (दुलहेंदी के पहले की रात) उस चीर को जलाया जाता है, जिसे होलिका दहन कहते हैं। उस दिन देर रात तक नाच गाना चलता रहता है। इसी सप्ताह होली के समुह जगह-जगह जाकर होली गाकर चंदा इकट्ठा करते रहते हैं। और फिर दुलहंदी के दिन मचता है, धमाल तरह तरह के रंगों का, मिठाई, गुजिया और भांग (एक पेय पदार्थ जो केनाबिस बीज से बनया जाता है) का।
संक्षिप्त में कहा जाय तो, खुशी और मस्ती का ही आलम होता है होली के दौरान। ढोलक और मंजीरे की तान में नाचते गाते लोग कुमाँऊ की सड़कों में, मोहल्लों में आसानी से देखे जा सकते हैं। ऐसा लगता है जैसे बच्चे, जवान, बुढ़े, आदमी, औरत सभी अपने आप में क्लासिकिल गायक हों। जैसे मैंने पहले कहा होली के दौरान गाये जाने वाले गीत न सिर्फ रागों में बेस्ड होते हैं बल्िक उनके गाने का भी स्पेशियल वक्त होता है। उदाहरण के लिए, दिन के वक्त वो ही गीत गाये जाते हैं जो कि पीलू, भीम पलासी या सारंग राग में बेस्ड होते हैं जबकि शाम का वक्त होता है कल्याण, श्याम कल्याण और यमन राग पर बेस्ड गीतों का।
जैसा कि मैने कहा, जब हम छोटे थे तो पहाडों में होली बडे ही उत्साह से मनाते थे, हमारी होली लगभग एक हफ्ते पहले शुरू हो जाती थी, दिन के वक्त महिलाओं की बैठकी होली और रात को आदमियों की खडी होली। जिसमें हम चीर (होली की चीर, एक वृक्ष) के चारों ओर नाचते हुए पहले बहुत सारे गीत गाते और फिर भोजन, ये सब चलता रहता होलिका दहन तक। वैसे मैं बता दूँ हर दिन गाने वाले गाने अलग अलग होते थे, मुझे सारे तो याद नही लेकिन उनमें से दो गानों की पहली पहली लाईने कुछ यूँ हैं (ये दोनों होली नीचे लिखी हुई हैं) -
१. झनकारो, झनकारो, झनकारो, गोरी प्यारो लगो तेरो झनकारो
२. बलमा घर आयो, फागुन में, बलमा घर आयो फाहुन में
पिछले साल मैने यहाँ अमेरिका में भी बैठकी होली की थी, और उसके बाद उसके बारे में लिखा था। आज उसी आलेख में से कुछ चुनकर यहाँ दोबारा लिख रहा हूँ।
कुमाँऊ में हो या वहाँ से बाहर होलियार होली की शुरूवात ज्यादातर जिस होली से करते हैं वो है - “सिद्धि को दाता, विघ्न विनाशन, होली खेलें गिरिजापति नंदन“, इसलिये हमने भी पहले इसी का जिक्र कर दिया। चूँकि वक्त की कमी थी इसलिये हमने ज्यादा होलियां तो नही गायीं लेकिन जो गायीं पहले वो बता देता हूँ।
वैसे तो आजकल यमुना इतनी गहरी नही रह गयी है लेकिन जब ये होली लिखी गयी होगी तब जरूर रही होगी -
जल कैसे भरूं जमुना गहरी -२
ठाडी भरूं राजा राम जी देखें
बैठी भरूं भीजे चुनरी
जल कैसे…
धीरे चलूं घर सास बुरी है
धमकि चलूं छलके गगरी
जल कैसे…
गोदी में बालक सिर पर गागर
परवत से उतरी गोरी
जल कैसे…
शुरूआत में गाने वाले हम बहुत कम थे इसलिये हम लोगों ने महिला होलियारों (नेताओं के महिला वोटरों को रिझाने वाले अंदाज में) को रिझाने के लिये शुरू किया -
रंग में होली कैसे खेलूं री मैं सांवरियाँ के संग….
अबीर उडता गुलाल उडता, उडते सातों रंग
भर पिचकारी सनमुख मारी, अंखियाँ हो गयी बंद…
तबला बाजे, सारंगी बाजे, और बाजे मृदंग
कान्हा जी की बांसुरी बाजे, राधा जी के संग…
रंग में होली कैसे खेलूं री मैं सांवरियाँ के संग….
इसका फायदा भी देखने में आया, होलियारों की संख्या बढ़ने लगी उसके बाद एक और होली गायी थी जो अभी याद नही आ रही और उस होली की कॉपी लाना भी मैं भूल गया। लेकिन वो शुरू हाँ हाँ हाँ से होती थी। अब हाँ हाँ से शुरू होने वाली तो काफी होलियां हैं, दो मैं बता देता हूँ अगर आप को कोई और याद हो तो बतायें। ये दो है -
1. हाँ हाँ हाँ, छैला खेलो ना होरी
2. हाँ हाँ हाँ मोहन गिरधारी, हो-हो-हो मोहन गिरधारी,
ओ ऐसो अनाड़ी चुनर गयो फाडी, हंसी-हंसी दे गयो गारी
फिर रंग में होली कैसे खेलूँगी वाली होली दोबारा गाई गयी वैसे ही जैसे किसी किसी फिल्म में एक ही गाना पहले पुरूष आवाज में होता है फिर महिला गायिका की आवाज में। अब चूँकि हम सब लोग इधर-उधर से हांक कर लाये गये थे इसलिये शुरू शुरू में हमारे रंभाने के स्वर सुर और ताल में थोड़ा बेताला हो रहे थे। लेकिन फिर बुजुर्ग होलियारों के स्टेज संभालने के बाद थोड़ा लय बना और जोगी ने दरवाजे में दस्तक दी -
जोगी आयो शहर में व्योपारी -२
अहा, इस व्योपारी को भूख बहुत है,
पुरिया पकै दे नथ-वाली,
जोगी आयो शहर में व्योपारी।
अहा, इस व्योपारी को प्यास बहुत है,
पनिया-पिला दे नथ वाली,
जोगी आयो शहर में व्योपारी।
अहा, इस व्योपारी को नींद बहुत है,
पलंग बिछाये नथ वाली
जोगी आयो शहर में व्योपारी -२
आजकल मार्केट में वैसे ही मंदी का दौर चल रहा है तो इस व्यापारी को भी नही पूछा गया और हम सारे होलियारों को हो हो, हो नगरे, होली है कहते हुए स्टेज से रूखसत होना पड़ा। क्योंकि सांस्कृतिक कार्यक्रमों का नंबर जो था। बरहाल स्टेज के बाद हमने एक दो लोगों से अफसोस जताया कि बेस्ट होली तो हमने गायी ही नही, दरअसल ये होली बेस्ट, सिर्फ लड़को के बीच ही मानी जाती है। वो होली है -
झनकारो झनकारो झनकारो
गौरी प्यारो लगो तेरो झनकारो - २
तुम हो बृज की सुन्दर गोरी, मैं मथुरा को मतवारो
चुंदरि चादर सभी रंगे हैं, फागुन ऐसे रखवारो।
गौरी प्यारो…
सब सखिया मिल खेल रहे हैं, दिलवर को दिल है न्यारो
गौरी प्यारो…
अब के फागुन अर्ज करत हूँ, दिल कर दे मतवारो
गौरी प्यारो…
भृज मण्डल सब धूम मची है, खेलत सखिया सब मारो
लपटी झपटी वो बैंया मरोरे, मारे मोहन पिचकारी
गौरी प्यारो…
घूंघट खोल गुलाल मलत है, बंज करे वो बंजारो
गौरी प्यारो लगो तेरो झनकारो -२
हमारी रंग लगी हुई होली गाती तस्वीरें और क्लिप सहारा और TV एशिया में दिखायी जा चुकी हैं। अब कुछ उन होली की बता देते हैं जो पसंदीदा होलियों में से हैं और जिन्हें हम गाने से रह गये -
बलमा घर आयो फागुन में -२
जबसे पिया परदेश सिधारे,
आम लगावे बागन में, बलमा घर…
चैत मास में वन फल पाके,
आम जी पाके सावन में, बलमा घर…
गऊ को गोबर आंगन लिपायो,
आये पिया में हर्ष भई,
मंगल काज करावन में, बलमा घर…
प्रिय बिन बसन रहे सब मैले,
चोली चादर भिजावन में, बलमा घर…
भोजन पान बानये मन से,
लड्डू पेड़ा लावन में, बलमा घर…
सुन्दर तेल फुलेल लगायो,
स्योनिषश्रृंगार करावन में, बलमा घर…
बसन आभूषण साज सजाये,
लागि रही पहिरावन में, बलमा घर…
एक और मजेदार होली है -
शिव के मन माहि बसे काशी -२
आधी काशी में बामन बनिया,
आधी काशी में सन्यासी, शिव के मन
काही करन को बामन बनिया,
काही करन को सन्यासी, शिव के मन…
पूजा करन को बामन बनिया,
सेवा करन को सन्यासी, शिव के मन…
काही को पूजे बामन बनिया,
काही को पूजे सन्यासी, शिव के मन…
देवी को पूजे बामन बनिया,
शिव को पूजे सन्यासी, शिव के मन…
क्या इच्छा पूजे बामन बनिया,
क्या इच्छा पूजे सन्यासी, शिव के मन…
नव सिद्धि पूजे बामन बनिया,
अष्ट सिद्धि पूजे सन्यासी, शिव के मन…
होली के गीतों में ज्यादातर, शिव, राधा-कृष्ण और राम-सीता का उल्लेख भी मिलता है। ऐसी ही एक होली है -
हाँ हाँ जी हाँ, सीता वन में अकेली कैसे रही है
कैसे रही दिन रात, सीता वन में…
हाँ हाँ जी हाँ, सीता रंग महल को छोड़ चली है
वन में कुटिया बनाई, सीता वन में…
हाँ हाँ जी हाँ, सीता षटरस भोजन छोड चली है
वन में कन्दमूल फल खाई, सीता वन में…
हाँ हाँ जी हाँ, सीता तेल फुलेल को छोडि चली है
वन में धूल रमाई, सीता वन में…
हाँ हाँ जी हाँ, सीता कंदकारो छोड़ चली है
कंटक चरण चलाई, सीता वन में
कैसे रही दिन रात, सीता वन में।
काश फिर कभी मैं किसी होली में जाकर देख पाता कि अभी भी वो मस्ती, गीत और मदहोशी का आलम वैसे ही बरकरार है या फिर वक्त के साथ कहीं खो गया है।
अब सुनिये ओ परूवा बोजू वाले शेरदा अनपढ़ की होली पर ये कुमाऊँनी कविता, शुरूआत ही देखिये क्या मजेदार हैं, शेरदा कहते हैं - मोहना मुझे पिचकारी मत मारो मैं पहले ही महंगाई का मारा हूँ। कंट्रोल (राशन) की धोती पहनी है वो भी पूरी तरह चिर (फट, फाड़ डाली) चुकी है। आगे खुद सुनिये (सुनने के लिये प्ले के साईन पर क्लिक कीजिये) -
होली पर हिंदी फिल्मों के कुछ ९ गीत मैंने अपने गीत गाता चल ब्लोग में पोस्ट किये हैं उन्हें आप वहाँ जाकर सुन सकते हैं।
[ये पूरा आलेख पिछले तीन सालों में लिखे होली के लेखों के अंश लेकर लिखा गया है - 2006 में लिखा आलेख, 2007 में लिखा आलेख और 2008 में लिखा आलेख]
Tags: festivals and local fair, holi-songs, kumaoni-holi, kumaoni-holi-geet lyrics, poem, sherda-anpadh, uttarakhand
उत्तरांचल में आने का धन्यवाद, क्या आपको ये आलेख पसंद आया, क्यों नही आप टिप्पणी के रूप में अपने विचार भी प्रकट करें। और अगर चाहें तो आप सब्सक्राइब भी कर सकते हैं, जब भी इस साईट पर नया कुछ पोस्ट होगा वो आपको आपकी ईमेल में मिल जायेगा।
















हा हा हा हा हा हा रंगों के पर्व होली की आपको बहुत बहुत हार्दिक शुभकामना .
शुभकामनाएं
आपको भी…
उमंगों की,
सब रंगों की,
हास की
परिहास की,
जी भर
उल्लास की,
अबीर की गुलाल की,
फागुन के
सुर-ताल की..
शुभकामनाएं.
हा हा हा हा हा हा रंगों के पर्व होली की आपको बहुत बहुत हार्दिक शुभकामना .
शुभकामनाएं
आपको भी…
उमंगों की,
सब रंगों की,
हास की
परिहास की,
जी भर
उल्लास की,
अबीर की गुलाल की,
फागुन के
सुर-ताल की..
शुभकामनाएं.
अरे वाह यहाँ तो होलिया गाई जा रही है.. अतिउत्तम… बहुत बहुत शुभकामनाए
हम से लोग जो अपने शहर से दूर हैं आप की बात को अच्छे से समझ सकते हैं…परंपरागत होली अब सिर्फ दूर दराज़ के ईलाकों में ही रह गयी है जहाँ अभी भी जीवन शांत और सौम्य है…जहाँ जीने के लिए घडी से जद्दो जहद नहीं करनी पड़ती..बहुत रोचक संस्मरण लिखा है आपने…
आपको होली की शुभकामनाएं.
नीरज
HAPPY HOLI SABHI UTTRAKHAND BHAIYO KO HOLI MUBARAK HO
thank you “Tarun ji” for info. of Holi festable.
tarun bhai bhud -bhud dhyanbad.
होली की मुबारकबाद,पिछले कई दिनों से हम एक श्रंखला चला रहे हैं “रंग बरसे आप झूमे ” आज उसके समापन अवसर पर हम आपको होली मनाने अपने ब्लॉग पर आमंत्रित करते हैं .अपनी अपनी डगर । उम्मीद है आप आकर रंगों का एहसास करेंगे और अपने विचारों से हमें अवगत कराएंगे .sarparast.blogspot.com
अरे वाह, पूरे के पूरे गीत अब तक याद हैं ?
होली शुभकामनायें !
कभी ‘बेर पाक्यौ बारामासा.. मोरे छैला’ भी प्रस्तुत करेंगे ?
अग्रिम आभार
HaPpY HoLi
enjoy with lots of colors n water
eat gujiyas n all
HAPPY HOLI
HaPpY HoLiiiiiiiiiii
enjoy with lots of colors n water
eat gujiyas n all
HAPPY HOLI
happy holi all farends theknsh
HoLy MuBaRaK.
Rajen
तरुण भाई,
आपको सपरिवार होली की शुभकामनायें, वैसे होली कल पूरे देश में खेली जा चुकी है, लेकिन पिथौरागढ़, अल्मोड़ा और बागेश्वर में आज छलड़ि मनाई जा रही है। सो……..
हमोर तरुण दा जी रौ हो लाख बरीष,
हो-हो होलि लागी रै…………….।
इस्सी कै लिखते रओ लाख बरीष,
हो-हो होलि लागी रै…………….।
उत्तराखण्ड रओ समृद्ध-शक्तिशाली-सम्पन्न,
हो-हो होलि लागि रै……………………॥
मेरी तकदीर से अब तेरा इरादा क्या है??????
कौन सी खताओं की मुझे रोज सजा देती है,मुश्किलें डाल के बस मौत का पता देती है …तेरा अब मेरी वफाओं मे और इजाफा क्या है ?????जिंदगी का ना जाने मुझसे और तकाजा क्या है ,इसके दामन से मेरे दर्द का और वादा क्या है????
सूनेपन का कोहरा ,मौन की बदहवासी ,तृष्णा की व्याकुलता,अलसाई पडती सांसों से ..उल्जती खीजती ,तेरे आहट की उम्मीद , समेटे एक शाम और ढली ….
मुझे गैर क्यूँ समझा ,,,अपना क्यूँ नहीं समझा
मुझे गैर क्यूँ समझा ,,,अपना क्यूँ नहीं समझा
बहुत आवारा है मेरा मन और भूल जाता है हवाओं में घटाओं में कभी जज़्बात की बाँहों में ….और नए नए सपने तराशने लगता है…
“आँखों में नमी दिल में तूफान सा क्यूँ है ”
“आँखों में नमी दिल में तूफान सा क्यूँ है ”
“अंधियारे की चादर पे,छिटकी कोरी चांदनी ..सन्नाटे मे दिल की धडकन ,मर्म मे डूबे सितारों का न्रत्य और ग़ज़ल…झुलसती ख्वाइशों की मुंदती हुई पलक ..मोहब्बत की सांसों की,आखरी नाकाम हलचल..पिघलते ह्रदय का करुण खामोश रुदन..”
Hi Tarun da,
Bright colors, water balloons, lavish gujiyas and …
melodious songs are the ingredients of a perfect Holi.
Wishing You A Very Happy and Wonderful Holi.
have fun
and thanks for the nice holi song.
rango bari masti or rago bara pyaar mubarak ho aapko holi ka tyohar.aap sabi ko holi ki subkamnae. holi ka pyaar bara geet bejne ke liye apka sukriya.
hello whatever i have seen uptill now in ur website is remarkable.continue the good job.wish u all the very best.