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अपराध बोध

January 4th, 2009 | 11 Comments | Posted in Reader's/Guest Column, Uttarakhand's Life

उत्तरांचल के पहाड़ और उन्हें काटती हुई सर्पनुमा सड़कें और सड़कों के ऊपर नीचे दिखते सीढ़ीनुमा खेत बहुत ही सुन्दर लगते हैं। इन्हीं खेतों के इर्दगिर्द नजर आते हैं छोटे छोटे गाँव, शायद किसी सैलानी का मन ये सब देखकर वहीं बसने का करता भी हो। लेकिन दूर से मनलुभावने वाले ये गाँवों के दृश्य अपने अंदर एक त्रासदी समेटे होते हैं। इनमें से अधिकाँश गाँवों में जवान पुरूष सिर्फ गिनती के ही होते हैं, अधिकाँशतया यहाँ रहते हैं बच्चे, बूढ़े और औरतें। औरतें जो खेत, परिवार और बच्चे सभी को संभालती हैं।

ज्यादातर आदमी भर्ती हो जाते हैं फौज में या फिर शहर चले जाते हैं रोजगार की तलाश में जो उनके परिवार को कम से कम दो वक्त की रोटी मुहया करा सकें क्योंकि पहाड़ी गाँवों की खेती से इतना नही उगता कि पेट के साथ साथ अन्य जरूरते पूरा कर सकें।

शहर में रहने वाला नौजवान जब अपने ऐसे ही किसी गाँव जाता है तो उसका मन भर उठता है अपराध बोध से। ऐसे ही कुछ भाव उठे देवेन्द्र कुमार पांडे के मन में जब वो अपने मूल गाँव बेल्कोट (बेरीनाग) पहली बार गये।

उन औरतों, बच्चों और बूढों के गाँव में
जिन्होंने अपनी आँखें अपनी हथेली पर ले रखी थीं,
घूमते हुए मैं अपराध बोध ग्रसित होने लगता हूँ।
खंडहर बन चुका मकान मुझे घूरने लगता है,
कुछ अस्पष्ट आवाजों का व्रृत कसता जाता है निरंतर
मेरे चारों तरफ।
उस भयावह नीरवता मे
मुझे दीख पड़ते हैं मेरे जैसे कई चेहरे
आपस में गड मड।
और फिर दूर जाती मोटर की आवाज
मुझे कंपा जाती है अन्दर तक।

अगली बार जब आप उत्तरांचल के किसी गाँव में भ्रमण के लिये जायें तो कोशिश करियेगा उस अपार सुन्दरता के पीछे अंदर झाँकने की शायद आपको भी उसके भीतर का खालीपन और उदासी नजर आ जाये।

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11 Responses to “अपराध बोध”

  1. दिनेशराय द्विवेदी Says:

    बहुत सही बात को उठाया गया है। धरती की सुंदरता के पीछे वहां के रहवासियों की पीड़ा होती है।
    पर्वतीय प्रदेशों का वैसा वि्कास नहीं हो सका जिस से वहाँ रोजगार के साधन भी बनते और पर्वतीय प्रकृति का संरक्षण भी।

  2. अशोक पाण्‍डेय Says:

    तरुण भाई, शायद उत्‍तर भारत के अधिकांश गांवों की कमोबेश यही त्रासदी है। युवक रोजगार की तलाश में बाहर चले जाते हैं और गांव में बच जाते हैं सिर्फ वृद्ध, महिलाएं और बच्‍चे। यह स्थिति इतनी आम है कि किसी पढ़े-लिखे युवक को लोग गांव में रहते देखते हैं तो हैरान होते हैं और पहली नजर में उसे निकम्‍मा समझते हैं। गांवों की सुंदरता के पीछे छुपी यह उदासी शाम के धुंधलके में और गहरी हो जाती है और लगता है कि अंदर कोई आरी-सी चीर रही है।

  3. Dr.anurag Says:

    यकीनन आपने उस उदासी को आज महसूस करवाया है जो…उन घने पहाडो के बीच छुपी रहती है खामोश …कविता कही गहरे तक उतर गई .मन में..

  4. ghughutibasuti Says:

    यह तो हमारे पहाड़ की एक बड़ी त्रासदी है। आशा है कोई कभी पहाड़ में भी पैसा लगाकर ऐसे उद्योग लगाएगा जिनसे नौकरियाँ भी मिलेंगी और प्रदूषण भी न होगा।
    घुघूती बासूती

  5. H. P. Lakhera Says:

    ekdam sahi baat kahee hai. jab bhi apne gaon jata hoon to sara romantic mood do din me hi saf ho jata hai. gaon me o log hain jo kahin nahi ja sakte bachche, boodhe aur auraten jinhein unke husbands arthik karanon se apne satth nahi rakh sakte. gaon ke ladke aur ladkion ko school jate dekhta hoon to lagata hai samaya badlega. issi ummeed par bar bar gaon lotata hoon

    Lakhera

  6. MUSAFIR JAT Says:

    भाई, आप बिलकुल ठीक कह रहे हो.
    मैं भी दो दिन अल्मोडा के एक गाँव में रहा हूँ. मैंने ये त्रासदी देखी है.

  7. RAKESH JUYAL Says:

    लेकिन अब तो पहाड़ भी हरिरयाली को तरस रहे हैं उन्हे तो हमने काट-काट कर इमारतो मे तब्दील कर दिया हैं जहां देखो मकान ही मकान आपके अभी खुशकिस्मत हैं कि आपका गांव अभी गांव ही हैं शहर में तब्दील नही हुआ
    http://pahar1.blogspot.com

  8. Surendra Singh Mehra Says:

    It was a good feelings, and just like that something touched my heart. I also have a home sickness. I appreciate for your kind efforts and contact me by email. thanks

  9. chatar singh pundir Says:

    uttrakhand good state

  10. bhupee Says:

    hi i also really like kumao i want also do something for uttranchal if ican do something for ut contact me by my email

  11. bhupee Says:

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बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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