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मकर संक्रान्तिः घुघुतिया और मेले ही मेले

जनवरी माह में उत्तर भारत में मकर संक्रान्ति, दक्षिण में पोंगल और पंजाब में लोहड़ी बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर में उत्तराखंड में एक अलग ही नजारा देखने को मिलता है, कुमाँऊ में अगर आप मकर संक्रान्ति में चले जायें तो आपको शायद कुछ ये सुनायी पड़ जाय -

काले कौव्वा, खाले,
ले कौव्वा पूड़ी,
मैं कें दे (ठुल-ठुलि या भल-भलि, ऐसा ही कुछ है ठीक से याद नही),
ले कौव्वा ढाल,
दे मैं कें सुणो थाल,
ले कौव्वा तलवार,
बणे दे मैं कें होश्यार।

साथ में दिखायी देंगे गले में तलवार, ढाल, दाड़िम का फूल, डमरु, खजूर, घुघुति और नारंगी की माला पहने हुए छोटे-छोटे बच्चे (इसी का जिक्र मैने अपनी पिछली पोस्ट की गजल में किया था)। पहले मकर संक्रान्ति के महत्व के बारे में जानते हैं फिर बताते हैं कि इस अवसर पर उत्तराखंड में क्या रौनक रहती है।

मकर संक्रान्ति का महत्व
शास्त्रों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि इस दिन सूर्य (भगवान) अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर जाते हैं। अब ज्योतिष के हिसाब से शनिदेव हैं मकर राशि के स्वामी, इसलिये इस दिन को जाना जाता है मकर संक्रांति के नाम से। सर्वविदित है कि महाभारत की कथा के अनुसार भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही दिन चुना। यही नही, कहा जाता है कि मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थी। यही नही इस दिन से सूर्य उत्तरायण की ओर प्रस्थान करते हैं, उत्तर दिशा में देवताओं का वास भी माना जाता है। इसलिए इस दिन जप- तप, दान-स्नान, श्राद्ध-तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी भी मान्यता है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है।

मकर संक्रान्ति के दिन से ही माघ महीने की शुरूआत भी होती है। मकर संक्रान्ति का त्यौहार पूरे भारत में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन देश के अलग अलग हिस्सों में ये त्यौहार अलग-अलग नाम और तरीके से मनाया जाता है। और इस त्यौहार को उत्तराखण्ड में “उत्तरायणी” के नाम से मनाया जाता है। कुमाऊं क्षेत्र में यह घुघुतिया के नाम से भी मनाया जाता है तथा गढ़वाल में इसे खिचड़ी संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है। इस अवसर में घर घर में आटे के घुघुत बनाये जाते हैं और अगली सुबह को कौवे को दिये जाते हैं (ऐसी मान्यता है कि कौवा उस दिन जो भी खाता है वो हमारे पितरों (पूर्वजों) तक पहुँचता है), उसके बाद बच्चे घुघुत की माला पहन कर कौवे को आवाज लगाते हैं – काले कौव्वा काले, मेरी घुघुती खाले

कुमाँऊ के गाँव-घरों में घुघुतिया त्यार (त्यौहार) से सम्बधित एक कथा प्रचलित है। ऐसा कहा जाता है कि किसी एक एक राजा का घुघुतिया नाम का कोई मंत्री राजा को मारकर ख़ुद राजा बनने का षड्यन्त्र बना रहा था लेकिन एक कौव्वे को ये पता चल गया और उसने राजा को इस बारे में सब बता दिया। राजा ने फिर मंत्री घुघुतिया को मृत्युदंड दिया और राज्य भर में घोषणा करवा दी कि मकर संक्रान्ति के दिन राज्यवासी कौव्वों को पकवान बना कर खिलाएंगे, तभी से इस अनोखे त्यौहार को मनाने की प्रथा शुरू हुई।

यही नही मकर संक्रान्ति या उत्तरायणी के इस अवसर पर उत्तराखंड में नदियों के किनारे जहाँ-तहाँ मेले लगते हैं। इनमें दो प्रमुख मेले हैं – बागेश्वर का उत्तरायणी मेला (कुमाँऊ क्षेत्र में) और उत्तरकाशी में माघ मेला (गढ़वाल क्षेत्र में)

बागेश्वर का उत्तरायणी मेला
इतिहास कारों की अगर माने तो माघ मेले यानि उत्तरायणी मेले की शुरूआत चंद वंशीय राजाओं के शासनकाल से हुई, चंद राजाओं ने ही ऐतिहासिक बागनाथ मंदिर में पुजारी नियुक्त किये। यही ही नही शिव की इस भूमि में उस वक्त कन्यादान नहीं होता था।

पुराने जमाने से ही माघ मेले के दौरान लोग संगम पर नहाने थे और ये स्नान एक महीने तक होते थे। यहीं बहने वाली सरयू नदी के तट को सरयू बगड़ भी कहा जाता है। इसी सरयू के तट के आस-पास दूर-दूर से माघ स्नान के लिए आने वाले लोग छप्पर डालना प्रारंभ कर देते थे। तब रोड वगैरह नही होती थी तो दूर-दराज के लोग स्नान और कुटुम्बियों से मिलने की लालसा में पैदल ही चलकर आते। पैदल चलने की वजह से महीनों पूर्व ही कौतिक (मेला) के लिये चलने का क्रम शुरु होता। धीरे-धीरे स्वजनों से मिलने के लिये जाने की प्रसन्नता में हुड़के की थाप भी सुनायी देने लगी फलस्वरुप मेले में लोकगीतों और नृत्यों की महफिलें जमनें लगी। प्रकाश की व्यवस्था अलाव जलाकर होती, कँपकँपाती सर्द रातों में अलाव जलाये जाते और इसके चारों ओर झोड़े, चांचरी, भगनौले, छपेली जैसे नृत्यों का मंजर देखने को मिलता। दानपुर और नाकुरु पट्टी की चांचरी होती, नुमाइश खेत में रांग-बांग होता जिसमें दारमा लोग अपने यहाँ के गीत गाते। सबके अपने-अपने नियत स्थान थे, नाचने गाने का सिलसिला जो एक बार शुरु होता तो चिड़ियों के चहकने और सूर्योदय से पहले खत्म ही नहीं होता।

धीरे-धीरे धार्मिक और सांस्कृतिक रुप से समृद्ध यह मेला व्यापारिक गतिविधियों का भी प्रमुख केन्द्र बन गया, भारत और नेपाल के व्यापारिक सम्बन्धों के कारण दोनों ही ओर के व्यापारी इसका इन्तजार करते। तिब्बती व्यापारी यहाँ ऊनी माल, चँवर, नमक व जानवरों की खालें लेकर आते। भोटिया-जौहारी लोग गलीचे, दन, ऊनी कम्बल, जड़ी बूटियाँ लेकर आते, नेपाल के व्यापारी लाते शिलाजीत, कस्तूरी, शेर व बाघ की खालें। स्थानीय व्यापारी भी अपने-अपने सामान को लाते, दानपुर की चटाइयाँ, नाकुरी के डाल-सूपे, खरदी के ताँबे के बर्तन, काली कुमाऊँ के लोहे के भदेले, गढ़वाल और लोहाघाट के जूते आदि सामानों का तब यह प्रमुख बाजार था। गुड़ की भेली और मिश्री और चूड़ी चरेऊ से लेकर टिकूली बिन्दी तक की खरीद फरोख्त होती, माघ मेला तब डेढ़ माह चलता। दानपुर के सन्तरों, केलों व बागेश्वर के गन्नों का भी बाजार लगता और इनके साथ ही साल भर के खेती के औजारों का भी मोल भाव होता।

उत्तरकाशी का माघ मेला
उत्तरकाशी में माघ मेला काफी समय से मनाया जा रहा है ये धार्मिक, सांस्कृति तथा व्यावसायिक मेले के रूप में प्रसिद्ध है। इस मेले का शुभारंभ प्रतिवर्ष मकर संक्राति के दिन पाटा-संग्राली गांवों से कंडार देवता और अन्य देवी देवताओं की डोलियों के उत्तरकाशी पहुंचने से होता है। यह मेला 14 जनवरी (मकर संक्राति) से प्रारम्भ हो कर 21 जनवरी तक चलता है। इस मेले में जिले के दूर दराज से धार्मिक प्रवृत्ति के लोग जहाँ भागीरथी नदी में स्नान के लिये आते है। वहीं सुदूर गांव के ग्रामवासी अपने-अपने क्षेत्र से ऊन एवं अन्य हस्तनिर्मत उत्पादों को बेचन के लिये भी इस मेले में आते है। इसके अतिरिक्त प्राचीन समय में यहाँ के लोग स्थानीय जडी-बूटियों को भी उपचार व बेचने के लिये लाते थे लेकिन सरकार ने अब इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया है।

उत्तरकाशी बाबा विश्वनाथ जी की नगरी के रूप में भी प्रसिद्ध है इसलिये कई शिव भक्त भी दूर दूर से इस मेले में हिस्सा लेने आते हैं। वर्तमान काल में यह मेला धार्मिक एवं सांस्कृतिक कारणों के अलावा पर्यटक मेले के रूप में भी अपनी पहचान बना रहा है। यही वजह है कि आजकल के दौर में इस मेले में सर्कस वगैरह भी देखने को मिलता है। यही नही साल के उस महीने में होने के कारण जब इस क्षेत्र में अत्यधिक बर्फ रहती है पर्यटन विभाग ने दयारा बुग्याल को स्कीइंग सेंटर के रूप में विकसित कर इस क्षेत्र को पर्यटन के लिये भी प्रचारित किया है।

अंत में, सबै भै बैणियों के मकर संक्रान्तिक ढेर सारि मुबारकवाद -

काले कौवा काले , घुघुति बड़ा खाले,
लै कौवा बड़ा, आपू सबुनै के दिये सुनक ठुल ठुल घड़ा,
रखिये सबुने कै निरोग, सुख सम़ृद्धि दिये रोज रोज।

अर्थात, सभी भाई बहिनों को मकर संक्रान्ति की बहुत बहुत बधाई -

काले कौवा आकर घुघुति (इस दिन के लिये बनाया गया पकवान) बड़ा (उड़द का बना हुआ पकवान) खाले,
ले कौव्वे खाने को बड़ा ले, और सभी को सोने के बड़े बड़े घड़े दे,
सभी लोगों को स्वस्थ्य रख, हर रोज सुख और समृद्धि दे।

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22 Responses to “मकर संक्रान्तिः घुघुतिया और मेले ही मेले”

  1. dinesh Says:

    Thanks for this…………….

  2. ghughutibasuti Says:

    आपको भी मकर संक्रान्ति की बधाई। हर दिन शुभ रहे।
    घुघूती बासूती

  3. harish soniyal Says:

    aap sabhi ko makar sakranti ke subhu absar per dher shari khuseon meley

  4. bhagwat singh Says:

    happy maker sakrati………..
    kale – kawa kale
    guguti bara khale
    le kawa guguti bar
    mi gi dedhe sunu ghur…….. bhagwat

  5. Rajen Says:

    तरुण जी नमस्कार….आपकी पोस्ट क्या पढी, अपना तो ‘त्यार’ ही हो गया. आपको मकर संक्रांति की बधाई है महाराज. धन्यबाद.
    राजेन….

  6. maya bhatt (kandpal) Says:

    thanks Tarun,tumhe ghughuti tyohar ki badhayi,here in England,nothing much happening but I called home(india) aur bachpan ki sari yadey taza ho hai,woh ghughuti ki mala pahan kar ghoomna,anyway thanks for all this information,

  7. पंकज सिंह महर Says:

    तरुण भाई,
    सर्वप्रथम आपको मकर संक्रान्ति और घुघुतिया त्यार की बधाई। बहुत सुन्दर आलेख है, यह त्यौहार पिथौरागढ़ और बागेश्वर जनपद में कल रात यानी मसान्ति के दिन ही मना लिया जाता है…इस क्षेत्र में कल रात ही घुघुत बन गये और आज सुबह कौव्वों को खिला दिये गये “काले कौव्वा का-का, पूष की रोटी माघे खा” कहकर। आज सबह यहां घरों में बनाई गई होगी मास और चावल की शुद्ध खिचड़ी (बिना लहसुन प्याज की) बाकी क्षेत्र में यह त्यौहार आज रात बनाया जायेगा और कल कौव्वों को घुघुत दिये जायेंगे।

    इस त्यौहार का महत्व बहुत ज्यादा है, क्योंकि जब तक हम पहाड़ रहे, मैने आज के दिन कोई कौआ बिना नहाया नहीं देखा…….।

    जय उत्तराखण्ड!

  8. पंकज सिंह महर Says:

    तरुण भाई,
    सर्वप्रथम आपको मकर संक्रान्ति और घुघुतिया त्यार की बधाई। बहुत सुन्दर आलेख है, यह त्यौहार पिथौरागढ़ और बागेश्वर जनपद में कल रात यानी मसान्ति के दिन ही मना लिया जाता है…इस क्षेत्र में कल रात ही घुघुत बन गये और आज सुबह कौव्वों को खिला दिये गये “काले कौव्वा का-का, पूष की रोटी माघे खा” कहकर। आज सबह यहां घरों में बनाई गई होगी मास और चावल की शुद्ध खिचड़ी (बिना लहसुन प्याज की) बाकी क्षेत्र में यह त्यौहार आज रात बनाया जायेगा और कल कौव्वों को घुघुत दिये जायेंगे।

    इस त्यौहार का महत्व बहुत ज्यादा है, क्योंकि जब तक हम पहाड़ रहे, मैने आज के दिन कोई कौआ बिना नहाया नहीं देखा…….।

    जय उत्तराखण्ड!

  9. mukul nainwal Says:

    happy ghughuti day…to 2 all n thanx..for mail

  10. राम दत्त तिवारी-दुबई से Says:

    तरुनजी “मकर संक्रांति” त्योहार की बहुत-बहुत बधाइया, आपने विस्तार से इस त्योहार के बारे मे जानकारी बाटी जिसके लिए आपको हार्दिक धन्यवाद, भविस्य मे भी पत्र ब्यव्हार करते रहेंगे यही आशा करता हू.

  11. kartik adhikari Says:

    thanks for the information in such commercial lifestyle when we are going away from our roots again thanks for the rechnology who provide us these kind of informations.

  12. Jagga Kandpal Says:

    Mayer Uttrakhandi Washio Aap logu Kai Ghughuti Tyar K Hardhik Sub Kamnai Chhu . Ghughuti Ke Bari aai Gay Tik Push Chori MagMaa.
    Jub Lagu Mayl Bageswar Maa Tab Dhikeeni Sab Uttarkashi wall.
    Kale Kauwa Kale ghuti Mall Kha Lay , Tu Lijha Bair U K Washi Logu Kai Deja Sunak Ghor.

  13. hem pandey Says:

    इस लेख को पढ़ कर प्रवासी पहाडियों की वह पीढ़ी लाभान्वित होगी जो प्रवास में ही पली बढ़ी है.साधुवाद.

  14. RAKESH JUYAL Says:

    अपनोँ से ही बेगानी हो गई फूलों की घाटी

    अपनों की अनदेखी ही फूलों की घाटी को भारी पड़ गई। इसी बेगानेपन का नतीजा रहा कि देश विदेश में मशहूर उत्तराखंड की यह घाटी दुनिया के सात प्राकृतिक आश्चर्यों की दौड़ में टिकी न रह सकी। न्यू सेवन नेचुरल वंडर्स प्रतियोगिता में यह वैली दूसरे राउंड में जगह नहीं बना पाई। हालांकि भारत की उम्मीद अभी पूरी तरह से टूटी नहीं है। असम का काजीरंगा नेशनल पार्क प्रतियोगिता के दूसरे राउंड में जगह बनाने में सफल रहा। दुनिया के सात प्राकृतिक आश्चर्यो के चयन के लिए पुर्तगाल की संस्था न्यू सेवन वंडर्स फाउंडेशन यह ऑन लाइन प्रतियोगिता करा रही है।

  15. समीर लाल Says:

    मकर सक्रांति की शुभकामनाये.

    आभार इस ज्ञानवर्धक पोस्ट का.

  16. लावण्या Says:

    मकर सँक्राति पर आपको सपरिवार शुभकामनाएँ

  17. kailash.goshwami Says:

    mere tarf se sub uttarancahal wasio ko namasakar our uttarayani mela ke subh kaamanaye danywad

  18. Hem Pant Says:

    Happy Makar Sankranti to all.

    I found a chance to visit Bageshwar Kauthig this year for the first time. That’s a great experience.

  19. Narain Dutt Pandey Says:

    Happy Makar Sankranti to all of you

  20. RA Says:

    धन्यवाद तरुण ,
    आशा है हमारे यहाँ से भेजे मीठे खजूरे मिले होंगे | आज ब्लॉग जगत के तीन अलग अलग तरह लेख काले कौवा के त्यौहार पर पढ़कर आनन्द आ गया | यूँ तो बचपन मेरा मध्य प्रदेश में बीता लेकिन पहाड़ी तीज त्यौहार हमेशा घर में खूब उत्साह से मनाये जाते थे | उसी का कुछ अंश यहाँ अमरीका में अपने बेटे को दे सकूं ,ऐसा प्रयास रहता है |

  21. Vineeta Yashswi Says:

    Aap ko bhi makar sankranti (Kaale Kauwa) ki shubhkaamnaye.

    is post se mujhe kafi jankariya mili hai. Dhanyawaad.

  22. ghanshyam Says:

    happy belated makar sakranti

    ghanshyam
    gram : bazan

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

टिप्पणियों का शटर कुछ दिनों ही खुला रहता है। असुविधा के लिये हम से भूल हो रही है हमका माफी देयीदो, अच्छा कहो, चाहे बुरा कहो....हमको सब कबूल, हमका माफी देयीदो।