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ओ पहाड़, मेरे पहाड़!

November 25th, 2008 | 16 Comments | Posted in Reader's/Guest Column

हमारे पहाड़ों में एक चिड़िया होती है जिसका नाम है घुघूती, इसका जिक्र अक्सर किसी ना किसी गीत में सुनने को मिल ही जाता है। बरसों पहले की बात है, ऐसी ही एक घुघूती ने एक दिन अपने पंख फैलाये, मुँह में बासुती का एक तिनका दबाया और उड़ चली मैदानों की ओर एक नई दुनिया तलाशने, एक नया घरोंदा बनाने।

विशाल समुद्र को देख ठीठक कर रूकी और वहीं आशियाना बना डाला, वक्त बीतता गया, नयी दुनिया को जानने, समझने, आशियाना और घर संभालने में वो पहाड़ चुपके से कब बैकग्राउंड में चला गया उस घुघूती को पता नही चला। लेकिन वो पहाड़ निश्चल शांत दिल के अंदर पड़ा रहा, छुटा नही। फिर एक दिन फुरसत के चंद लम्हों में घुघूती को नजर आया वो पहाड़ और उसके नजर आते ही खुल पड़ी यादों की वो गठरी जो ना जाने कब से बंद सी दिल के किसी कोने में पड़ी थी और उस घुघूती का दिल गा उठा – ओ पहाड़, मेरे पहाड़!

ओ पहाड़, मेरे पहाड़,
बुला ले वापिस पहाड़
मन व्याकुल है पाने को
तेरी ठंडी बयार।

तेरे चीड़ और देवदार
दाड़िम,काफल और हिसालू
आड़ू,किलमोड़े और स्ट्रॉबेरी
मन होता है खाने को बारबार।

तेरी साँपों सी वे सड़कें
शेर के मुँह वाले वे नलके
वे चश्मे और वे नौले
वह स्वाद ठंडे मीठे पानी का।

ऊबड़ खाबड़ वे रस्ते
वे चीड़ के पत्तों की फिसलन
वे सीढ़ीदार खेत तेरे
वे खुशबू वाले धान तेरे।

नाक से बालों तक जाते
लम्बे और शुभ टीके
वे गोरी सुन्दर शाहनियाँ
वे सुन्दर भोली सैणियाँ।

स्वस्थ पवन का जोर जहाँ
घुघुती का मार्मिक गीत जहाँ
काफल पाक्यो त्यूल नईं चाख्यो
की होती गूँज जहाँ।

हर पक्षी कितना अपना है
हर पेड़ जहाँ पर अपना है
कभी शान्त तो कभी चट्टानें
बहा लाने वाली तेरी नदियाँ।

वे रंग बिरंगे पत्थर
मन चाहे समेटूँ मैं उनको
हीरे भी मुझे न मोह सकें
पर तेरे पत्थरों पर मोहित हूँ।

वह छोटा सा शिवाला है
वह गोल द्याप्त का मन्दिर है
हर शुभ काम में साथ मेरे
वे गोल देव जो द्याप्त तेरे।

वह चावल पीस एँपण देना
वह गेरू से लीपा द्वार मेरा
चूड़े अखरोट का नाश्ता
वे सिंहल और वे पुए।

पयो भात के संग पालक कापा,
और रसीला रसभात तेरा
बाल मिठाई और चॉकलेट
अब और कहूँगी तो रो दूँगी।

ओ पहाड़, मेरे पहाड़,
सुन ले तू पुकार
मेरे मन की पुकार
ओ पहाड़, मेरे पहाड़!

ये कविता घुघूतीजी ने लिखी है जो घुघूती बासूती के नाम से इसी नाम का ब्लोग चलाती हैं। ये शब्द भले ही उनके हों लेकिन हर उस पहाड़ी के दिल में कभी ना कभी ऐसे ही उद्गार और भावनायें जोर मारती होंगी। पहाड़ के प्रति ये प्यार ही है जो जहाँ देबिया को जिंदा रखे है वहीं घुघूती से भी पहाड़ छूटने के बावजूद कभी ना कभी गीत गवा ही देता है, कविता पढ़कर शायद आप भी कह उठें “घुघूती घुरोण लगी मेरे मैत की“।

शब्दार्थः

शाहनियाँ: शाह स्त्रियाँ, शाह कुमाँऊ(उत्तराखंड का पूर्वी भाग ) के साहूकार लोग होते हैं शायद।
सैणियाँ: स्त्रियाँ
घुघुती: एक पक्षी, देखिए घुघूती बासूती क्या है कौन है?
काफल पाक्यो त्यूल नईं चाख्यो: काफल ( एक फल) पक गया है , तूने नहीं चखा है। पहाड़ में एक पक्षी काफल पाक्यो बोलता है और बच्चे उसको चिढ़ाने को कहते हैं कि तूने नहीं चखा है ।
गोल द्याप्त: गोल देवता, हमारे इष्ट देव।
एँपण: कुँमाऊ में फर्श पर दी जाने वाली रंगोली
चूड़ा: घर में पूरे पकने से पहले कूटकर धान से बनाया हुआ स्वादिष्ट पोहा
सिंहल:पुए जैसा एक कुँमाऊनी पकवान जो हर शुभ काम में बनता है ।
पयो: कुमाँऊनी कढ़ी
कापा: पालक पीस कर बनाई एक विशेष सब्जी
रसभात: एक विशेष तरह का व्यंजन, रसभात वास्तव में रस और भात २ अलग-अलग हैं, भात पके हुए चावल को कहते हैं और रस विभिन्न दाने दार दालों से बना व्यंजन होता है जिसमें दालों को पकाकर फिर अलग कर दिया जाता है और उसे अलग से साईड डिश की तरह खाते हैं और दालों के दानों को अलग करने से बने या बचे रसदार व्यंजन को रस कहते हैं। रस को भात के साथ खाया जाता है इसलिये रसभात कहते हैं। रस उसमें पड़े मसालों और दालों की वजह से ठंडी में गर्मी देता है इसलिये ज्यादातर सर्दियों में बनता है।
बाल मिठाई: खोये की बनी एक कुमाँउनी मिठाई
चॉकलेट: एक मिठाई जो बाल मिठाई जैसी ही होती है । बाल मिठाई के बाहर होम्योपैथिक गोलियों जैसे मीठे दाने लगे होते हैं चॉकलेट के नहीं ।

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16 Responses to “ओ पहाड़, मेरे पहाड़!”

  1. दिनेशराय द्विवेदी Says:

    कविता पहले पढ़ चुका था, आज उस के शाब्दिक अर्थ भी जाने। वैसे कविता का भाव सीधे उतर जाता है।
    पर आप से अनेक जानकारियाँ भी मिलीं। आभार!

  2. अफ़लातून Says:

    बेहद खूबसूरत प्रस्तुति ।

  3. मुसाफ़िर जाट Says:

    तरुण जी, इस गीत को वैसे तो घुघूती के ब्लॉग पर पढ़ चूका हूँ. लेकिन अब पढ़कर भी मन में बड़ा ही सुकून सा मिला. मै भी अल्मोडा की वादियों में रह चूका हूँ.

  4. anil pusadkar Says:

    सुंदर पोस्ट, बहुत सुंदर चित्र और अति सुंदर रचना।

  5. समीर लाल Says:

    पहले भी पढ़ा था.

    आज आनन्द आ गया. आभार/

  6. परमजीत बाली Says:

    पहले भी पढा था।अच्छी पोस्ट है।आभार।

  7. dinesh Says:

    wah wah !!!!!!!!!!!!! good very nice………………
    I’m happy

  8. dinesh Says:

    wah wah !!!!!!!!!!!!! good very nice………………
    I’m happy,,,,,,,,,,,

  9. kaushlendra Says:

    o pahar, mere pahar bohot hji acha laga. pahar ki khas khushbu aur bayar in shabado me jhakti hain. behatrin kavita hai.

  10. Dr.Arvind Mishra Says:

    बहुत मार्मिक -ज़रा यह भी बताएं कि घुघूती चिडिया का क्या सचमुच भौतिक अस्तित्व या केवल काव्य विश्रुत पक्षी है यह?

  11. लावण्या Says:

    Had read this on Ghughuti ji’s blog but liked to hear the song with this poem so thank you Tarun bhai

  12. Ram Datt Tiwari Says:

    तरुण जी “आपने घुघूती का जो ज़िक्र किया है इस घुघूती की कहानी बिल्कुल हम लोगो पर फिट बैठती जो की पहाड़ से व अपनी मात्र भूमि से दूर हो गये है रोज़गार के खातिर और शहरो के होके रह गये , लेकिन फ़ुर्सत के क्षणो मे अपनी मात्र भूमि उत्तरांचल को याद करते है गीत संगीत के ज़रिए”
    जानकारी देने के लिए धन्यवाद- मैं राम दत्त तिवारी दुबई से

  13. maya Says:

    tarun,thanks,aik aur song hai agar aapko mil sake toh-ghur ghughuti ghur,maite ki narayi lagi,mait(maa ka ghar) meiro door,kabhi saaloh pahale ye geet suna tha,maan se gaya hi nahi,pichli baar India aaye the toh kathgodam tak hi jaa paye,agli baar almora tak zaroor jaoongi,thanks again

  14. deepak parihar Says:

    uttranchal is wander full place in the word. bhai visit ker ke meza aagaya.

  15. Pitambar Singh Negi Says:

    Uttranchal is really dev bhoomi hum thi bhulun ni chainu ch apru dev bhoomi thai.

  16. virender Says:

    uttranchal is my janmbhumi

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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