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हाँ वही ‘देबिया’

October 8th, 2008 | 29 Comments | Posted in Reader's/Guest Column

मेरे ब्लोग उत्तरांचल की एक पोस्ट ‘म्यार पहाड़‘ में कल देवेन्द्र कुमार पांडे के नाम से एक टिप्पणी आयी। ऐसी टिप्पणियाँ कभी कभी ही आती हैं और इस तरह की टिप्पणी का सही सम्मान उसको पोस्ट की शक्ल देना ही है। ये पढ़िये म्यार पहाड़ की कहानी देबिया की जुबानी -

मैं याने देवकीनंदन पांडे उर्फ़ डी. एन. पांडे पुत्र गंगा दत्त पांडे इस शहर के कई फलानों वल्द ढिकानों में से एक हूँ, जो विगत अनेक वर्षों से एक बोर रूटीन वाली जिन्दगी से चिपका हुआ है, जिसे आम तौर पर सामान्य जिन्दगी कहा जाता है | पर मेरे अन्दर एक और ‘मैं’ है जिसका कई बार गला घोंटने के बाद भी वह एक उद्दंड बालक की तरह मेरे सामने आ खड़ा होता है। न जाने कहाँ ढील रह गयी इतने साल के ‘देशीपने’ के बाद भी कि यह साला कुकुरी का चेला ‘देबिया’ मेरे अन्दर जिंदा है। हाँ………….हाँ वही ‘देबिया’ जो काफलीगैर, कनालीछीना या खरई, खत्याड़ी या फ़िर गणई, गंगोली में कहीं रहता था या रहता है।

अब इस देबिया को कैसे समझाऊं कि मैं यहाँ,इस शहर में अदब -तमीज वाला एक संभ्रांत व्यक्ति हूँ | लोहा की हुई पतलून और बुशशर्ट पहनता हूँ | अपने मिलने वालों से ‘हेल्लो’ या ‘हाय’ करता हूँ | अंग्रेजी फ़िल्म या हिन्दी नाटक देखता हूँ | काफी हाउस में राजनीतिक या साहित्यिक बहस करता हूँ | हाथ में चुरुट और बगल में पत्रिका रखता हूँ | संक्षेप में इंटेलेक्चुअल-कम-सोफिस्टिकेटेड होने का दंभ भरता हूँ | अब इस साले देबिया को क्या मालूम कि आज कल ये सब करना कितना जरूरी है – रोटी खाने और पानी पीने से भी ज्यादा जरूरी।

लेकिन अपना देबिया रहा वही भ्यास का भ्यास | चाहता है कि मैं मैली कुचैली बंडी और पैजामा -जिसका नाड़ा कम से कम छै इंच लटका हो- पहन कर गोरु-बाछों का ग्वाला जाऊं, रास्ते में हिसालू,किलमोड़ी या काफल चुन-चुन कर खाऊँ,पत्थर के नीचे दबी बीड़ी के सुट्टे मारूं | पहाड़ के उस तरफ़ पहुँच कर धात लगाऊँ -गितुली………..गितुली वे उईईईईई और शाम को घर पंहुंच कर ईजा के सिसुणे की झपकार खाऊँ |

मेरे अन्दर का यह देबिया नामक जंतु असभ्यता की पराकाष्ठा पार करते हुए साबित करना चाहता है कि स्कूल में मास्सेप के झोले से मूंगफली चुराकर खाने और दंडस्वरूप जोत्याये जाने पर ‘ओ इजा मर गयूं‘ की हुंकार लगाने का आनंद किसी नाटक देखने से बढ़कर है | बकौल देबिया ‘लोहे की कढाई में लटपट जौला धपोड़ने या फ़िर धुंए और गर्मी के मिले जुले असर के बीच तेज मिर्च वाले सलबल रस-भात का स्यां-स्यां करते हुए और सिंगाणा सुड़कते हुए रसास्वादन करना, बिरयानी खाने से ज्यादा प्रीतकर है|

ये देबिया जब मोटर की भरभराट से उठ कर विस्फारित नेत्रों से रेल नामक चीज को देख रहा था, वह दृश्य मुझे अभी तक याद है | ‘बबा हो इसका तो अंती नहीं हो कका‘ उसने अपने कका से कहा था | धीरे-धीरे देबिया ऐसे कई चमत्कारों का अभ्यस्त हो चला था | अब उसकी आँखें विस्फारित न रह कर शून्य रहतीं,देबिया धीरे-धीरे गुम होता जा रहा था जीवन की आपाधापी में| मैं भी यही चाहता था| मुझे यकीन था की एक दिन देबिया सुसाइड कर लेगा, पर समय बीतने के साथ-साथ महसूस होने लगा की देबिया मरा नहीं है | अक्सर उसकी मंद-मंद आवाज़ मुझे सुनाई देती | धीरे-धीरे मेरा शक विश्वास में बदल गया कि देबिया जिंदा है- पूरी शिद्दत से | उसकी आवाज़ चीख में बदल गयी थी और वह मुझ पर हावी होने लगा था | इस देबिया से मैं हमेशा लड़ता रहता हूँ | बहुत गुस्सा आता है इस पर जब यह चीख-चीख कर कहता है -’होगा तू यहाँ लाट सैप कुकुरी के चेले, मुझे तो अभी तक तेरे पैजामे से चुरैन आ रही है|‘ गनीमत है कि उसकी यह चीख और कोई सुन नहीं पाता वरना मेरी सभ्यता के जामे की चिंदी-चिंदी हो जाती |

पर फुर्सत के क्षणों में जब कभी मैं सोचता हूँ तो लगता है कि क्या वह देबिया ही नहीं, जो हमारी तथाकथित गंवाड़ी सभ्यता को जिंदा रखने के लिए निरंतर जूझ रहा है और हमें हमारी ‘सभ्यता’ की परवाह किए बिना यह अहसास कराने से बाज नहीं आता कि अपनी मिट्टी की सोंधैन इन कपडों में लगे सेंट से अच्छी है।

मैं तो देबिया से यही कहूँगा कि इतना अच्छा लिखने वाले देबिया को जल्दी से अपना ब्लोग शुरू कर देना चाहिये, मदद के लिये ये नाचीज है। अगर ब्लोग नही शुरू करना है तो भी समय समय पर ऐसी ही टिप्पणी करते रहे, उन्हें पोस्ट की शक्ल देने को हम हैं ना आपके जोश्ज्यू।

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29 Responses to “हाँ वही ‘देबिया’”

  1. DEVENDRA KUMAR PANDEY Says:

    THANK YOU JOSHJYU. YEH ARTICLE BAHUT PEHLE LIKHA THA. IDHAR
    NET PAR YEH SITE MILI TO SOCHA YEHAN PAR POST KAR DU. YEH HAR
    PRAVASI PAHARI KI KAHANI HAI.

    HINDI MAIN TYPE NAHI KAR PATA JALDI HI KUCHCH ARTICLE DUNGA.

  2. Lalit Bisht Says:

    dev daa ne bahut achhee article lega meri taraf se bahut bahut subhkamnaye– Lalit Bisht.

  3. Mukul Nainwal Says:

    Aaj kafe time ka bad kuch esa mil jesko padna ka bad mai kay sabhe kuch na kuch purana yaad aayaga jesko hu, kafe time phela bhool gaya tha.Bahut aacha tha article.kuch purane yaad ko taza karna wala.

  4. kaushlendra prapanna Says:

    bohot hi marmsparsi dastan hai. ek pahadi janjivan ka shashrikaran ka. sadhuvad.

  5. ghughutibasuti Says:

    hehe,wah,maja aa gaya. ye debiya to koi apna hi bhai bandhu lagta hai. yaad kiya ki koi cousin devki nanadan to nahi. parantu 1st cousin to nahi hai is naam ka. khair, pahadi hone ka yahi to anand hai ki jahan do log baithe, kahin na kahin se jud hi jaate hain, ya biradari se, rishton se ya phir common yadon se.
    lekh bahut hi jeevant hai. bhavisya mein bhi inka likha padhne ko mile to aanand aayega.
    ghughuti basuti

  6. suman Says:

    very good yaar

  7. TRILOCHAN MATHPAL Says:

    DEBI DAA,
    THANKS FOR SO LIVE PRESENTATION OF KUMAUNNI CULTURE,

    AAPKA LIKHA PADHKAR APNA BACHPAN JO KAHIN KHO GAYA THA FIR SE MIL GAYA AUR MAN EK BAR PAHADO KI WADIYON MEIN SAIR KARNE LAGA.

    CARRY ON
    THANKS ONCE AGAIN

  8. Nandan ( TILE DHARO BOLA) ORKUT Says:

    Hello Joshi jue yar to Debia to Bahute Bhal Miyas chhu yar
    Myor Digari Chhu ho Mahraaz yo Khatiyari runi chhi yo To

    Its realy Tuching yar keep it up

    thanx

  9. Parvaasi Pravasi Says:

    देब दा मनोहरश्याम जोशी जी के “कसप” से बुरी तरह परभावित हैं

  10. Madan Mohan Joshi "Shelshikher" Says:

    Aap to Bajab kar gaye ho Dajuyu, ye Deviya hi to hai jo aaj Pahar ki Sanskriti ko kayaam rakhe hain warna Devendara to pad likh ka Thul Saip ho gaya ho. Bhot Bhal likha aapne. Wese Ye debiya Ganai Ganoli main kaha rahata hai, Main bhi Gangolihat – Ganai Gangoli ke Bhic main rahata huin kahi ye mera Restedaar to nahi.

    Likhyega, Bhote Bhal Likho Aaphuli Likhne raya JI raya.

    Tamaar Mohuni

  11. govind patni Says:

    debu bhai aapka article padha bahut achchha laga. sach kahu tao bachpan ki yaad aa gayi .halanki mai abhi bhi uttrakhand mai hi rahata hu per phir bhi gaon se dur hoon kai varson se gaon chhut hi gaya hai . age bhi kuchh likhe tao mail karane ki kripa kare .
    govind patni

  12. Basant Singh Negi Says:

    Devi daa ka article bahut achha laga. koi bataye ya nahi har koi apne andar chhupe ek gawar jo ki bhola bhala to hain magar padhe likhe gawro se kaphi achha hain chhupaye baitha hain

  13. Basant Singh Negi Says:

    Devi daa ka article bahut achha laga. koi bataye ya nahi har koi apne andar chhupe ek gawar jo ki bhola bhala to hain magar padhe likhe gawro se kaphi achha hain chhupaye baitha hain

  14. indra mohan singh Says:

    dear debu bhai aap ka lekh achha laga. Pahad me rahte huye bhi kabhi Pahad ko jee nahi paya, ye kasak mere dil me bhi hai. Baki apni mati ki yaad dilane wale lekh likhate rahiye. meri subhkamnayen.
    INDRA MOHAN SINGH
    Reporter- Garhwal Post English Daily
    Ramnagar (Uttrakhand)
    M-09411596944, 09997269590
    indra936@gmail.com

  15. veersingh Says:

    dabu bhaygee tumaru lakh bhout bhadya lagee

  16. Mukesh bhatt Says:

    Namskar deb da tumoro lekh pad ber bhot anand aa gyo ho.
    Achyalan is waqt aa gyo ki padina lekhina pahadi bolan mai srm mahsus krnan

  17. KAILASH SUNDRIYAL Says:

    aapko bahut bahut subhkamnaye.

    kailash

  18. saini Says:

    hi my i saini i like ur sharyi thank u

  19. Ram Dutt Tiwari-Dubai Says:

    Joshiji ji namaskar, happy new year-2009, thanks for post.

  20. Ram Dutt Tiwari-Dubai Says:

    Joshiji namaskar, happy new year-2009, thanks for post.

  21. mangal singh Says:

    i love uttrakhan lok geet. uk is peace full state i proud that i am born uttrakhand.

  22. DEVENDRA KUMAR PANDEY Says:

    तरुण जी , मेरे “देबिया” लेख को आपने सम्मान दिया था . आज एक कविता पोस्ट कर रहा हूँ जो मेरे अन्दर फूट पड़ी थी , जब मैं अपने मूल गाँव बेल्कोट (बेरीनाग) पहली बार गया था.

    ” अपराध बोध ”
    उन औरतों , बच्चों और बूढों के गाँव में
    जिन्हों ने अपनी आँखें अपनी हथेली पर ले रखी थीं,
    घुमते हुए मैं अपराध बोध ग्रसित होने लगता हूँ.
    खंडहर बन चुका मकान मुझे घूरने लगता है,
    कुछ अस्पष्ट आवाजों का व्रृत कसता जाता है निरंतर
    मेरे चारों तरफ.
    उस भयावह नीरवता मे
    मुझे दीख पड़ते हैं मेरे जैसे कई चेहरे
    आपस में गड मड .
    और फिर दूर जाती मोटर की आवाज
    मुझे कपा जाती है अन्दर तक.

  23. dr s b pandey Says:

    gajab kar gaya ho deb da tum ji raya jag raya mharaj

  24. Basant negi Says:

    Dev da ka article bahut achha laga. ajkal bhotikta ki apadhapi main hamare andar ka admi mara ja raha hain

  25. Basant negi Says:

    hi! I am Basant Negi from Gagrigole,Garur, Bageshwar Wish all the best to all uttranchali brothers and sister all the best & I pray to God to bring a lot of happiness in your life. I am a big fan of Gadhwali music and I want the blockbaster songs of N.S.Negi if you have plz send me.
    Thanks a lot
    basant_negi06@yahoo.co.in
    cpa.basant@gmail.com

  26. hemant joshi Says:

    namaskaar joshijyu
    bahut bhol lago ho maharaj yan aebe
    dhanyawad

  27. kamal joshi Says:

    joshi ji aap ki kutch madad chahiye maharaj

  28. puran singh belal Says:

    sachmuch ham sab logo ki eak hi kahani hay dhosht.hamara dil nahi manta hai bahut yaad aati hay ,eak eak pal ki.

  29. Girish Joshi Says:

    देबिया तो सबके अन्दर है. पर देवेन्द्र कुमार पाण्डेय की ईमानदारी सबमें कहाँ. मैंने भी अपने अन्दर के देबिया को यह पढाया. बहुत ही खूबसूरत चित्रण. एक एक शब्द पढ़ते ही दृश्य आँखों के सामने आ जाते हैं. बहुत ही उत्कृष्ट रचना. अगली पोस्ट आने तक बार बार इसे पढ़ना और अन्य मित्रों को पढाना जारी रहेगा.

    माफ़ी चाहता हूँ कमेन्ट में आपका नाम गलत लिख गया. कृपया नजर अंदाज कर दें.
    धन्यवाद..

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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