मेरे ब्लोग उत्तरांचल की एक पोस्ट ‘म्यार पहाड़‘ में कल देवेन्द्र कुमार पांडे के नाम से एक टिप्पणी आयी। ऐसी टिप्पणियाँ कभी कभी ही आती हैं और इस तरह की टिप्पणी का सही सम्मान उसको पोस्ट की शक्ल देना ही है। ये पढ़िये म्यार पहाड़ की कहानी देबिया की जुबानी -

मैं याने देवकीनंदन पांडे उर्फ़ डी. एन. पांडे पुत्र गंगा दत्त पांडे इस शहर के कई फलानों वल्द ढिकानों में से एक हूँ, जो विगत अनेक वर्षों से एक बोर रूटीन वाली जिन्दगी से चिपका हुआ है, जिसे आम तौर पर सामान्य जिन्दगी कहा जाता है | पर मेरे अन्दर एक और ‘मैं’ है जिसका कई बार गला घोंटने के बाद भी वह एक उद्दंड बालक की तरह मेरे सामने आ खड़ा होता है। न जाने कहाँ ढील रह गयी इतने साल के ‘देशीपने’ के बाद भी कि यह साला कुकुरी का चेला ‘देबिया’ मेरे अन्दर जिंदा है। हाँ………….हाँ वही ‘देबिया’ जो काफलीगैर, कनालीछीना या खरई, खत्याड़ी या फ़िर गणई, गंगोली में कहीं रहता था या रहता है।

अब इस देबिया को कैसे समझाऊं कि मैं यहाँ,इस शहर में अदब -तमीज वाला एक संभ्रांत व्यक्ति हूँ | लोहा की हुई पतलून और बुशशर्ट पहनता हूँ | अपने मिलने वालों से ‘हेल्लो’ या ‘हाय’ करता हूँ | अंग्रेजी फ़िल्म या हिन्दी नाटक देखता हूँ | काफी हाउस में राजनीतिक या साहित्यिक बहस करता हूँ | हाथ में चुरुट और बगल में पत्रिका रखता हूँ | संक्षेप में इंटेलेक्चुअल-कम-सोफिस्टिकेटेड होने का दंभ भरता हूँ | अब इस साले देबिया को क्या मालूम कि आज कल ये सब करना कितना जरूरी है - रोटी खाने और पानी पीने से भी ज्यादा जरूरी।

लेकिन अपना देबिया रहा वही भ्यास का भ्यास | चाहता है कि मैं मैली कुचैली बंडी और पैजामा -जिसका नाड़ा कम से कम छै इंच लटका हो- पहन कर गोरु-बाछों का ग्वाला जाऊं, रास्ते में हिसालू,किलमोड़ी या काफल चुन-चुन कर खाऊँ,पत्थर के नीचे दबी बीड़ी के सुट्टे मारूं | पहाड़ के उस तरफ़ पहुँच कर धात लगाऊँ -गितुली………..गितुली वे उईईईईई और शाम को घर पंहुंच कर ईजा के सिसुणे की झपकार खाऊँ |

मेरे अन्दर का यह देबिया नामक जंतु असभ्यता की पराकाष्ठा पार करते हुए साबित करना चाहता है कि स्कूल में मास्सेप के झोले से मूंगफली चुराकर खाने और दंडस्वरूप जोत्याये जाने पर ‘ओ इजा मर गयूं‘ की हुंकार लगाने का आनंद किसी नाटक देखने से बढ़कर है | बकौल देबिया ‘लोहे की कढाई में लटपट जौला धपोड़ने या फ़िर धुंए और गर्मी के मिले जुले असर के बीच तेज मिर्च वाले सलबल रस-भात का स्यां-स्यां करते हुए और सिंगाणा सुड़कते हुए रसास्वादन करना, बिरयानी खाने से ज्यादा प्रीतकर है|

ये देबिया जब मोटर की भरभराट से उठ कर विस्फारित नेत्रों से रेल नामक चीज को देख रहा था, वह दृश्य मुझे अभी तक याद है | ‘बबा हो इसका तो अंती नहीं हो कका‘ उसने अपने कका से कहा था | धीरे-धीरे देबिया ऐसे कई चमत्कारों का अभ्यस्त हो चला था | अब उसकी आँखें विस्फारित न रह कर शून्य रहतीं,देबिया धीरे-धीरे गुम होता जा रहा था जीवन की आपाधापी में| मैं भी यही चाहता था| मुझे यकीन था की एक दिन देबिया सुसाइड कर लेगा, पर समय बीतने के साथ-साथ महसूस होने लगा की देबिया मरा नहीं है | अक्सर उसकी मंद-मंद आवाज़ मुझे सुनाई देती | धीरे-धीरे मेरा शक विश्वास में बदल गया कि देबिया जिंदा है- पूरी शिद्दत से | उसकी आवाज़ चीख में बदल गयी थी और वह मुझ पर हावी होने लगा था | इस देबिया से मैं हमेशा लड़ता रहता हूँ | बहुत गुस्सा आता है इस पर जब यह चीख-चीख कर कहता है -’होगा तू यहाँ लाट सैप कुकुरी के चेले, मुझे तो अभी तक तेरे पैजामे से चुरैन आ रही है|‘ गनीमत है कि उसकी यह चीख और कोई सुन नहीं पाता वरना मेरी सभ्यता के जामे की चिंदी-चिंदी हो जाती |

पर फुर्सत के क्षणों में जब कभी मैं सोचता हूँ तो लगता है कि क्या वह देबिया ही नहीं, जो हमारी तथाकथित गंवाड़ी सभ्यता को जिंदा रखने के लिए निरंतर जूझ रहा है और हमें हमारी ‘सभ्यता’ की परवाह किए बिना यह अहसास कराने से बाज नहीं आता कि अपनी मिट्टी की सोंधैन इन कपडों में लगे सेंट से अच्छी है।

मैं तो देबिया से यही कहूँगा कि इतना अच्छा लिखने वाले देबिया को जल्दी से अपना ब्लोग शुरू कर देना चाहिये, मदद के लिये ये नाचीज है। अगर ब्लोग नही शुरू करना है तो भी समय समय पर ऐसी ही टिप्पणी करते रहे, उन्हें पोस्ट की शक्ल देने को हम हैं ना आपके जोश्ज्यू।

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संस्मरणः वह एक मुलाकात
मैने शायद कभी सोचा नही था कि किसी एक दिन म्यार पहाड़ के तीन तीन विशिष्ट व्यक्तियों से एक साथ मिलना होगा। ये तीन व्यक्ति हैं, साल 2007 में पद्म श्री से सम्मानित डा शेखर पाठक; प्रसिद्ध गायक, कवि, संगीतकार नरेन्द्र सिंह नेगी और प्रसिद्ध लोक कलाकार, कवि, गायक, सोशियल

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