01 Jul
Posted by Tarun as व्यक्तिव, सिनेमा |
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गड़वाली सिनेमा के २५ साल पूरे होने पर हमने जा पकड़ा, पहाड़ी महिला के संघर्ष की कहानी कहती फिल्म “गौरा” और पहली गढ़वाली फिल्म “जग्वाल” के निर्माता पराशर गौढ़ को, और उनके साथ करी एक लंबी बातचीत। आज से उसी बातचीत का सिलसिला यहाँ शुरू कर रहे हैं।
पिछली पोस्ट के साथ हमने पराशर गौढ़ के साथ बातचीत का ये सिलसिला शुरू किया था, आज इसी बातचीत को थोड़ा और आगे बढ़ाते हैं। अगर आप किन्हीं कारणों से इस बातचीत की शुरूआत नही पढ़ पाये तो यहाँ उसे पढ़ सकते हैं।
तरूणः मैं समझ सकता हूँ उस वक्त आंचलिक फिल्म बनाना बहुत दूरूह रहा होगा आखिर आपने कैसे ये सब किया, कलाकार, गीत संगीत, कहानी, तकनीकी लोग, कैमरा इन सबके लिये लोग जुटाना बड़ा मुश्किल रहा होगा?
पराशर गौढ़ः जग्वाल बनाने में एक नहीं कई अड़चने आई, मैं स्वयं कई बार भयंकर यातनाओं से गुजरा। मेरा मान सम्मान एक बार नहीं बल्कि कई बार दाँव पे लगा। अपने लोगों में खास कर नाटकों से जुडे लोगो के बीच हंसी का पात्र बना। सन् 1972 से सन् 1983 तक का लम्बा सफर लगा इस फिल्म को पूरा करने में।
रंगमंच पर काम करते-करते काफी अनुभव हो चुका था, मै एक अच्छे कलाकर के साथ-साथ अच्छे र्निदेशक के रूप मे भी जाने जना लगा था। तब सोचा नाटक बहुत कर लिये क्यों न गढ़वाली मे कोई फिल्म बनाई जाय। अब तक इस बोली मे कोई फिल्म नही बनी थी। उस दौरान मैंने हिमाँशु जोशी जी, जो साप्ताहिक हिन्दुस्तान में सह सम्पादक थे उनकी कहानी “कगार की आग” पढ़ी, जो मुझे बहुत पसन्द है। इस पर मैं फिल्म बनाने की सोचने लगा लेकिन मैं उन्हे तब जानता नही था। मैंने अपने मित्र राजेन्द्र धस्माना जी से बात की वो मुझे इनके घर नेता जी नगर लेकर गये। बात हुई, राजेन्द्र जी ने उनसे मेरे विचार बताए कि मैं उनकी काहानी पर गढ़वाली में फिल्म बनाना चाह रहा हूँ। पहले तो उन्होंने मुझे उपर से नीचे तक देखा, शायद सोच रहे थे कि ये और फिल्म, खैर बात नही बनी। मैंने घर आकर र्निणय लिया कि स्वयं कहानी लिखूँगा। जुट गया, काफी मेहनत के बाद “जग्वाल” की कहानी पूरी हो गई। कलाकारों के लिये मैने अपने गढ़वाली थियेटर से जुडे लोगों को ही लेने का मन बन लिया था।
जग्वाल को पहले कौधिक के बैनर तले बनाने का कार्य शुरू हुआ था, जिसमे मैं, श्री दयानन्द चंदोला, जगदीश मन्दोलिया व रीना नैथानी ने इसे पूरा करने की सोची। बकायदा देहली में इसका इस बैनर तले मुर्हत भी हुआ लेकिन एक आदमी जगदीश मन्दोलिया के अपने व्यक्तिगत स्वार्थ व महत्वाकांक्षा ने पूरा प्रोजेक्ट खत्म कर दिया। रीना इसमें हिरोइन थी वो उसे न जाने क्या-क्या सब्जबाग दिखाता रहा, अपने सम्मोहन मे फंसाता रहा। बाद में उसने रीना के साथ मिलकर अपना अलग बैनर बना दिया। जब मुझे ये बात का पता चला तो मैं उनसे अलग हो गया और अपना अलग बैनर बन डाला “आंचलिक फिल्मस”।
अब अकेला था, सारे जुगाड़ मुझे ही करने थे, सबसे बडी समस्या फाइनेन्स की थी, हाथ पाँव मारता रहा। इस बीच एक लम्बा अन्तराल आ पडा, लोगों में जो आशा बँधी थी वो धीरे-धीरे धुँधली होने लगी। मुझ पर से उनका विश्वास उठने लगा, मेरे ऊपर फबतियां कसी जाने लगी, मेरा मजाक उड़ाया जाने लगा। इन सबके बावजूद मैंने हिम्मत नही हारी। फिर से लोगों का विश्वास जीता, प्रगति मंथर गति से आगे बढने लगी।
तरूणः अब बात करते हैं पहली गढ़वाली फिल्म जग्वाल की यानि इंतजार, इस कहानी का आयडिया कहाँ से आया? थोड़ा इस फिल्म के बारे में बतायेंगे, फिल्म की शूटिंग से जुड़ा कोई वाकिया।
पराशर गौढ़ः सन् 1982 में एक नया रास्ता मिला, मदन थपलियाल जी जो मेरे बहुत करीबी दोस्त हैं उन्होंने मुझे अपने एक दोस्त से जो डोक्युमेंट्री बनाते थे मिलाया। वो और मैं मुम्बई गये, वो फिल्म से जुडे कुछ नेपाली टीम को जानते थे उनसे मेरी मुलाकात करवाई। गया तो मैं पहाड़ी फिल्म के लिए था पर उन्होंने जग्वाल को हिन्दी में प्रतीक्षा के नाम से बनाने पर जोर डाल दिया। चलते-चलते आशा बर्मन जी से एक गाना भी रिकार्ड करवा दिया और साथ में राकेश पान्डे को हीरो के लिये साइन भी करवा दिया। जब मैं घर आया, सोचा ये मैं क्या कर रहा हूं? हिन्दी फिल्म तो मुझे बनानी ही नही फिर ये सब क्यूं। मैंने अगले दिन उनसे साफ साफ कह दिया अगर आप साथ में गढ़वाली बोली में फिल्म बनाने पर राजी हैं तो आपका स्वागत है वरना आप अपना ओर काम देखिये वो तुरन्त तैयार हो गये। फिर सारा काम किया गया बैनर रजिस्ट्रेशन करवाया, टीम बनाई, इक्वीपमेंट किराये पर लिये, गाने रिकार्ड किये और चला आया। अक्टूबर में पौड़ी में आंचलिक फिल्मस के तले शूटिंग शुरू हो गई, 22 दिन में सब शूटिंग पूरी की।
बड़े उतार चढ़ाव देखने के बाद 3 मई 1983 को देहली के मावलंकार हाल मे फिल्म का पहला शो हुआ जिसे देखने के लिये वहां पर पूरा पहाड़ उमड़ पडा था। उस दिन मेरे स्व पिता जी की बरसी भी थी, जिनको दिवंगत हुये एक साल हो रहा था। मेरी ओर से उनके लिए एक सच्ची श्रद्धांजली भी थी।
तरूणः मैने ये फिल्म बचपन में देखी थी कहानी अब ठीक से कुछ याद नही लेकिन शायद ये भी एक महिला प्रधान कहानी थी, फिल्म की नायिका इंदू का पति बीरू शादी वाले दिन पुजारी से हुए झगड़े की वजह से १० साल के लिये जेल चला जाता है। बीरू के ये कहने के बाद भी कि उसका इंतजार ना करे और छोटे भाई शेरू से शादी कर ले फिर भी इंदू अपने पति का लंबा इंतजार करती है। क्यों ऐसी ही कुछ कहानी थी ना और मुझे ये भी याद है कि ये शायद दूरदर्शन में भी दिखायी गयी थी।
पराशर गौढ़ः आप सही कह रहे हैं, यही था कहानी का ताना बना।
तरूणः जग्वाल के बाद गौरा में भी आपने फिल्म की कहानी का केन्द्र महिला को ही चुना, इसलिये ये जरूर पूछना चाहूँगा कि इसकी कोई खास वजह।
पराशर गौढ़ः जग्वाल और गौरा दोनो फिल्मों की कहानी यदपि नारी की कथा व्यथा के इर्द र्गिद जरूर घुमती है लेकिन दोनो का विषय विलकुल अलग अलग है। जग्वाल में रिश्तों में पिसती इन्दू जो अपनी पति का इन्तजार करती है तो वहीं गौरा एक राजनैतिक व सरकारी तंत्र की घिनौनी चालों में पिसने पर मजबूर लाचार असहाय महिला के साथ होने वाले अत्याचारों की कहानी है। गौरा मेरे पहाड़ की महिला पर होने वाले अत्त्याचारों की प्रतीक है, जिसमें वहां पर पनप रहे राजनैतिक व कानून की मिली भगत, उसकी गरीबी का मजाक उड़ाते हुए उसके साथ अमान्य हरकत कर, उसे मार कर अपनी अपनी रोटियां सेकने का अवसर ढूँढते हैं। महिलायें पहाड़ की रीढ़ है अगर उस रीढ़ पर कोई आघात होता है तो फिर भला पहाड़ कैसे जीवित रह पायेगा।
तरूणः पहाड़ में महिलाओं के कठिन जीवन और परेशानियों के बारे में आपके क्या विचार हैं।
पराशर गौढ़ः पहाड़ की महिलाएं, पहाड़ जैसी जिन्दगी व्यतीत करती हैं असल में उस पहाड़ को आजतक जिंदा रखा है तो इन्होंने ही रखा है। वो तो पैदा होने से और अपने जीवन के आखिरी पड़ाव तक हमेशा संघर्ष करती आई है। हम लोग पुरूष वर्ग तो बाहर आ जाते हैं, पीछे छोड आते उनके कंधों पर अपने मां-बाप का, बच्चों का, खेतों का, यहां तक की जानवरों का बोझ। उसने तो हर पल हर मोड़ पर समझौते किये है। संघर्ष और मजबूरी का तो उसका चोली और दामन का साथ है।
मुझे मेरा अपने नाटक रिहर्सल का वो डायलागॅ याद आ रहा है, जिसमें वो कहती है - “तुम खुशी और खुशहाली की बात करते हो, ठीक कह रहे हो, गांव में अगर पैसे ढूँढों तो हजारो मे मिल जायेगे पर आदमी ढूँढों तो एक भी नही मिलेगा। नौबत यहां तक आ गई है अगर इस गांव में कोई मरता है तो उसे उठाने के लिए चार आदमी नहीं मिलते। वो भी अब हमको ही उठाने पड रहे हैं।”
तरूणः पहली फिल्म आपने आज से २५ साल पहले बनायी थी जब कुछ नही था, ना घर-घर टीवी की पहुँच, ना इंटरनेट, ना मोबाइल या रिंगटोन और ना ही इतने साधन और सुविधा। तब और अब में आप क्या अंतर देखते हैं।
पराशर गौढ़ः समय बदलता है, साथ में हर चीज, यही तो कुदरत का नियम भी है। उस जमाने में ये सब नहीं था तो जाहिर है, हमें उस समय जो उपलब्ध था उस पर ही निर्भर रहना पड़ा था। उस समय बिना स्टूडियो की गति नही थी क्योंकि आउट डोर जाने में बहुत पैसा लगता था, ऊपर से इतना सारा तामझाम इधर से उधर ले जाने में समय और पैसै की बरबादी और जब से डिजिटल आया है तब से ना इतना तामझाम ना स्टूडियो की जरूरत, सब आसान।
तरूणः फिल्मों के बीच इतने लंबे अंतराल की कुछ खास वजह?
पराशर गौढ़ः एक ही सवाल में आप का उत्तर दूँगा, जब आपके अपने ही आप के पाँव की जमीन को काट दें तो फिर आप के पास क्या बचता है? समय की प्रतीक्षा और सही इन्तजार, यही करता रहा मैं।
गौढ़ जी के साथ बातचीत का ये सिलसिला अभी आगे जारी रहेगा, इस बातचीत को आगे बढ़ायेंगे अगली पोस्ट में। अगर आप भी कोई सवाल पराशर गौढ़ जी से पूछना चाहते हैं तो टिप्पणी के मार्फत आप सवाल पूछ सकते हैं और हम आपके इन सवालों को पराशर गौढ़ जी तक पहुँचा देंगे।
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3 Responses
समीर लाल
July 1st, 2008 at 9:04 pm
1कितनी कठिन और लम्बी तपस्या है और साथ ही अपनी मंजिल हासिल करने के लिए तटस्थ मानसिकता कि हिन्दी फिल्म का जिन्दा ऑफर ठुकरा दिया. सलाम है.
पाराशर जी बतायें: क्या कभी मायूसी नहीं होती जब सारे रास्ते बंद दिखते हैं. कैसे संयम बनाये रखते हैं अपनी मंजिल पाने के लिए. क्या कभी इस जज्बे के लिए विरोध नहीं हुआ अपने शौक के पीछे भागते हुए -परिवार से या अन्य किसी से?
Birendra Bisht(Biru)
August 6th, 2008 at 4:25 pm
2Hi Tarun
As I Just gone through this site and read out some articles and comments on these articls,it only not touch my herat but also inspired me to think about our culture. I realy found myself very far from our original culture of garwhal, our Garwhawl basically known for Dev Bhumi but now a days we forget all our cultural actyivities due to th migration towards to city.
So Can we let start a new revolution to live with nature ” Prakriti ke saath Jeevo aur Prakriti ke anusaar Jeevo” . Actually this concept came from my heart when I read thses articles and foud that we are not only leaving out village but also leaving our country. So our new theem will give a new instruction to Humen to live with nature and accourding to nature. One side we are talking about 21th century where india will be fully develoed country and other side we are still on bottum of the sea where our poverty, Daridrtha and terror are high in our country.
So the aim of our revolution will be to seek out the maximum employement in our country itself and prevent such activity which can harm the nature. We have a good talent and we can use our talent in out country.
Thanks
Regards
Birendra Bisht
Actually i want to do a lots of this to save our culture and want to do a loths of things in our Garwhal.
manoj
September 3rd, 2008 at 11:46 pm
3a the time of suiting of jagwal i was at pauri ,myfather was posted there in collectorate office, we also saw this suiting ,i remember one song ” luk chupa luk chupa”my sisters also participated in this group song, sir can i get this movies c.d ? this film was a very beautiful creation of parashar sir ,garhwal’s first step in cinema
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