Interview: गढ़वाली सिनेमा के जनक पराशर गौढ़ के साथ बातचीत
Posted by on June 26, 2008 Filed under व्यक्तिव, सिनेमा
गड़वाली सिनेमा के २५ साल पूरे होने पर हमने जा पकड़ा, पहाड़ी महिला के संघर्ष की कहानी कहती फिल्म “गौरा” और पहली गढ़वाली फिल्म “जग्वाल” के निर्माता पराशर गौढ़ को, और उनके साथ करी एक लंबी बातचीत। आज से उसी बातचीत का सिलसिला यहाँ शुरू कर रहे हैं।
“मुश्किल नही है कुछ भी अगर ठान लीजिये” ये लाईनें शायद उन चंद लोगों को देखकर लिखी गयी होगी जिन्होंने तमाम परेशानियों के बावजूद नये रास्ते बनाकर संभावनाओं के नये द्वार खोले। वो लोग जो “अकेले चले थे जानिबे मंजिल मगर” धीरे धीरे लोग साथ आते गये और कारवां बनता गया। गढ़वाली फिल्मों का कारवाँ बनाने वाले ऐसे ही एक शख्स हैं पराशर गौढ़। उनके साथ बातचीत करके हम जानेंगे कुछ ऐसी बातें जो अभी तक शायद उन्हीं तक सीमित हो।
पराशर गौढ़ जी का स्वागत करते हुए शुरू करते हैं बातचीत का ये सिलसिला -
तरूणः पराशरजी, अपने बारे में पहले कुछ बतायें मसलन गढ़वाल में आप कहाँ से बिलोंग करते हैं, आपने अपनी शिक्षा कहाँ से करी।
पराशर गौढ़: मेरा जन्म पौडी गढ़वाल के अन्तर्गत असवाल स्षूं के ग्राम मिरचोड़ा मे सन् 1947 में हुआ। पिता जी जाने माने जोतिषाचार्य थे। लाहौर, शिमला के बाद वो राजधानी देहली मे बस गये थे। मेरी प्रारभिक शिक्षा सूला और रिठोली से 5वी की, उसके बाद 8वीं मडंनेश्वर, जहाँ गढ़वाल का एक प्रसिद्ध मेला खैरालिंग या मंडानेश्वर लगता है वहां से की। मिडल करने के बाद माता श्री ने आगे की पढ़ाई के लिये पापा के पास देहली भेज दिया। पापा ने माता सुन्दरी हायर सेकन्डरी स्कूल में भर्ती करवा दिया।
पढ़ाई अभी शुरू ही हुई थी कि घर पर मुसीबतों का साया शुरू हो गया। बडे भैया राजस्थान पुलिस मे थे उन्होने वहां से नौकरी छोड दी और देहली आ गये। बीच वाले भैया पहले से पापा के साथ थे, कुल मिलाकर हम 4 आदमी हो गये थे, घर का खर्चा बड गया। एक आदमी कामने वाला और 3 खाने वाले। घर की अर्थ व्यवस्था चरमरानी लगी। मेरे सामने एक-दो विकल्प थे या तो मैं पढ़ाई छोड दूं और काम करूँ या फिर दिन में काम और रात को प्राइवेट पढ़ाई करूँ। मैने निर्णय लिया और पापा से कहा कि मैं दिन मे काम करूँगा और रात को प्राइवेट पढ़ाई कर आगे पढ़ूँगा।
इस तरह पहला विघ्न आया मेरी पढ़ाई में, मैंने 10वीं बागपत बडौत से, 12 वीं शम्भू दयाल कालेज गाजियाबाद से व्यक्तिगत पढ़ाई कर के पास किये, बी ए साहिबाबद से किया। जहां 5 बजे सुबह से 10 बजे तक पढ़ाई करता उसके बाद काम पर जाता था। इस प्रकार से मैने जीवन की देहलीज पर पांव रखा।
तरूणः आपके परिवार में और कौन कौन हैं?
पराशर गौढ़: इस समय, मैं अपने 3 पुत्रों, 2 पुत्र बधुओं और मेरी पथदर्शिका मेरी सहचरी, अपनी श्रीमती जी के साथ भारत से दूर कनाडा में पिछले 20-22 सालों से रह रहा हूँ। मेरे दोनों भाई और उनके बच्चे भी यहीं पर आकर बस गये हैं। एक बेटा अभी अव-विवाहित है।
तरूणः कनाडा आप कब मूव हुए, वहाँ आजकल कहाँ रहते हैं।
पराशर गौढ़: मैं यहां सन् 1988-89 में आ गया था, पहला पड़ाव 24 पोर्टिको ड्राइव स्कारबेरो मे हुआ फिर इटोविको और अब ब्राम्पटन मे पिछले 8-10 साल से रह रहा हूँ।
तरूणः सिनेमा और नाट्य की दुनिया में जाने का विचार आपका पहले से ही था क्या, गढ़वाली सिनेमा बल्कि यूँ कहूँ कि उत्तराखंड सिनेमा नाम की कोई चीज भी जब नही थी तब ये गढ़वाली फिल्म बनाने का विचार कैसे आया?
पराशर गौढ़: कला के प्रति रूझान शुरू से था, 10 साल की उम्र में पहली बार स्टेज पर चढ़ा राजा हरीशचन्द्र के बेटे रोहताश के किरदार के रूप में। 8 वीं मे स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हमेशा बड़ चढ़कर हिस्सा लेता रहा। देहली में पहाड़ियों की रामलीला जगह जगह हुआ करती थी, मेरे लिये यह रामलीला का स्टेज किसी एन एस डी से कम नही था। मेरे अन्दर का कलाकार इसी स्टेज की देन है।
गढ़वाली में एक शब्द है बाणिक जिसका अर्थ होता है कारण (या बनना या होना)। कहने का मतलब है जब कोई चीज होनी होती है तो उसके इर्द र्गिद वैसा ही वातावरण व धटनायें घटनी शुरू हो जाती हैं। मुझे नौकरी भी मिली तो ऐसे ही परिवेश मे जहां सांस्कृतिक गतिविधियां हुआ करती थीं। अपने अन्दर की कला भावना व लेखक को उजागर करने के लिए तब मेरे पास माहौल भी था और समय भी।
उन दिनो आकाशवाणी देहली से शाम को 6:30 बजे सप्ताह में दो दिन गढवाली में गीत प्रस्तुत होते थे। मेरे एक दोस्त जगदीश ढौंढियाल जो बहुत अच्छा गाते हैं, ने मुझ से कहा कि क्यों ना मैं गीत लिखूं और वो गायें। सो हम में एक प्रकार का पैक्ट बन गया। उन्होंने आडिशन दिया और वो पास हो गये। उन्होंने मेरे द्वारा लिखित पहला गीत “हौ सिया जोगी कैलाश बसी, जागी जाव है बाबा नील कन्ठी गाया”। जिसे लोगों ने बहुत पसन्द किया, बाद मे गीत बहुत लोकप्रिय हुआ। उस दौरान मेरे 20-30 गीत आकाशवाणी से प्रसारित हुए। गीत और कविता मेरे जहन मे बस गई थी। थोड़ा बहुत नाम भी होने लगा था, लोग मुझे कवि, गीतकार के रूप में जानने लगे थे।
जहाँ तक नाटकों का प्रश्न है तब राजधानी में यदा कदा एकाकी नाटकों का मंचन हुआ करता था, उसमें लेडीज रोल आदमी किया करते थे। मेरी उम्र 18-20 की रही होगी, मैं 1960-62 की बात कर रहा हूँ। मैंने मावलंकार हाल रफी मार्ग में बंगोपाद्याय द्वारा लिखित एक नाटक देखा था जो बंगाल के आम आदमी के जनजीवन पर आधरित था। जिसको देख कर मैं इतना प्रभावित हुआ कि मैंने गढ़वाली में “औंसी की रात” नामक नाटक लिख डाला। एक तो नया नया लेखक उपर से नाटक की विधा से अपरिपक्व होने के कारण उसमें 3 लेडीज पात्र डाल दिये, ये जानते हुए भी कि लेडीज कलाकार का मिलन असम्मभव है। अब प्रश्न था संस्था का, पैसों का, कलाकारों का। मैं अपने मित्र दिनेश पहाड़ी, जो नाटको मे थोड़ा बहुत इच्छा रखते थे, से बात की। उन्होंने अपने एक अन्य मित्र कृष्ण चनपुरिया जो मूल रूप से बिहार से थे बात की इस तरह तीनों ने मिलकर एक संस्था बनाई जिसका नाम रखा गया “पुष्पांजली रंगशाला”।
2 फरवरी 1962 को मेरा नाटक “औंसी की रात” आइ आइ एम ए के हाल में लोगों ने टिकट लेकर देखा। पहली बार गढवाली नाटक देहली में कम्यूनिटी हाल से उठकर रंगमंच के सभागार मे आया जिसमें 3 गढवाली लेडीज कलाकारों ने भी किरदार निभाया। मैंने हीरो का रोल अदा किया और लील नेगी ने हिरोइन का। इस तरह से लील नेगी को गढवाली नाटकों की पहली नायिका बनने का श्रेय मिला। इस नाटक करने से हमारे लोग, तब जो गढवाली बोलने में हिचकिचाते थे या यूँ कहिए शर्माते थे, उनमें अपनी बोली के प्रति आदर की भावना जाग उठी। लोग घरों से या कम्यूनिटी हालों से बाहर आकर थियेटर तक आने शुरु हो गये।
“औसी की रात” अपने आप में कई मायनों में मील का पत्थर साबित हुआ, जैसे पहली बार महिलाओं का स्टेज में आना, पहली बार एकाकी से हटकर फुललैंथ प्ले होना और खेला जाना, पहली बार लोगों का घरों से बाहर आकर हाल में पैसों से टिकट खरीदकर देखना। इसके बाद तो हमने पीछे मूड़कर नहीं देखा। दिल्ली मे बसे गढ़वालियों में अपनी एक अलग सी पहचान बन गई। इस संस्था के तत्त्वाधान मे 10-12 नाटक लिखे और खेले गये। बाहर की संस्थाओं से नाटक करने के निमंत्रण आने लगे।
सन् 1962 से 1983 तक मैंने कई नाटक लिखे जिनमें “औसी की रात़”, “ग्वै”, “तिमला का तिमला”, “खतया चोली” के राजधानी और राज्धानी से बाहर 10-15 बार शो किये गये। लगभग 50 से उपर नाटकों में मैंने मेन रोल किया साथ ही कई नाटको का र्निदेशन भी किया। बस यहीं से शुरू होती है गढ़वाली फिल्म की शुरूवात, “उसको बनाने का एक सपना“।
गौढ़ जी के साथ बातचीत का ये सिलसिला अभी आगे जारी रहेगा, इस बातचीत को आगे बढ़ायेंगे अगली पोस्ट में। अगर आप भी कोई सवाल पराशर गौढ़ जी से पूछना चाहते हैं तो टिप्पणी के मार्फत आप सवाल पूछ सकते हैं और हम आपके इन सवालों को पराशर गौढ़ जी तक पहुँचा देंगे।
Tags: उत्तराखंड, गढ़वाल, गढ़वाली, garhwali cinema, gaura, interview, jagwal, parashar gaur, uttarakhand
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बहुत अच्छी शुरुवात की है. पराशर जी के जज़्बे को नमन करता हूँ. अगली कड़ी का इन्तजार है.
पढ़कर बहुत अच्छा लगा। पराशर जी ने किन्हीं भी विपरीत परिस्थितियों में हार नहीं मानी व कहाँ से कहाँ पहुँच गए। वे अनुकरणीय हैं।
कुछ ऐसा ही कुमाँऊ के बारे में भी लेकर आइए।
घुघूती बासूती
waah bahut achcha laga sakshaatkaar padke…..thnx tarun ji
Good Interview. Thanks Tarun.
Great job Tarun. Achacha laga. Thanks.
Taurn
Thanks ou . I found one of my lost friend and also thanks others people who have comments about me.
Arre bahi Sameer
Comments ke liye Hirdye se Dhanyabad…
AAp to Kavi samelan ki bad Gayab hi hogaye . Iss daurana kavi samelan me apki kami khalte rahi… apna phnoe no degiyeaa to..
Parashar
Taurn
Thanks u . I found one of my lost friend and also thanks of others people who have comments about me.
Arre bahi Sameerji
Comments ke liye Hirdye se Dhanyabad…
AAp to Kavi samelan ki bad Gayab hi hogaye . Iss daurana kavi samelan me apki kami khalte rahi… apna phnoe no degiyeaa to.. Parashar
Tarun Da! Is mahaan Pratibha se hamaara parichay karaane ke liye aapka hardik dhanywaad… Gaur ji ko “Gaura” ki safalta ke liye Shubhkaamnaaye…
पाराशर जी
काफी समय के लिये भारत यात्रा पर था इसलिए कवि सम्मेलनों में शिरकत नहीं कर पाया यहाँ. आज शाम को या कल आपको फोन लगाता हूँ, तब इत्मिनान से चर्चा होगी.
It was really a very good interview, and i am very happy to found this uttranchal site on my g-mail account. I belong to Nainital and currently living in Delhi.Really misses Uttranchal and thier people a lot. Looking forward to read some more intresting news about kumaon. Thanks a lot Tarun Ji
[...] पिछली पोस्ट के साथ हमने पराशर गौढ़ के साथ बातचीत का ये सिलसिला शुरू किया था, आज इसी बातचीत को थोड़ा और आगे बढ़ाते हैं। अगर आप किन्हीं कारणों से इस बातचीत की शुरूआत नही पढ़ पाये तो यहाँ उसे पढ़ सकते हैं। [...]
I LOVE MY UTTARANCHAL .PLEASE SEND ME KUMAUNI LOK GEET.
please send me kumauni lok geet. mujhe apne uttaranchal se bahut pyar hai. pl.urgently send.
pl send me kumauni and garhwali lokgeet.
काफी अच्छा लगा पड़कर आगे भी इसको और भी अच्छा बनाने की कोसिस करना. लेकिन इसमे कुछ कुमाओं के बारे में भी बता दिया करो. बट वैरी नाईस.
नवीन
hallo i am bhupinder bhandari i am uttranchali but it is a my family is a faridabad haryana this is a uttarnchal song is good song it is a buteful son and geet i am intersting a garhwali film i am actor and comde , you be trstme i like me so be four than pliz email me , my sell no. 09999404309, thankyou
hall i am rohit bhandari i like you garwhli song babli tari mobil
bhai ji mujhe shri parashar ji ka nomber chahiye
bhai ji mujhe shri parashar ji ka contect no chahiye me unse milana chata hoon please bhai ji…………….
Dear Kamal
Kaise ho.. umeed hai, sab yathawat hogaa…
Haa .. kahiye , mai hazir hun bandhu….
Aap bataye ki mai , aapki koyee madad ker sakta hun ?
parashar
muje aap ka lek pansad aaya
parasher gour is great man of uttrakhand
girish lakhera is a great singer of uttrakhand populer song of
girish lakhera voice hai sonu i love you kaima deyun raibar etc hit garhwali songs by sing girish lakhera
girish lakhera best wrighter of uttranchali song& films
lakhera wright three four film story but do not started this is bed luck i am prier to goad parashar gaur ji ke jase apni bhi kismat chamke i am reddy to hard work
thanks
jai uttrakhad
girish lakhera ji bhi parashar ji ki jase karna chahte han