01 Aug
Posted by Tarun as व्यक्तिव, सामान्य
Tags:व्यक्तिव, सामान्य, girda, girish tiwari, narendra singh negi, pahad, shekhar pathak, uttarakhandमैने शायद कभी सोचा नही था कि किसी एक दिन म्यार पहाड़ के तीन तीन विशिष्ट व्यक्तियों से एक साथ मिलना होगा। ये तीन व्यक्ति हैं, साल 2007 में पद्म श्री से सम्मानित डा शेखर पाठक; प्रसिद्ध गायक, कवि, संगीतकार नरेन्द्र सिंह नेगी और प्रसिद्ध लोक कलाकार, कवि, गायक, सोशियल एक्टिविस्ट गिरीश तिवारी (गिरदा)। और ये सब संभव हुआ उत्तरांचल एशोसियन आफ नार्थ अमेरिका की 9 वें अधिवेशन में जहाँ ये तीनो विशेष रूप से आमंत्रित थे।
अधिवेशन स्थल की पार्किंग में कार पार्क करते ही सामने एक और कार आ कर रूकी, घड़ी पर नजर दौड़ायी तो दिन के ठीक 12 बजे थे यानि कि ठीक वक्त पर पहुँच ही गया। कार से उतरते ही देखता हूँ कि सामने की कार से 4 लोग उतरते हैं, सादी वेशभूषा में सीधे सादे से लगने वाले इन लोगों पर गौर करता हूँ तो पाता हूँ कि अरे ये तो वो ही हैं जिनको सुनने के लिये मैं यहाँ आया हूँ।
जैसे ही उनकी तरफ बढ़ता हूँ तो नेगी जी की नजर मेरी तरफ पड़ती है और उनके चेहरे पर एक आत्मीय सी मुस्कान दिखायी देने लगती है। वो ऐसे मिलते हैं जैसे मेरे को पहले से ही जानते हों, इसी आत्मीयता के साथ शेखरदा और गिरदा भी मिलते हैं। ये एक सुखद संयोग ही था कि समारोह स्थल में सबसे पहले मेरा उन्हीं से मिलना हुआ। उनके साथ चौथे व्यक्ति थे डेन जेन, जो शेखरदा की संस्था पहाड़ से जुडे हुए हैं और यहाँ डेनवर से तशरीफ लाये थे। फिर धीरे धीरे और लोग भी आ पहुँचे, हम सब अंदर की ओर चल पड़े।
अंदर पहुँचते ही मुझे लग गया कि समारोह देर से ही शुरू होगा क्योंकि तैयारी का अंतिम राउंड चल रहा था और दर्शकों के नाम पर इक्के दुक्के लोग ही दिख रहे थे। मेरे लिये ये पहला मौका था जब आम जनता नदारद थी और विशेष रूप से आमंत्रित व्यक्ति या मुख्य अतिथिगण पहले से वक्त पर मौजुद थे। मै यही सोच रहा था कि हम भारतीय हो सकता है कल चांद पर पहुँच जायें लेकिन वक्त पर कहीं पहुँचने की आदत बनाने में अभी शायद बहुत वक्त लगेगा। अपनी सोच को पोजिटिव जामा पहना कर हम यही सोच रहे थे कि अच्छा हुआ इन लोगों से बातचीत का थोड़ा और मौका मिलेगा।
डेढ दो घंटे की देरी से आखिर शुरू हुआ शेखर दा का व्याख्यान “उत्तराखंड गाथा”, ये एक स्लाईड शो था जिसमें उन्होंने तस्वीरो के माध्यम से उत्तराखंड के बारे में वो जानकारियां दी जिनसे हम सब शायद आज तक अनभिज्ञ थे। उत्तराखंड का भूगोल, इतिहास, संस्कृति, पहनावा, संघर्ष, पहाड़ से जुड़े सपने सभी कुछ तो था उन तस्वीरों में। एक से बढ़कर एक सुंदर तस्वीरें और उससे भी ज्यादा खूबी के साथ उन तस्वीरों के पीछे छुपे संसार का वर्णन और ये वही कर सकता था जिसने उत्तराखंड का चप्पा चप्पा छाना हो। तभी तो शायद शेखर पाठक जी को “चलता फिरता शब्दकोश” कहते हैं। एक-डेढ़ घंटा कब निकल गया पता ही नही चला, उसके बाद था एक छोटा सा विश्राम (ब्रेक)।
फिर शुरू हुआ दूसरा स्लाईड शो, “अपने लोगों को जानो, अपने गाँव को पहचानो” लेकिन इसके नीचे एक दूसरा टाईटिल था “अस्कोट-आराकोट अभियान 2004″। मुझे इन दोनों विषयों के बीच कोई लिंक नजर नही आ रहा था लगा कि ऐसा ही कुछ साधारण सा व्याख्यान होगा जिसमें किसी अभियान से जुड़ी बातें बतायी जायेंगी।
लेकिन जब ये शुरू हुआ तो सारी तस्वीर साफ हो गयी, ये कोई साधारण सा अभियान नही था अपने आप में शायद पहला और अकेला। इस अभियान के अंतर्गत उत्तराखंड के एक कोने से दूसरे कोने तक पैदल यात्रा की जाती है और वो भी खाली जेब के साथ यानि कि “नो मनी”। खाने पीने और रहने के लिये गांव वालों पर निर्भर रहना होता था, इसका मुख्य कारण ये भी था कि इससे गाँव वालों की तकलीफं और उनके बारे में ज्यादा करीब से और विस्तार से पता चलेगा। साथ ही इस अभियान की दूसरी विशेषता ये थी कि साल 1974 से हर दस साल के अंतर में ये अभियान चलता है यानि कि पहला 1974, फिर 1984, उसके बाद 1994 और फिर 2004, अगला अस्कोट-आराकोट अभियान होगा वर्ष 2014 में। जन उन्होंने ये बताया कि 1974 से लेकर 2004 तक के बीच जो नोटिस करने लायक फर्क और विकास नजर आया वो 2004 के अभियान में ही आया, मुझे ये सुनकर कोई आश्चर्य भी नही हुआ। आखिर मैने भी अपने 24-25 साल इन्ही पहाड़ों में बिताये हैं वो भी पहाड़ के बड़े कहे जाने वाले शहरों में और मुझे पता था कि इन शहरों में विकास की क्या गति होती थी। जब शहरों का ये हाल होता था तो दूरदराज के गाँवों का सोचा जा सकता है।
इस अभियान में यात्रियों ने तय किया 1100 किमी का सफर, और इस दौरान रास्ते में पडे 6 जिले, 40 तहसील और 40 विकास खंड। यही नही इन्होंने पार किया 35 नदी घाटियों, 16 बुग्यालों दर्रों, 20 खरकों, भूस्खलन और भूकंप से प्रभावित 15 क्षेत्रों, 15 उजड़ती हुई चट्टियों (एक तरह की धर्मशालायें), 5 जनजाती क्षेत्रों, 5 तीर्थयात्रा मार्गों, 3 तिब्बत भारत मार्गों को। वर्ष 2004 की इस यात्रा के कारवाँ में कुल 151 लोग शामिल हुए (आंकडेः पहाड़ डॉट आर्ग और व्याख्यान से लिये गये)।
इसी व्याख्यान में पता चला कि गर्जियाधार (अस्कोट से लगभग 3-4 किमी दूर स्थित इक गाँव)) में एक ऐसी प्राइमरी पाठशाला भी है जो कि टीन के एक शेड में चलती है, जिसमें कोई ना दिवार है ना दरवाजे ना खिड़कियाँ। साथ ही देखा एक दो मंजिला मंदिर, यही नही एक ऐसे व्यक्ति गंगाराम के बारे में भी पता चला जो खुबसूरत नक्काशी दार मंदिर तो बना सकता है लेकिन उसे मंदिर में जाने की इजाजत नही क्योंकि वो नीची जाति से है।
इस जानदार अभियान के व्याख्यान में सभी खोये हुए थे कि वक्त की दीमक ने काटना, कुरेदना शुरू कर दिया और शेखर पाठक जी को थोड़ा तेज गति पकड़नी पड़ी। इसी के साथ दो ज्ञानवर्धन और मनोरंजक प्रोग्रामों का समापन हुआ। और हम चल पड़े आज का आखिरी ब्रेक लेने।
अब बारी थी सिर्फ और सिर्फ मस्ती की यानि की नाच, गाना और गीत की। कम शब्दों में बोले तो सांस्कृतिक कार्यक्रमों और दो उस्तादों की जुगलबंदी की। पहले छोटे बड़े नन्हें बच्चों ने बाँधा समा अपनी नृत्य कला से, पहाडी और फिल्मी गीतों की धुनों में थिरकते इनके कदम ने सभी को भाव विभोर कर दिया, उसके बाद आया कत्थक नृत्य का नंबर, इस नृत्य से दर्शकों का मनोरंजन किया लखनऊ से आयीं चंद्रकला पांडे ने। अब बारी थी उस्तादों की शेखर पाठक जी ने संभाली सूत्रधार की भूमिका, नरेन्द्र सिंह नेगी जी और गिरदा ने बाँधा समां अपनी सुन्दर कविताओं और गीतों से। एक से बढ़कर एक रचना और मुझे आश्चर्य हो रहा था इन सबके अंदर छुपी उर्जा देखकर, इतनी ज्यादा उम्र होने पर भी कही से भी थकान की एक शिकन तक नही दिखायी दे रही थी। जहाँ एक तरफ “उत्तराखंड आंदोलन” से जुड़े जोश भर देने वाली रचनायें थीं तो वहीं दूसरी तरफ बसंत में गाये जाने वाले मादक और मनमोहक गीत। फिर आखिर में तीनों ने हुड़के (एक किस्म का पहाड़ी वाद्य) की ताल में जो कोरस में गाना शुरू किया तो मंजर देखते ही बनता था, सभी अपनी कुर्सियाँ छोड़ स्टेज के आगे नाचने लगे। कार्यक्रम के अंत में नेगी जी ने “ठंडो रे ठंडो” और “ढेबरा हर्च गयीं” गीत गाकर सभी को मंत्र मुग्ध कर दिया। उसके बाद इन तीनों विभूतियों को लाइफ टाइम एचिवमेंट अवार्ड से नवाजा गया।
फिर आया इन सबसे विदा लेने का वक्त, मुलाकात से ठीक 12 घंटे बाद यानि कि रात के 12 बजे। इन लोगों को फिर से सुनने और देखने की आस लिये हम भी वापस चल पड़े अपने घर की ओर। इनसे मिलकर ये एहसास भी हो गया कि आखिर पानी जहाँ सबसे गहरा होता है वहीं क्यों सबसे शांत होता है। इतने बड़े कलाकर और गुणी होने के बाद भी सीधे, सरल और डाऊन टू अर्थ लोगों से मिलने के अवसर बहुत कम मिलते हैं और ऐसे ही एक अवसर से हम अभी अभी रूबरू हुए थे।
उना टीम प्रबंधन को इस आयोजन के लिये बहुत बहुत धन्यवाद।
10 Responses
K.S.RAWAT
August 1st, 2007 at 9:20 am
1Dear Esteemed Members,
As you all know that PG Team was busy in Project Gairsain in the recent past and visited to Gairsain, Chamoli Garhwal for holding the awareness camp cum scholarship programme.
We are glad to share with you a detailed Project Report (attached in the mail) for your ready reference. We request each of the members to please go through the report and share your feedback about the recently completed Project Gairsain.
Project Gairsain reflects the honest efforts of each of the PG Team members and your feedback will surely help us to strengthen the entire process of executing the future camps.
Thanks.
Best Wishes
Team Pauri Garhwal Group
http://groups.yahoo.com/group/paurigarhwal
Kailash Pant
August 1st, 2007 at 9:24 pm
2Bahut Khub!!! Saari yaadein taaza ho gayi phir se…. Tarun ko salaam uski technology aur lekhan pratibha ke liye….
devesh nautiyal
August 1st, 2007 at 10:42 pm
3Maan Gaye Ustaad! Thank for putting such a nice summary and sharing your thoughts with all of us.
Thanks,
Devesh
Uttaranchal | उत्तरांचल » विडियोः उत्तराखंड गाथा और नरेन्द्र सिंह नेगी लाइव - भाग १ | Uttaranchal
August 6th, 2007 at 5:32 am
4[...] « संस्मरणः वह एक मुलाकात [...]
ghughutibasuti
August 6th, 2007 at 5:26 pm
5पढ़कर बहुत अच्छा लगा । इसी तरह से लिखते रहिये और हमें हमारे पहाड़ से जोड़े रखिये ।
घुघूती बासूती
Rajendra Pandey
August 18th, 2007 at 7:05 pm
6Ghalib bhai. Bahut khoob!
Naa sirf is sansamaran, varan website par kee gayi mehnat pe ‘naman/ salam’ aur ‘lage raho Tarun bhai’.
bhupen
November 9th, 2007 at 6:48 am
7जानकारी के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया. गिर्दा और नरेंद्र नेगी की जुगलबंदी को सुनने का मुझे भी मौक़ा मिला है. सामाजिक प्रतिबद्धता उनके गीतों को और ज़्यादा बड़ा बनाती है. दो हज़ार चार में अस्कोट-आराकोट अभियान की शुरुआत में मैं भी कुछ दिन साथ था. आपने उसका ज़िक्र कर याद ताज़ा कर दी.
RAMESH CHANDRA SINGH
February 12th, 2008 at 6:11 pm
8sir i am ramesh i want uttrakhand
Deep Chandra Tiwari
March 16th, 2008 at 11:10 am
9bahut aanand aaya tarun bhai aapke is pure lekh ko padhkar. Main to youn hi ghar per baitha-baitha bore ho raha tha phir socha kuch pahari geet search karta hun web site per aur search karte-karte aapke is sundar aur dil ko khus kar dene wale weblog main pahuncha. Mere ko kafi accha laga aur kafi kuch naya janne ko bhi mila. I like it . Main ye bhi chahunga ki next uttaranchal association ki jan sabha main bhag le paun..
Dhanyabad.
Namaskar
ashok suyal
June 10th, 2008 at 4:32 pm
10bhut he acha lga, aapka paryas bhut he kamal ka h.
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