24 Jul
Posted by Tarun as उप्लब्धि, व्यक्तिव, साहित्य |
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हिन्दी साहित्य में शिवानी एक जाना पहचाना नाम है। इन्होनें काफी सारे उपन्यास, कहानियाँ, आलेख और निबन्ध लिखकर हिन्दी साहित्य को अपना योगदान दिया है। इनके लेखन में भावों का सुन्दर चित्रण, भाषा की सादगी तो होती ही थी साथ ही साथ पहाड, वहाँ रहने वाले भोले भाले लोग और वहाँ की संस्कृति का जीता जागता वर्णन होता था। अगर आपने उनका लिखा साहित्य पढा है
तो समझ लीजिये कि कुमाऊँनी तो आप आसानी से समझ लेंगे क्योंकि उनके लेखन में कुमाऊँनी शब्दों और मुहावरों की भरमार रहती थी। उनके शब्दों में,
मेरा लेखन कोई कल्पना की उडान नही, यह सच्चाई से जुडा है
शिवानी का जन्म सन् १९२३ में सौराष्ट्र में हुआ, उनके पिता अश्विनी कुमार पांडे रामपुर स्टेट में दिवान थे, वह वायसराय के वार काउंसिल में मेम्बर भी थे। उनकी माता संस्कृत की विदूषी ही नही वरन लखनऊ महिला विधालय की प्रथम छात्रा भी थीं। १९३५ से १९४३ के मध्य उन्होने रविन्द्र नाथ टैगोर के शांति निकेतन में विधा अध्ययन किया और १९५३ में कलकत्ता से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उन्हें गुजराती, बंगाली, संस्कृत, अंग्रेजी और उर्दू का भी अच्छा ज्ञान था। उनके पति एस डी पंत शिक्षा विभाग में थे और दुर्भाग्य से काफी जवानी में उनका निधन हो गया था। शिवानी की तीन बेटियाँ (वीना, मृणाल पांडे, ईरा पांडे - मृणाल और ईरा भी जानी मानी लेखिका हैं) और एक बेटा (मुक्तेश पंत, बच्चों में सबसे छोटा और आजकल अमेरिका में) हैं। शादी के बाद शिवानी का ज्यादा वक्त कुमाऊँ की पहाडियों में ही बीता, बाद में वो लखनऊ में आकर रहने लगी। मार्च २००३ को नई दिल्ली में अपने बच्चों में दीदी के नाम से विख्यात इस ईजा (माँ) का देहांत हुआ।
पहली बार ‘करिया छिमा’ से उनके लेखन से रूबरू हुए प्रतीक का लिखना है,
एक बार किताब खोलकर पढ़ना शुरू किया तो पाँच कहानियाँ पढ़ डालीं। छठी कहानी भी पढ़ने की इच्छा थी, लेकिन चाह कर भी मैं पढ़ न सका। क्योंकि एक को छोड़कर सभी कहानियाँ दु:खान्त हैं और शिवानी जी की शैली सीधे हृदय पर असर करती है। उन्होंने अपनी इन कहानियों में स्त्री की व्यथा और सामाजिक बन्धनों को बेहद संजीदगी से उकेरा है। पाठक स्त्री पात्रों के कष्टों से अपना तादात्म्य महसूस करता है और उसका हृदय इन पात्रों की व्यथा-कथाओं में डूब जाता है। नारी के मनोभावों के विस्तृत आयामों का ऐसा गम्भीर चित्रण मैंने आज तक और कहीं नहीं पढ़ा।
पढ़ते-पढ़ते मैं इतना भावुक हो गया, कि अपने आँसुओं को टपकने से सम्हालना पड़ा। इससे पहले मैं अपने आप को काफ़ी कठोर और भावुकता के प्रति एक हद तक असम्वेदनशील भी समझता था, लेकिन मुझे क्या मालूम था कि शिवानी जी की क़लम का जादू सभी चट्टानें तोड़ कर अन्दर की तरलता आँखों तक ला देता है।
वहीं इटली से सुनील का कहना है,
बचपन में हिंदी लेखिका शिवानी मुझे बहुत पसंद थीं, पर उनसे कभी सीधा कोई सम्पर्क नहीं हुआ. फ़िर कुछ वर्ष पहले छोटी बहन से सुना कि अमरीका में शिवानी जी उसके ही क्लिनिक में साथ काम करने वाले एक डाक्टर की सम्बंधीं हैं और उनके घर पर ठहरीं हैं. लगा कि हाँ, अपने प्रिय लेखक से सम्पर्क हो सकता है पर इससे कुछ समय बाद ही मालूम चला कि शिवानी जी नहीं रहीं.
फ़िर अचानक पिछले वर्ष अमरीका से शिवानी जी के पुत्र का संदेश मिला. उन्होंने कल्पना पर शिवानी जी के बारे में मेरा लिखा पढ़ा था जो उन्हे अच्छा लगा था. लगा जैसे कोई पूजा थी, जिसके लिए मुझे वरदान मिल गया हो.
उनके सराहये गये लेखन में अपराधिनी, कृष्णकाल, स्मृति कलश तो एक झलक मात्र हैं। नारी संवेदनाओं को चित्रित करने वाला शिवानी का पहला उपन्यास लाल दीवारें धर्मयुग में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुआ था. शांति निकेतन से ही उनका नाटकोम में रूझान बडा और जल्द ही कहानियां लिखना शुरू किया। उनकी सबसे पहली छपी कहानी (पब्लिश) बंगाली में थी लेकिन उनका ज्यादातर लेखन हिन्दी में ही था।
ग्रंथ सूची (उपन्यास, कहानियाँ, यात्रा वृतांत और निबंध)
छरयवेती - रूस की यात्रा संबन्धित वर्णन, अतिथी - नायिका जया की असफल शादी और शेखर के नये शादी के प्रस्ताव के इर्द गिर्द घूमती कहानी, पूतोंवाली, झरोखा, चल खुसरो घर आपने, वातायन, एक थी रामरति, मेरा भाई पथ्या, यात्रिक (अपने बेटे की शादी के लिये गयी लंदन यात्रा वृतांत), जालक, अमादेर शांति निकेतन, मानिक, शमशान चंपा, सुरंगमा, मायापुरी, कैंजा, भैरवी, गैंदा, कृष्णावेणी, स्वयं सिद्वा, करिया छिमा (माफ कीजिये), उप्रेति, चिर स्वयंवरा, विषकन्या, कृष्णाकली और अन्य कहानियाँ, कस्तूरी मृग, अपराधिनी, रथ्या, चौदह फेरे, रति विलाप, शिवानी की श्रेष्ठ कहानियाँ, स्मृति कलश, सुनहु तात ये अकथ कहानी, हे दत्तात्रेय (कुमाऊँ की संस्कृति और साहित्य के बारे में), मणिमाला की हंसी और शिवानी की मशहूर कहानियाँ।
शिवानी गौरा पंत का लेखन इंडिया क्लब से आप आन लाईन भी मंगा सकते हैं।
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7 Responses
vandy
July 27th, 2006 at 8:12 am
1Read “SATI” in my class 10th text book.
Like in one place she compares Pandits settled in England to our Pahari ‘Pandi ji’ and in some other context she wrote …Paharion ka lunch time 10 am…:-)
and watched the movie based on “Kariye Chima”( Raj kiran and Madhavi)
Her writings are not only intertaining but also informative.I love her short articles or stories most.’Yaatrik is such one collection.
and I love her humour too
Talking abt shivani…someone please stop me or I’ll spam Tarun’s blog..
Thanks Tarun for the lovely post.
yugal sanwal
April 4th, 2007 at 4:22 am
2from the childhood i use to read the books written by shivani, can not explain the the satisfaction which i get by reading this. still i feel lonely i read the collection of shivani .
shailesh
July 24th, 2007 at 9:59 pm
3shivani ka lagbhag poora sahitya maine pada hai par wo kabhi bhi kahin bhi chaap chorti najar nahi aayee , unki kai kahaniyon pahad ki prashtbhumi par likhi gayee hai par kahi bhi unme pahad kar baahv gehraii se mehsoos nahi hota hai, aur sabse badi baat hai ki unki kahaniyon mai sanskriti ka aadhkachara roop dikha hai. wo jis prishtbhumi kii rahi hai usse unki rachnaoo ke liye prakashak aasani se mil gayee jis wajeh se unhe lokpriyata jaldi mil gayee. aur agar uttarakhand ke sahitya ki baat ki jaye to shivani se bhi uunche darje ke kaii sahityakar pahad se rahe hai jisme shailesh matiyani pratham hai unka sahitya , unki kahaniya bejod hai, aaj poore hindi sahitya mai wo premchandra ke samaksh mane jatey hai . unki kahaniyon mai aanchalikta ki chaap hai kyonki unhone uss jeevan ko jiya hai jiski abhiwakti unke sahitya mai hu hai, unka sahitya vidroh ka sahitya hai, unka sahitya aam aadmi ke sangharsh ka sahitya hai, unka sahitya jindagi ke kathin sangharson se utapnn hui prem aur samvedanshhelta ki abhiwakti ka sahitya hai parantu apne jeevan kaal mai wo hamesha hi upekshit rahe matiyani ne kabhi bhi apni prasidhi ke liye kisi bhi terah ki ji hujoori nahi ki aur yahi khasiyaat unhe aanya sahityakaron se alag banati hai…
ritesh
September 17th, 2007 at 9:56 am
4i have read the books of shiwani ,whatsoever i was able to get from anywhere but still a lot of things are pending ,undoubtly it gives me a feeling that i started feeling myself in the beautifull world of uttranchal, i am not basically from uttranchal but i spent a good time there & by reading these books i am again feel myself in that world only
HEm
January 14th, 2008 at 6:15 pm
5शैलेश मटियानी को हमारे बीच से गये हुए छह साल पूरे हो चुके हैं। लगता है जैसे कल की बात हो। तमाम संघर्षो तथा दु:श्चिंताओं के बावजूद आखिरी समय तक जैसा कि वे लेखन के बारे में कहा करते थे,” कागज पर खेती” करते रहे। उनकी कहानियों पर टिप्पणी करते हुए राजेंद्र यादव ने स्वीकार किया है कि हम सबके मुकाबले उनके पास अधिक उत्कृष्ट कहानियां हैं। गिरिराज किशोर ने उनकी कहानियों का मूल्यांकन करते हुए उन्हें प्रेमचंद से आगे का लेखक ठहराया है। शैलेश ने न सिर्फ हिंदी के आंचलिक साहित्य को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया बल्कि हिंदी कहानी को कई यादगार चरित्र भी दिये। उनकी कहानियों का जिक्र आते ही मस्तिष्क में एक साथ कई चरित्र तेजी से घूमने लगते हैं, पद्मावती, इब्बू-मलंग, गोपुली, सावित्री, पोस्टमैन, नैन सिंह सूबेदार, सूबेदारनी, मिरदुला आदि ऐसे चरित्र हैं जो एक बार पाठक के मनोजगत में प्रवेश करने के बाद सदा-सदा के लिए उसकी स्मृति में डेरा जमा लेते हैं।
उनके रचना कर्म पर टिप्पणी करते हुए हंस संपादक ने अपने बहुचर्चित संपादकीय शैलेश मटियानी बनाम शैलेश मटियानी में लिखा था- मटियानी को मैं भारत के उन सर्वश्रेष्ठ कथाकारों के रूप में देखता हूं, जिन्हें विश्व साहित्य में इसलिए चर्चा नहीं मिली कि वे अंग्रेजी से नहीं आ पाए। वे भयानक आस्थावान लेखक हैं और यही आस्था उन्हें टालस्टाय, चेखव और तुर्गनेव जैसी गरिमा देती है। उन्होंने अद्र्धागिनी, दो दु:खों का एक सुख, इब्बू-मलंग, गोपुली-गफुरन, नदी किनारे का गांव, सुहागिनी, पापमुक्ति जैसी कई श्रेष्ठ कहानियां तथा कबूतरखाना, किस्सा नर्मदा बेन गंगू बाई, चिट्ठी रसैन, मुख सरोवर के हंस, छोटे-छोटे पक्षी जैसे उपन्यास तथा लेखक की हैसियत से, बेला हुइ अबेर जैसी विचारात्मक तथा लोक आख्यान से संबद्ध उत्कृष्ट कृतियां हिंदी जगत को दीं। अपने विचारात्मक लेखन में उन्होंने भाषा, साहित्य तथा जीवन के अंत:संबंध के बारे में प्रेरणादायी स्थापनाएं दी हैं।
भारतीय कथा में साहित्य की समाजवादी परंपरा से शैलेश मटियानी के कथा साहित्य का अटूट रिश्ता है। वे दबे-कुचले भूखे नंगों दलितों उपेक्षितों के व्यापक संसार की बड़ी आत्मीयता से अपनी कहानियों में पनाह देते हैं। वे सच्चे अर्थो में भारत के गोर्की थे।
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http://www.creativeuttarakhand.com/cu/celebrities/shailesh.html
yugal sanwal
August 9th, 2008 at 8:15 pm
6hi
shivani ji
kya likha hai unhone mai english main wo nahi kah sakata jo meri feelings hai
i feel that shivani is the true representatation of litrature.
i wish that mrinal pandey may be blessed by her devine gift.
Madan Mohan Joshi Shelshikher
October 8th, 2008 at 3:31 pm
7Hem ji ne Shri Shalaish Matiuani ji ke bare main bahut sahi likha, Badechina main Unke naam par bahut kuch honi chahiya thaa magar kuch nahi hai Uttaranchal Govt. ko kuch nahi to kam se kam ek Sangralaya aur ek library banani chahiya taki sab unki anmol vidhao ko pad kar unko jaan sake.
Madan Mohan Joshi
Gangolihat
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