हिन्दी साहित्य में शिवानी एक जाना पहचाना नाम है। इन्होनें काफी सारे उपन्यास, कहानियाँ, आलेख और निबन्ध लिखकर हिन्दी साहित्य को अपना योगदान दिया है। इनके लेखन में भावों का सुन्दर चित्रण, भाषा की सादगी तो होती ही थी साथ ही साथ पहाड‌‌‌, वहाँ रहने वाले भोले भाले लोग और वहाँ की संस्कृति का जीता जागता वर्णन होता था। अगर आपने उनका लिखा साहित्य पढ‌ा है तो समझ लीजिये कि कुमाऊँनी तो आप आसानी से समझ लेंगे क्योंकि उनके लेखन में कुमाऊँनी शब्दों और मुहावरों की भरमार रहती थी। उनके शब्दों में,

मेरा लेखन कोई कल्पना की उड‌ान नही, यह सच्चाई से जुड‌ा है

शिवानी का जन्म सन् १९२३ में सौराष्ट्र में हुआ, उनके पिता अश्विनी कुमार पांडे रामपुर स्टेट में दिवान थे, वह वायसराय के वार काउंसिल में मेम्बर भी थे। उनकी माता संस्कृत की विदूषी ही नही वरन लखनऊ महिला विधालय की प्रथम छात्रा भी थीं। १९३५ से १९४३ के मध्य उन्होने रविन्द्र नाथ टैगोर के शांति निकेतन में विधा अध्ययन किया और १९५३ में कलकत्ता से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उन्हें गुजराती, बंगाली, संस्कृत, अंग्रेजी और उर्दू का भी अच्छा ज्ञान था। उनके पति एस डी पंत शिक्षा विभाग में थे और दुर्भाग्य से काफी जवानी में उनका निधन हो गया था। शिवानी की तीन बेटियाँ (वीना, मृणाल पांडे, ईरा पांडे - मृणाल और ईरा भी जानी मानी लेखिका हैं) और एक बेटा (मुक्तेश पंत, बच्चों में सबसे छोटा और आजकल अमेरिका में) हैं। शादी के बाद शिवानी का ज्यादा वक्त कुमाऊँ की पहाडियों में ही बीता, बाद में वो लखनऊ में आकर रहने लगी। मार्च २००३ को नई दिल्ली में अपने बच्चों में दीदी के नाम से विख्यात इस ईजा (माँ) का देहांत हुआ।

पहली बार ‘करिया छिमा’ से उनके लेखन से रूबरू हुए प्रतीक का लिखना है,

एक बार किताब खोलकर पढ़ना शुरू किया तो पाँच कहानियाँ पढ़ डालीं। छठी कहानी भी पढ़ने की इच्छा थी, लेकिन चाह कर भी मैं पढ़ न सका। क्योंकि एक को छोड़कर सभी कहानियाँ दु:खान्त हैं और शिवानी जी की शैली सीधे हृदय पर असर करती है। उन्होंने अपनी इन कहानियों में स्त्री की व्यथा और सामाजिक बन्धनों को बेहद संजीदगी से उकेरा है। पाठक स्त्री पात्रों के कष्टों से अपना तादात्म्य महसूस करता है और उसका हृदय इन पात्रों की व्यथा-कथाओं में डूब जाता है। नारी के मनोभावों के विस्तृत आयामों का ऐसा गम्भीर चित्रण मैंने आज तक और कहीं नहीं पढ़ा।

पढ़ते-पढ़ते मैं इतना भावुक हो गया, कि अपने आँसुओं को टपकने से सम्हालना पड़ा। इससे पहले मैं अपने आप को काफ़ी कठोर और भावुकता के प्रति एक हद तक असम्वेदनशील भी समझता था, लेकिन मुझे क्या मालूम था कि शिवानी जी की क़लम का जादू सभी चट्टानें तोड़ कर अन्दर की तरलता आँखों तक ला देता है।

वहीं इटली से सुनील का कहना है,

बचपन में हिंदी लेखिका शिवानी मुझे बहुत पसंद थीं, पर उनसे कभी सीधा कोई सम्पर्क नहीं हुआ. फ़िर कुछ वर्ष पहले छोटी बहन से सुना कि अमरीका में शिवानी जी उसके ही क्लिनिक में साथ काम करने वाले एक डाक्टर की सम्बंधीं हैं और उनके घर पर ठहरीं हैं. लगा कि हाँ, अपने प्रिय लेखक से सम्पर्क हो सकता है पर इससे कुछ समय बाद ही मालूम चला कि शिवानी जी नहीं रहीं.

फ़िर अचानक पिछले वर्ष अमरीका से शिवानी जी के पुत्र का संदेश मिला. उन्होंने कल्पना पर शिवानी जी के बारे में मेरा लिखा पढ़ा था जो उन्हे अच्छा लगा था. लगा जैसे कोई पूजा थी, जिसके लिए मुझे वरदान मिल गया हो.

उनके सराहये गये लेखन में अपराधिनी, कृष्णकाल, स्मृति कलश तो एक झलक मात्र हैं। नारी संवेदनाओं को चित्रित करने वाला शिवानी का पहला उपन्यास लाल दीवारें धर्मयुग में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुआ था. शांति निकेतन से ही उनका नाटकोम में रूझान बड‌ा और जल्द ही कहानियां लिखना शुरू किया। उनकी सबसे पहली छपी कहानी (पब्लिश) बंगाली में थी लेकिन उनका ज्यादातर लेखन हिन्दी में ही था।

ग्रंथ सूची (उपन्यास, कहानियाँ, यात्रा वृतांत और निबंध)

छरयवेती - रूस की यात्रा संबन्धित वर्णन, अतिथी - नायिका जया की असफल शादी और शेखर के नये शादी के प्रस्ताव के इर्द गिर्द घूमती कहानी, पूतोंवाली, झरोखा, चल खुसरो घर आपने, वातायन, एक थी रामरति, मेरा भाई पथ्या, यात्रिक (अपने बेटे की शादी के लिये गयी लंदन यात्रा वृतांत), जालक, अमादेर शांति निकेतन, मानिक, शमशान चंपा, सुरंगमा, मायापुरी, कैंजा, भैरवी, गैंदा, कृष्णावेणी, स्वयं सिद्वा, करिया छिमा (माफ कीजिये), उप्रेति, चिर स्वयंवरा, विषकन्या, कृष्णाकली और अन्य कहानियाँ, कस्तूरी मृग, अपराधिनी, रथ्या, चौदह फेरे, रति विलाप, शिवानी की श्रेष्ठ कहानियाँ, स्मृति कलश, सुनहु तात ये अकथ कहानी, हे दत्तात्रेय (कुमाऊँ की संस्कृति और साहित्य के बारे में), मणिमाला की हंसी और शिवानी की मशहूर कहानियाँ।

शिवानी गौरा पंत का लेखन इंडिया क्लब से आप आन लाईन भी मंगा सकते हैं।

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