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घर की जोगन जोगनी आन गाँव की सिद्ध

इस पोस्ट को आगे बढ़ाने से पहले ये बेहतर होगा कि इस टाईटिल का मतलब समझ लिया जाय, जस्ट इन केस अगर किसी को समझ ना आये। दरअसल ये एक हिन्दी मुहावरा है ‘घर का जोगी जोगना आन गाँव का सिद्ध” चूँकि मैं बात महिला की करने वाला हूँ इसलिये जोगन जोगनी कर दिया, इसका [...]

[ More ] November 20th, 2010 | 3 Comments | Posted in समाज और समस्‍या |

ख्वाब की दस्तक ने खोले बंद यादों के किवाड़ – 2

स्कूल के दिनों में दूरदर्शन के बेहतरीन टीवी सीरियलस को याद करते हुए मैने कुछ सीरियलस पिछली बार बताये थे, आज उसी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए कुछ और सीरियलस को याद करते हैं। शरद जोशी का लिखा हुआ एक बहुत ही सरल और सरस कामेडी सीरियस आता था, “ये जो है जिंदगी“। इस सीरियल [...]

[ More ] March 30th, 2009 | 12 Comments | Posted in old days of childhood |