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बम धमाकों पर निठल्लिकाएँ

मैं कोई साहित्यिक नही इसलिये शब्दों के फेर में ज्यादा पड़े बिना मैने ये शब्द ईजाद कर लिया। कम लाईनों में कविता करने के एक तरीके को शायद क्षणिकाएँ कहते हैं। अगर वैसे ही कम लाईनों में कुछ गद्ध लिखा जाये तो उसे क्या कहेंगे समझ नही आया इसलिये हमने नाम दिया निठल्लिकाएँ। आइये बम [...]

[ More ] October 3rd, 2008 | 14 Comments | Posted in जरा हट के |

जीना सिखाती ये तस्वीरें

कहते हैं एक तस्वीर कई बार हजार शब्दों से ज्यादा प्रभावी होती है, कई बार ऐसा होता है कि मुश्किलों के आगे और कई तरह की असुविधाओं के चलते हम लोग थोड़ा डाउन महसूस करते हैं। और ऐसे समय में अगर इन लोगों को इन तस्वीर के जरिये देखें तो शायद यही कहना पड़ेगा – [...]

[ More ] September 26th, 2008 | 27 Comments | Posted in बस यूँ ही |

फिल्म समीक्षाः A Wednesday

A Wednesday, WOW! What a Superb film, इस फिल्म के बारे में अगर संक्षेप में लिखूँ तो वो होगा A MUST WATCH FILM। फिल्म के बारे में कुछ और बताने से पहले एक बात और कहना चाहूँगा कि कहानी के प्लॉट और आयडिया के मामले में नये फिल्मकार पुराने फिल्मकारों से बीस ही साबित हो [...]

[ More ] September 22nd, 2008 | 18 Comments | Posted in फिल्म समीक्षा |

देहली ब्लास्ट की चंद तस्वीरें

मुझे पराशरजी ने ईमेल से ये तस्वीरें भेजी, एक तो बहुत ही हृदय विदारक है या भयानक है कहूँ समझ नही आया। मैं कोशिश कर रहा था ये जानने कि फोटो में दिख रहे ये लोग किस धर्म के होंगे, देख रहा था इनके खून से क्या पता कुछ क्लू मिल जाये लेकिन NO LUCK। [...]

[ More ] September 18th, 2008 | 13 Comments | Posted in समाज और समस्‍या |

पराशर गौड़ की एक कविताः पीड़ा

पराशर गौड़ उत्तराखंडी सिनेमा के जनक कहे जाते हैं, इनके द्वारा पहाड़ी महिला के संघर्ष की कहानी पर निर्मित फिल्म गौरा अभी इस साल के शुरू में रिलीज हुई थी। इन्होंने फिल्मों के साथ साथ कई नाटक और कवितायें भी लिखीं हैं, आज इन्हीं की एक कविता पोस्ट कर रहा हूँ जो इन्होंने कल-परसों शायद [...]

अनिश्चित काल के लिये निठल्ला चिंतन बंद

सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है कि निठल्ला चिंतन अनिश्चित काल के लिये बंद करना पड़ रहा है। निठल्ले के अचानक से त्याग पत्र देने की वजह से ऐसा किया जा रहा है। निठल्ले को मनाने और वापस लाने के लिये हमारी बातचीत जारी है लेकिन ये जल्दी होता नही दिख रहा। ये अभी तक [...]

[ More ] September 4th, 2008 | 13 Comments | Posted in जरा हट के |

जिस रोज मुझे भगवान मिले: अंतिम भाग

अब तक आप ने पढ़ा भाग १ नेताओं की तरह तुरंत पाला बदलते हुए अपना आत्म सम्मान, अपना दिल-दिमाग सब कुछ अपनी जेब में रख हाथ जोड़ के हम बोल पड़े, “बस भगवन बस सब समझ गया। लेकिन शक का इलाज तो किसी वैध के पास है नही मन अभी भी शक कर रहा था [...]

जिस रोज मुझे भगवान मिले

‘ना माया से ना शक्ति से भगवन मिलते हैं भक्ति से’, एक खुबसूरत गीत है और इसको सुनने के बाद लगा कि अगर मिलते होते तो भी प्रभु हमको मिलने से रहते। क्योंकि माया हमे वैसे ही नही आती, शक्ति हममें इतनी है नही और भक्ति हम करते नही, तो कुल जमा अपना चांस हुआ [...]

प्रेम कविता

जिन्हें अब तक नही मालूम उन्हें बता दें कि यदा कदा हम भी कविता जैसे शब्द कागज में उड़ेल लेते हैं। ये अलग बात है कि उसमें प्रेम या श्रृंगार रस नही के बराबर पाया जाता है। लेकिन ऐसा नही है कि हम शब्दों को प्रेमरस या श्रृंगार रस की चासनी में भिगोने का प्रयास [...]

[ More ] August 27th, 2008 | 17 Comments | Posted in शायरी और गजल |