< Browse > Home

| Mobile | RSS

एक टिप्पणी गलत पड़ी थी कुछ नये हिंदी ब्लोगस में

एक परेशान दिल से निकली आह की कराह जानकर बतायें आप किस जमात में शामिल है, सताये हुए की या सताने वाले की। आजकल जिंदगी बहुत व्यस्त चल रही है, कई कई दिनों तक ब्लोगिंग में उपयोग लायी ई-मेल चैक नही हो पाती और आज जब थोड़ा फुरसत में चैक की तो देखकर दिल से [...]

[ More ] June 5th, 2009 | 27 Comments | Posted in बस यूँ ही |

चलते-चलते लड़खड़ा गयी दिल्ली – Six

शुक्रवार के दिन पहले IPL 2009 का सेमी फाईनल मुकाबला देखा जिसमें दिल्ली की दिलेरी को लड़खड़ाते देखा और फिर उसके बाद अगले दिन दिल्ली -६ का वो ही हस्र होते देखा। शनिवार के दिन एक फिल्म हमको देखनी पड़ी, दूसरी हमने देखी। जो देखनी पड़ी उसका नाम था Night at the Museum: Battle of [...]

[ More ] May 26th, 2009 | 9 Comments | Posted in फिल्म समीक्षा |

जूता संस्कृतिः “बहस”

अभी पिछली पोस्ट जल्दी-जल्दी में मैंने जूतम-बजारी पर लिखी थी और कल ही पराशर गौड़ जी ने अपनी खुद की लिखी ये कविता मेल से भेजी, जिसमें जूते और चप्पलों की बहसबाजी है इस बात की कि कौन बड़ा? जूते चप्पलो में हो गई बहस छिड गई लड़ाई लगे करने दोनों अपनी अपनी बड़ाई! चप्पलें [...]

[ More ] April 29th, 2009 | 8 Comments | Posted in Guest Column |

हम लोगों ने जगह जगह थूकना छोड़ जूता फेंकना शुरू कर दिया क्या?

एक ईराकी पत्रकार ने जूता क्या फेंका भारत में जूते यूँ फेंके जाने लगे जैसे कुछ समय पहले डाक्टरों (अस्पताल या मेडिकल स्कूलों) की हड़ताल हुआ करती थी। अगर ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन ऐसा आयेगा जब पब्लिक चाहे लंच बॉक्स रखना भूल जाये लेकिन बैग में एक जोड़ी जूता रखना नही भूलेगी। [...]

इस विज्ञापन में लड‌़के और लड़कियों दोनों के लिये कुछ है

कुछ दिनों से ये विज्ञापन यहाँ टीवी में आ रहा है, बनाने वाले ने दिमाग का अच्छा इस्तेमाल किया है लेकिन हकीकत में ये कितनों को मिल पाता है वो दूसरी बात है, इन्जॉय

[ More ] April 24th, 2009 | 9 Comments | Posted in Advertisement |

सेक्सटिंगः गलती किसकी है? लड़की की, उसके दोस्त की या फिर माँ-बाप की

आजकल अमेरिका में ये समस्या बढ़ती जा रही है और इसी कड़ी में ताजातरीन घटना अभी कुछ समय पहले घटी जब एक मीडिल स्कूल की लड़की ने अपनी खुद की एक नग्न तस्वीर खिंच अपने मोबाइल फोन से अपने दोस्त को भेजी। उसके उस दोस्त ने वो ही फोटो अपने मोबाइल से अपने कुछ दोस्तों [...]

[ More ] April 12th, 2009 | 19 Comments | Posted in समाज और समस्‍या |

कान की बालियों का माला में पिरोया जाना फिर टूट के बिखर जाना

माइक्रो पोस्ट के रूप में एक छुटपुट विचारः कान की बालियाँ (या बुंदें) तो आपने देखी होंगी, दोनों कानों में अलग-अलग रहती हैं। (ईकोनामी के) ग्लोबलाईजेशन से पहले लगभग हर देश की ईकोनॉमी कुछ ऐसी ही थी, फिर बालियाँ माला में पिरोयी गयी यानि ईकोनॉमी एक दूसरे से लिंक हुई (ग्लोबलाईजेशन)। और उसके बाद एक [...]

[ More ] April 8th, 2009 | 6 Comments | Posted in Micro Post |

मेरे बेटे की लिखी पहली हाइकू कविताः बर्फ

कविताओं के जानकारों का क्या कहना है एक छोटे से बच्चे की लिखी इस हाईकू कविता के बारे में। आज अभी जब मैं उसकी टीचर से मिलने गया तो सबसे बड़ा सरप्राईज मुझे मिला उसकी लिखी हाईकू कविता देखकर। वैसे उसने २ लिखी थीं लेकिन मैं ये वाली ही टिप पाया। मेरा बेटा जो कि [...]

ख्वाब की दस्तक ने खोले बंद यादों के किवाड़ – 2

स्कूल के दिनों में दूरदर्शन के बेहतरीन टीवी सीरियलस को याद करते हुए मैने कुछ सीरियलस पिछली बार बताये थे, आज उसी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए कुछ और सीरियलस को याद करते हैं। शरद जोशी का लिखा हुआ एक बहुत ही सरल और सरस कामेडी सीरियस आता था, “ये जो है जिंदगी“। इस सीरियल [...]

[ More ] March 30th, 2009 | 12 Comments | Posted in old days of childhood |