१-२ महीने पहले ये निठल्ला चिन्तन किया था एक लम्हे के लिये, पढ़ कर मजा लीजिये।
एक लम्हा एक दिन ले के आया बाटली,
चलता था लड़खड़ा के, जब से दारू चाट ली।
बाटली को गटक के, वो वहीं बस रूक गया,
आने वाला कल ना आया, आज कुछ थम सा गया।
यम था हैरां परेशाँ, लोग क्यों नही मर […]
मेरा तेरा करता रहता ये सारा संसार,
खाली हाथ सभी को जाना छोड़ के ये घरबार।
उत्तर, दक्षिण, पूरब पश्चिम, चाहे तुम कहीं भी देखो,
वही खुदा है सब जगह, घर देखो या मंदिर देखो।
जब से जोगी जोग लिया, और भोगी ने भोग लिया,
तब से ही इस कर्म गली में, कुछ लोगों ने ढोंग लिया।
पहन के कपड़े उज्जवल […]
प्रेम कविता लिखने की, एक दिन हमने भी ठानी
लिखने से पहले मन बोला, कहाँ है दिल की रानी।
कहाँ है दिल की रानी, जो प्रेम रस को घोले
अपना भी दिल कभी, कुछ इलु इलु बोले।
आये कोई, हमें भी, जो थोड़ा दर्द दे जाय
कवि ना बन पाये ये दिल तो शायर बन जाय।
तभी अचानक सामने, आयी अति […]
कालेज के वक्त लिखी एक कविता -
आड़ी तिरछी रेखांओ से
बना हुआ
मेरा व्यक्तित्व,
काँटों के बीच फूल सा
खिला हुआ
मेरा व्यक्तित्व।
पत्ता,
सूखा पिला
टहनी,
कुछ सीधी, कुछ तिरछी
पतझड़ के मौसम में
पेड़ों का कैसा व्यक्तित्व,
शायद
ये मेरा व्यक्तित्व।
मेरे मौला, मेरा रहनुमा बन तू मेरे साथ में चल
अपने कल का भरोसा नही मुझको
कम से कम आज तो तू मेरे साथ में चल।
धर्म के नाम पर आदमी ने दिये तुझको नाम कई
बनाया मंदिर, कहीं मस्जिद और बनाये चर्च कहीं।
तू सिर्फ एक है, इस बात को तो ये लोग भूल गये
इनको ये एहसास दिलाने तू […]