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भेड़ियों के देश में

इसे पढ़ते पढ़ते सोचकर देखिये, आप एक दिन पास के ही सुंदर से जंगल में भ्रमण का विचार बनाते हैं और निकल पड़ते हैं अकेले ही। खुबसूरत वादियों, झरनों, पेड़ों से मंत्रमुग्ध होकर चलते आपके सामने अचानक कुछ भेड़िये आ जाते हैं। उन भेड़ियों से बचने के लिये आप बेतहाशा भागने लगते हैं और अंत [...]

रस्सी जल गयी पर बल नही गया

पाकिस्तान के ऊपर ये कहावत बिल्कुल ठीक बैठती है, हाल ही में आयी बाढ़ ने पाकिस्तान के एक हिस्से का जन-जीवन तहस नहस कर दिया है। तकदीर के मारे उन लोगों को पाकिस्तान सरकार उतनी तेजी से जरूरत के हिसाब से राहत मुहया नही करा पा रही है, इसके बाद भी उस देश के हुकुमरानों [...]

सिमटती हिंदी ब्लोगिंग का बढ़ना जारी है

आह वाह से उठकर पढ‌़ने वालों को हो सकता है इस पोस्ट के टाईटिल में विरोधाभास नजर आये, इसलिये आगे कुछ कहने से पहले टाईटिल के फर्क को जान लें। बढ़ने और सिमटने में वो ही फर्क है जो किसी भी ग्राफ के x-Axis और y-Axis में यानि बढ़ना vertically होता है और सिमटना horizontally। [...]

भारतीय संस्कृति भी कोई दूध की धुली नही है

मैने अपनी पिछली पोस्ट में एक टीन प्रीगनेंसी का जिक्र किया था जो कि हमारे समाज (क्या पश्चिम क्या पूर्व) की विफलता का ही शायद नतीजा है। उसमें शास्त्रीजी की एक टिप्पणी आयी थी, जिसे पढ़कर ही मुझे कहना पड़ रहा है भारतीय संस्कृति (या सभ्यता या समाज) भी कोई दूध की धुली नही है। [...]

अगर मुन्नाभाई फूलों की जगह चड्ढी भेजता तो…

ध्यान रहे मैने गुलाबी नही कहा, क्यों? वो बाद में बताऊंगा पहले चड्ढी की कबड्डी से संबन्धित तीन पोस्ट का जिक्र करना चाहूँगा जो मैने पिछले १-२ दिन में पढ़ी थी। पहली पोस्ट थी सुरेश चिपलूनकर की जिन्होंने शुरूआत तो गुलाबी चड्डी भेजने के विरोध से की लेकिन फिर मुद्दे से भटक गये और व्यक्तिगत [...]

“सुर्पनखा बन नाक कटाये”,, क्या इसे कहावत बना सकते हैं?

ये तो सभी जानते हैं कि त्रेता युग में विभिषण ने रावण को हरवाने में भगवान राम की मदद की थी जिसके फलस्वरूप इस तरह के केस के लिये ही ये कहावत बनी है – घर का भेदी लंका ढाये। उसी त्रेता युग में सुर्पनखा भी हुई थी, जो पहले राम पर लट्टू हुई लेकिन [...]

एक मीडिया, एक गाली, एक ब्लोगर और बचेखुचे भारतीय

कुछ लिखने से पहले ही बता दूँ मेरी समझ से ‘बचेखुचे’ कहना गाली में नही आता, अगर आता है तो बता दें मेरा भी थोड़ा ज्ञान बढ़ जायेगा। अभी पिछले कुछ दिनों में ही पत्रकार बनाम ब्लोगर प्रकरण पढ़ने में आया। कुछ लोग खासकर मीडिया वाले पत्रकार (बरखा दत्त) का पक्ष ले रहे हैं, वहीं [...]

समस्या स्लम से है या डॉग से या उसे मिलेनियर बनाने वाले से

स्लमडॉग ऐसी फिल्म नही जिस पर इतनी ज्यादा क्रिया प्रतिक्रिया की जाये, कुछ इसे फिल्म से हटकर सोचते हैं और वहाँ पर सवाल या समस्या उठ खड़ा होता है। अब सवाल ये है कि समस्या स्लम से है या डॉग से या उसे मिलेनियर बनाने वाले से? समस्या स्लम से तो होनी नही चाहिये क्योंकि [...]

भस्मासुर को मिला वरदान है धर्मनिरपेक्षता

आप लोगों ने भस्मासुर का नाम तो सुना होगा अगर नही तो मैं बता दूँ भस्मासुर एक राक्षस था जिसने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिये कठोर तपस्या की। शिव के प्रसन्न होने पर उसने वरदान माँगा कि वो यानि भस्मासुर जिसके सिर पर भी हाथ रखे वो भस्म हो जाये। शिव तो ठेरे [...]