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माइक्रो पोस्टः बदलते रिश्ते

कह नही सकता ये बदलते दौर का असर है या बदलते रिश्तों का, फेसबुक जैसी सोशियल नेटवर्किंग साईट में दोस्तों का आंकड़ा भले ही १०० के ऊपर हो लेकिन अपने अपने पड़ोस में एक घर छोड़ कौन रहता है ये शायद ही किसी को मालूम हो। अपने पड़ोसी का शाम के वक्त घर आना गवारा [...]

[ More ] September 14th, 2010 | 3 Comments | Posted in बस यूँ ही |

एक टिप्पणी गलत पड़ी थी कुछ नये हिंदी ब्लोगस में

एक परेशान दिल से निकली आह की कराह जानकर बतायें आप किस जमात में शामिल है, सताये हुए की या सताने वाले की। आजकल जिंदगी बहुत व्यस्त चल रही है, कई कई दिनों तक ब्लोगिंग में उपयोग लायी ई-मेल चैक नही हो पाती और आज जब थोड़ा फुरसत में चैक की तो देखकर दिल से [...]

[ More ] June 5th, 2009 | 27 Comments | Posted in बस यूँ ही |

हम लोगों ने जगह जगह थूकना छोड़ जूता फेंकना शुरू कर दिया क्या?

एक ईराकी पत्रकार ने जूता क्या फेंका भारत में जूते यूँ फेंके जाने लगे जैसे कुछ समय पहले डाक्टरों (अस्पताल या मेडिकल स्कूलों) की हड़ताल हुआ करती थी। अगर ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन ऐसा आयेगा जब पब्लिक चाहे लंच बॉक्स रखना भूल जाये लेकिन बैग में एक जोड़ी जूता रखना नही भूलेगी। [...]

जाको राखे साईंया – क्या वाकई में?

हमारी और आसपास के लोगों की जिंदगी में अक्सर ऐसा कुछ ना कुछ घटित हो जाता है जिससे सभी का ‘जाको राखे साईंया’ कहावत पर यकीन बना रहता है। सवाल ये भी उठ सकता है जब बचाना उसी ने ही है तो वो क्यों ऐसी परिस्थिति आने देता है जहाँ उसे बचाने आना पड़े। इसका [...]

हिंदी ब्लोगिंग का समाचार पत्रों में उल्लेख रामखिलावन की भैंस की खबर जैसा है

पिछले एक साल में हिंदी ब्लोगरस या ब्लोगिंग का हिंदी समाचार पत्रों में कई बार उल्लेख हुआ है अगर एक या दो लेखों को छोड़ दें तो ज्यादातर आलेख पढ़कर लगा कि ये उसी तरह से छपे हैं जैसे रामखिलावन की भैंस की खबर। ज्यादातर सभी आलेखों में अगर मगर करके गिने-चुने १०-१२ ब्लोगस (या [...]

[ More ] January 6th, 2009 | 17 Comments | Posted in बस यूँ ही |

माइनस डिग्री तापमान, फुटबाल मैच और कुछ अधनंगे लड़के लड़कियाँ

आज सुबह यहाँ का तापमान था जीरो डिग्री, जिसे ठंडी हवाओं ने माइनस सात डिग्री (-7 सेंटिग्रेट) पहुँचा दिया था और ऐसे में हमें जाना था अपने बेटे के आखिरी फुटबॉल मैच के लिये। ठंड का अनुमान तो फील्ड में पहुँचने पर ही लगा, लेकिन ये कमाल के बच्चे थे ऐसी ठंड में भी रोते [...]

[ More ] November 23rd, 2008 | 11 Comments | Posted in बस यूँ ही |

कुछ बिखरे बिखरे शब्द

आजकल व्यस्तता कुछ ज्यादा ही है वक्त कब मुट्ठी में से रेत की तरह फिसल जाता है पता ही नही चलता। कुछ वैसे ही जैसे कभी-कभी पर्सनल पत्र चर्चा में आ जाते हैं या कब कैसे थूक मुँह से निकल किसी के चेहरे पर आ लगता है या २ साल का कोई बच्चा घर को [...]

[ More ] November 12th, 2008 | 13 Comments | Posted in बस यूँ ही |

अपने अपने आकाश के पंछी

आजादी से पहले हो या बाद में आकाश वो ही है, बँटा हुआ हम में तुम में, जैसे कुँए का मेढक एक कुँए से दूसरे में नही जा सकता कुछ वैसे ही उड़ते रहते हैं अपने अपने आकाश में ये पंछी। ये एक स्कूल है, प्राइमरी यहाँ से बच्चे शुरूआत करते हैं उड़ने की, एक [...]

[ More ] October 14th, 2008 | 14 Comments | Posted in बस यूँ ही |

शास्त्रीजी आपकी टिप्पणी के लियेः धन्यवाद

फर्स्ट थिंग फर्स्ट, हमको शायद पहली बार शास्त्रीजी की टिप्पणी पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, ये टिप्पणी का प्रताप है कि हमें शुक्रिया कहने को पोस्ट लिखनी पड़ रही है इसलिये तुम्हारी भी जय जय, हमारी भी जय जय। शास्त्री जी ने हमारे नये चिट्ठे पर कुछ यूँ टिप्पणी छोड़ी (उनकी तरह ही कट-पेस्ट करके [...]

[ More ] October 8th, 2008 | 14 Comments | Posted in बस यूँ ही |