भेड़ियों के देश में
इसे पढ़ते पढ़ते सोचकर देखिये, आप एक दिन पास के ही सुंदर से जंगल में भ्रमण का विचार बनाते हैं और निकल पड़ते हैं अकेले ही। खुबसूरत वादियों, झरनों, पेड़ों से मंत्रमुग्ध होकर चलते आपके सामने अचानक कुछ भेड़िये आ जाते हैं। उन भेड़ियों से बचने के लिये आप बेतहाशा भागने लगते हैं और अंत में एक जगह जाकर रूक जाते हैं क्योंकि आगे एक बड़ी खाई है। आप के सामने अब दो ही रास्ते हैं या तो आपको नोचने खाने को बेकरार भेड़ियों से भिड़ जायें और या आपके पीछे की खाई में कूद जायें। आप दोनों में से कोई भी रास्ता क्यों ना चुने दुर्गत आपकी ही होनी है, जिंदगी आप की ही दाँव पर लगनी है।
अगर आप को ऊपर कही बात कहानी लगे तो इसके पात्रों से भी परिचय करा दूँ -
टेक – १
मध्य प्रदेश का एक जंगल और इसमें भेड़ियों से बचने के लिये युवती चलती ट्रेन से छलान लगा देती है। भेड़िये अभी भी बगैर किसी खरोंच जिंदगी के मजे ले रहे हैं और उस युवती की जिंदगी से जंग जारी है। वो ये जंग शायद जीत जाये लेकिन क्या उसका ये घाव कभी भर पायेगा?
टेक – २
उत्तर प्रदेश का एक जंगल और इसमें युवती भेड़ियों से भिड़ जाती है। यहाँ भी भेड़िये जिंदगी के मजे ले रहे हैं और लेते रहेंगे और वो युवती जिंदगी से अपने जिंदा रहने की जंग लड़ रही है। वो भी ये जंग शायद जीत जाये लेकिन क्या वो फिर से वही जिंदगी जी पायेगी?
ये घटना तो एक ऐसे प्रदेश में हुई है जिसकी सर्वेसर्वा ही एक महिला है और वो भी उस पार्टी की जो अपने को उस वर्ग विशेष की मसीहा बताती है जिसके साथ ये हादसा हुआ है। बात निकली है तो कह दूँ, जब से उत्तर प्रदेश में समाजवादी और बहुजन पार्टी की सरकारें अपनी अपनी पारियां खेल रही है उत्तर प्रदेश का दिन-ब-दिन पतन ही हो रहा है।
ऐसी घटनायें पढ़कर अपनी बचीखुची डेमोक्रेसी की भावना टूटने बिखरने लगती है, ऐसी घटनायें घटने के बाद जो भी पुलिस करती है या कर रही है वो अंत में जाकर महज खानापूर्ती के सिवाय कुछ नही लगता।
अभी कुछ दिनों पहले प्रवीण अपनी एक पोस्ट में मन के बच्चे के बचे रहने की बात कर रहे थे। प्रवीण अच्छा लिखते हैं क्योंकि वो खुद अच्छा सोचते हैं और जाहिर हैं वो एक अच्छे इंसान भी होंगे क्योंकि वो ही लिख सकता है -
जो था अच्छा बचा रहे,
जो था सच्चा बचा रहे,
जीवन की यह आपाधापी,
मन का बच्चा बचा रहे।
लेकिन हर रोज जब इस तरह की खबरें देखने सुनने में आती हैं तो शक होने लगता है प्रवीण की लिखी ये लाईनें कितने दिन जिंदा रह पायेंगी। कहीं ऐसा ना हो कभी किसी को ऐसा लिखना पड़े -
जो था अच्छा बचा नही,
जो था सच्चा बचा नही,
जीवन की वो आपाधापी,
मन का बच्चा बचा नही।


February 9th, 2011 at 3:01 pm
भेड़ियों को उन्मुक्त घूमते देख क्षोभ होता है, तभी यह प्रार्थना निकलती है। जब सब ओर आग लगी हो, काश ये भेड़िये भी स्वाहा हो जायें उसमें।
February 9th, 2011 at 8:03 pm
भेडि़या गुर्राता है तुम मशाल जलाओ – सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
February 10th, 2011 at 12:15 am
खाई मे कुदने से अच्छा हे इन भेडियो के संग लडे, लेकिन कल की खबर देख कर मन बहुत दुखी हुआ, जब एक पुलिस अफ़सर ही इन के जुते साफ़ करेगा तो जनता की रक्षा कोन करेगा, अब तो सच मे जगल राज हे उतर प्रदेश मे ओर भेडिये आजाद घुम रहे हे