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माइक्रो पोस्टः बदलते रिश्ते

September 14th, 2010 | 3 Comments | Posted in बस यूँ ही

कह नही सकता ये बदलते दौर का असर है या बदलते रिश्तों का, फेसबुक जैसी सोशियल नेटवर्किंग साईट में दोस्तों का आंकड़ा भले ही १०० के ऊपर हो लेकिन अपने अपने पड़ोस में एक घर छोड़ कौन रहता है ये शायद ही किसी को मालूम हो। अपने पड़ोसी का शाम के वक्त घर आना गवारा नही क्योंकि पोस्ट जो लिखनी है लेकिन उम्मीद यही है कि वो पड़ोसी हमारी हर पोस्ट पर आकर टिप्पणी जरूर करके जाय। ये सोचकर नान ब्लोगर पड़ोसियों से मिलना बंद है कि उस वक्त में दूसरों के ब्लोग में टिपियाया जाये क्योंकि वहाँ से बदले में पीठ खुजवाये जाने की उम्मीद है। बदलते रिश्ते हैं शायद, घरों से निकल कर इंटरनेट में आ बैठे हैं……

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3 Responses to “माइक्रो पोस्टः बदलते रिश्ते”

  1. उधेड़ूलाल Says:


    यह सच है, दाज़्यू !
    ध्रुवसत्य यह है कि आभासी तत्व एवँ वास्तविकतायें एक दूसरे की धुर विरोधी रहीं हैं,
    पर एक कटु तथ्य उनके साथ यह भी चलता रहा है कि
    एक की अनुपस्थिति में दूसरा अपना महत्व खो देती है…
    ” काना देख जीऊ जराये काने बिन रहा न जाये ” जैसा रिश्ता है, यह !
    वास्तविकतायें हमारे अँदर के पोलेपन को उधेड़ती हैं,
    तो आभासी जगत उस पोलेपन को पूरती हैं…
    हमारा ईगो एक ऎसा हीन तत्व है कि यह उधेड़े जाने से हमेशा भागता ही रहा है,
    इसी बिन्दु पर इन्टरनेट अपनी और हमारी जीत दर्ज़ कराता है..
    सो, सहज ही हम उसे ही सच्चा दोस्त मान कर उससे जुड़े रहना पसँद करते हैं ।
    शब्दों के इस दार्शनिक घालमेल का निचोड़ यह है कि,
    टिकटी ( अर्थी ) को सहारा देने वाले कँधे हमारी ज़रूरत हैं,
    और श्रद्धाँजलि के शब्द हमारा विलास !
    आवश्यकता इस बात की है कि विलासिता को दोयम स्थान पर रखा जाये ।
    कोई ताज़्ज़ुब नहीं कि दुनिया से जुड़ कर आदमी और भी अकेला होता जा रहा है ।

  2. Abhishek Says:

    … “कोई ताज़्ज़ुब नहीं कि दुनिया से जुड़ कर आदमी और भी अकेला होता जा रहा है ।” सत्य वचन !

  3. ashok pandey Says:

    आप ठीक कह रहे हैं। रिश्‍ते घरों से निकलकर इंटरनेट में आ बैठे हैं। हालांकि भारत में स्थिति तो अभी भी बेहतर है, क्‍योंकि यहां अधिकांश लोग इंटरनेट की पहुंच से दूर ही हैं।

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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