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चंदन विष व्यापत नही, लिपटे रहत भुजंग

August 18th, 2010 | 5 Comments | Posted in खालीपीली

एक शक्की आदमी था, हर वक्त भ्रमित रहता, लटकती रस्सी को साँप समझकर हमेशा डरा रहता। उसी दुनिया में एक दूसरा आदमी भी था जो आज भी यही समझता था कि कोई अगर तुम्हारे एक गाल में थप्पड़ मारे तो उसके आगे दूसरा गाल कर दो।

मैंने आज के दिन दो अलग अलग अलग खबरें पढ़ी, वो आपको यहाँ बताता हूँ शायद इन्हें पढ़कर आप ऊपर बताये आदमियों के बारे में कुछ अनुमान लगा सकें।

काश्मीर में पंद्रह अगस्त के समारोह में अपनी गल्तियों की बदौलत सस्पेंडेड एक पुलिस वाले ने प्रदेश के मुख्यमंत्री के ऊपर जूता फेंका (दादागिरी) । बदले में मुख्यमंत्री ने कहा कि पत्थरबाजी से अच्छी है जूतेबाजी कम से कम इससे जानें तो नही जायेंगी। यही नही मुख्यमंत्री ने उस पुलिस वाले के ऊपर से जूते फेंकने का केस हटवाया, उससे बातें की, गले लगाया और वो रमजान परिवार के साथ बिता सके उसका इंतजाम किया (गाँधीगिरी) ।

देशों के द्वारा पाकिस्तान को दी जाने वाली डोनेशन लिस्ट में नंबर १ पर जो देश है उसे पाकिस्तान अपना सबसे बड़ा खतरा बताता आया है यानि भारतअब देखना ये है कि उपद्रवी और अलगाव वादियों ने उस जूते फेंकने वाले को सम्मानित करने का जो विचार किया है वो जूता फेंकने वाला उसे स्वीकार करता है या अस्वीकार यानि दादागिरी और गाँधीगिरी में कौन किस पर भारी पडता है।

पाकिस्तान में बाढ़ से हाल बेहाल हैं, लाखों लोगों घर से बेघर हो गये हैं, उन लोगों से शायद सभी को सहानुभूति होगी। प्राकृतिक विपदा की मार बढ़ी भारी होती है। अब अचानक पाकिस्तान को लगता है कि भारत उसका दुश्मन नंबर १ नही है (या रहा), पाकिस्तान के दुश्मन नंबर १ का खिताब घर के ही उपद्रवियों ने ले लिया। ये वो ही देश है जिसने भारत की ईंट से ईंट बजाने में कोई कसर नही छोडी, उसके लिये सारे साम दाम डंड भेद सभी का उपयोग किया लेकिन अचानक करवट बदल ली। कारण मुझे नही पता, जानने की इच्छा भी नही लेकिन एक दूसरी खबर पढ़कर कुछ कुछ समझ आता है।

पाकिस्तान को ऐसे संकट के समय बाहर से डोनेशन मिलनी मुश्किल हो रही है, यहाँ तक कि विकसित देशों की दी जाने वाली मदद भी कम पड़ रही है। देशों के द्वारा पाकिस्तान को दी जाने वाली डोनेशन लिस्ट में नंबर १ पर जो देश है उसे पाकिस्तान अपना सबसे बड़ा खतरा बताता आया है यानि भारत। और इसी देश से उसे कुछ और मदद की संभावना हो सकती है कहीं यही तो कारण नही है हमें दुश्मन नंबर १ के खिताब से बेदखल करने का।

इन दोनों ही घटनाओं में दादगिरी की बातों और हरकतों का बदला गाँधीगिरी से दी जाने की कोशिश की जा रही है, क्या ये नीति सफल होगी? मुझे उम्मीद तो नही लेकिन कह नही सकता।

और हाँ कुछ याद करने की कोशिश कर रहा था, याद नही आ रहा, क्या आप इसे पूरा करने या ठीक करने में मेरी मदद करेंगे।

चंदन विष व्यापत नही, लिपटे रहत भुजंग

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5 Responses to “चंदन विष व्यापत नही, लिपटे रहत भुजंग”

  1. प्रवीण पाण्डेय Says:

    किसी दिन यह पेड़ काट कर कोई ले जायेगा।

  2. सँपेरा शेखीबाज Says:

    नहीं दाज़्यू, ऎसा नहीं है..
    वृक्ष के रूप में चँदन भले बचा रहे..
    पर मुये इस भुजँग से चँदन पर बसेरा करने वाले पक्षियों कीट पतँगों की जान-माल महफ़ूज़ रह पायेगी, भला ?
    सर्प के कभी भी झपट पड़ने के अँदेशे से सभी जीव अनिश्चितता में जीते रहेंगे !

  3. राज भाटिया Says:

    कल मेरी बात इसी विषयको ले कर जर्मन लोगो से हो रही थी, कि पाकिस्तान मै बाढ के कारण लोग बहुत दुखि है, तब मैने एक दो जर्मनो से पूछा कि क्या आप लोगो को हमेशा की तरह से धन इकट्टा किया इन्हे देने के लिये? वेसे मैने ना दिया है ना दुंगा, बस आप लोगो से वेसे ही पूछ लिया, तो उन लोगो ने कहा कि दुख सिर्फ़ तुम्हे या हमे नही दुख तो पुरी दुनिया को है, लेकिन लोग चाह कर इन बेबस लोगो कि मदद नही कर रहे? क्योकि जब हम सब पेसा जमा कर के इन्हे भेजते है तो यह उस पेसे से बम्ब ओर लडाई का समान खरीद लेते है, ओर यह बेबस लोग युही भूखे मरते है, जेसे पिछली बार काशमीर मै भुकंप आने पर हुआ, आज भी उन लोगो को हमारी भेजी मदद नही मिली, सब पेसा यह नेता खाते है या लडाई का समान खरीद कर उलटा हमे ही मारते है, ओर यही सब से बडा कारण है कि लोगो का विशवास पाकिस्तान से ऊठ गया है, वरना दुनिया मै कही भी विपदा आये जर्मन लोग दिल खोल कर धन जमा करते है, ओर मदद करते है…. इसी लिये कहते है जेसा बोया वेसा ही मिलेगा

  4. अनूप शुक्ल Says:

    जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
    चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग।।
    http://hi.wikiquote.org/wiki/%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%AE

    उमर साहब पर जूता फ़ेंकने वाले पुलिस के सिपाही ने इस्तीफ़ा दे दिया। निलंबित व्यक्ति क्या इस्तीफ़ा दे सकता है जब तक उस पर लगा केस न निपट जाये।

    भारतीय उपमहाद्वीप अपने में ही लड़-भिड़कर परेशान होने के लिये अभिशप्त है।

  5. आशा जोगळेकर Says:

    भारत को इतनी गांधीगिरी करने पर क्या हासिल होगा, एक और आतंकी हमला ? क्या हमारे सारे बाड पीडितों की मदद हो गई । जिन दूसरे देशों से उसे तारीफ की आस है वे इस मदद में कहां हैं । और राज भाटिया जी की बात से और उन जर्मनों की बात से मैं सहमत हूँ कि जो भी पैसा मिलेगा सब आतंकवादियों की मदद के लिये जायेगा, लोग मरते हैं तो मरे ।

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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