पुस्तक चर्चाः बिखरे मोती – टूट गयी है माला मोती बिखर गये
कनाडा के एक कस्बे से पास के बड़े शहर को जाती ट्रेन में काला चश्मा लगाये, भरे गदराये जिस्म का एक आदमी बैचेनी से इधर उधर कुछ ढूँढ रहा था। अचानक उसकी नजर थोड़ा दूर पर बैठी मल्टी प्रोसेसिंग की जीती जागती मिसाल एक युवती पर पड़ी, जो गरदन एक तरफ झुका सिर और कंधे के बीच कान में फोन लगाये किसी से बतया रही थी, गोद में लैपटॉप रखा था जिस पर थोड़ी थोड़ी देर में उसकी अँगुलियाँ थिरक रही थी, साथ में एक छोटे से दर्पण में अपने थोपड़े को मैकअप से ढक लपेट कर चेहरा बनाने की जद्दोजहद में भी उलझी हुई थी। बीच बीच में झुक कर सीट के नीचे रखे स्टारबक्स (starbucks) के लंबे गिलास से कॉफी की छोटी छोटी चुस्की भी लगाती जा रही थी। उसको देखते ही चश्मा लगाये आदमी के चेहरे में एक कान से दूसरे कान को छूती मुस्कान की एक लकीर सी खींच गयी, हाथ में रखे फ्री में मिले अखबार में झुककर वो कुछ लिखने लगा।
अक्सर
दफ्तर आते जाते
ट्रेन में बैठे
फ्री बंटे उस अखबार के
खून से सने पन्नों में
खाली जगह तलाश
अपने असहज भावों को
सहजता से उतार देता हूँ
ये ऊपर कविता में कही चंद लाईनें मेरे लगाये तड़के (कथानक) की पुष्टी करने के लिये सबूत हैं। और ट्रेन में चश्मा लगाये बैठा वो आदमी कोई और नही अपनी उड़नतश्तरी यानि समीर भाई हैं। और आज मैं चर्चा कर रहा हूँ अपने निर्धारित समय से ५-६ महीने विलंब से महक रहे बिखरे मोतियों की जो मेरे किताबों की आलमारी में पिछले ५-६ महीनों से सहेज कर रखे हुए थे।।
इनकी लिखी कई कविताओं से अपनी माँ के प्रति झलकता समीर भाई का अगाध प्रेम छलकता है, बानगी देखिये -
वो मेरी चोट पर तेरा आँसू बहाना
मेरी बात सुन कर तेरा खिलखिलाना
मेरी शरारतों पर वो झिड़की लगाना
फिर प्यारी सी लोरी गा कर सुलाना
जब भी रातों में हवा कोई गीत गुनगुनाती है
माँ मुझको तेरी बहुत याद आती है**********
माँ तू जबसे दूजे जहाँ गई
ये घर बिन छत का लगता है**********
जब तक जिंदा रही बिचारी
दरवाजे पर राह निहारी
बेटा वापस आता होगा
इसी आस में उम्र गुजारी
माँ के प्रति ये प्रेम इतना मुखर है कि ‘दो भाई’ की बात करते करते समीर भाई माँ की बात करने लगते हैं – दो भाई, दोनों अलबेले / एक ही आँगन में वो खेले इसी कविता में चंद लाईनों के बाद सारी जगह माँ ले लेती है -
दोनों की वो सुध लेती है
उनके सुख से सुख लेती है
फिर देखा संदेशा आता
दोनों को वो साथ रूलाता
माँ इस जग को छोड़ चली है
एक कवि के लिये कल्पनाशीलता के साथ साथ, आसपास घटती घटनाओं पर गहरी नजर रखने (आब्ज़र्वैशन) का गुण भी होना चाहिये क्योंकि मेरा ये मानना है कि कल्पनाशीलता यानि ईमेजिनेशन अगर सीप है तो आब्ज़र्वैशन उस सीप के अंदर रखा मोती। मीर की गजल सा की अंत की कुछ पक्तियाँ -
अब वहाँ पेड़ की जगह मॉल बनेगा
और सड़क पार माई की कोठरी
अब सुलभ शौचालय कहलाती है
मेरा बचपन खत्म हुआ!!
कुछ बूढ़ा सा लग रहा हूँ मैं!!
मीर की गजल सा………..
यही नही, हर एक बात पर पारखी सी नजर रखते समीर भाई हल्की हल्की बातों में वजनदार बातें परोस जाते हैं। एक क्षणिका देखिये -
दिन भर आज सुना टीवी पर, भारत उदय कहानी को
डिस्को में जो रही थिरकती, उस मदमस्त जवानी को,
कितने लोग गिने हैं तुमने, कितना भारत छुट गया
तरस रही है कितनी जनता, बिजली को और पानी को।
उठा पटक के इस नाटक में, समीर भाई लिखते हैं – गांधारों के शकुनि सारे / दिल्ली में आकर के बैठे / इन्द्रप्रस्थ का सपना क्या था / हम बेचारे भूल गये। समीर भाई पिछले १-२ सालों में देश के कई चक्कर लगाते पाये गये और इसका कारण था – देश की यादों में
अँधेरे कमरे की
चाँदनी में नहाई
उस उदास खिड़की से
आसमान में
चमकीले तारों को देख
दूर देश की यादों में
न जाने कब
खो जाता है वो!
न जाने कब
सो जाता है वो!
उनकी लिखी अलग अलग गजलों में से कुछ चंद लाईनें, हल्के फुल्के शब्दों में छुपे वजनदार भावों को व्यक्त करने के बतौर बानगी पेश हैं -
नाम जिसका है खुदा, भगवान भी तो है वही
भेद करते हो भला क्यूँ, इस जरा से नाम से***
फैल कर के सो सकूं इतनी जगह मिलती नही
ठंड का बस नाम लेकर, मैं सिकुड़ता रह गया***
लगी है आग बस्ती में, झुलसती आज मानवता
दिये जो आँख में आँसू, उन्हीं से हम बुझाते हैं
इतना सब पढ़कर आप सोच रहे होंगे कि ट्रेन में मल्टी प्रोसिंसग की मिसाल किसी खुबसूरत रेलसफर (साथ साथ चलने वालों को अगर हमसफर कह सकते हैं तो ट्रेन में साथ साथ चलने वालों को रेल सफर कहना ज्यादा ठीक रहेगा) को देख लिखने वाले की कलम से कोई रोमांटिक बात नही। अपनी इस सोच को दरकिनार रख उनकी इस नजर पर अपनी नजर दो चार करिये -
कब से उधार बाकी है, इक तेरी नजर का
अब तक खुमार बाकी है, एक तेरी नजर कादम सीने में फंसा हुआ, कमबख्त न निकले
तिरछा सा वार बाकि है, इक तेरी नजर का
अपने आसपास चारों ओर हर रोज रेत की मानिंद बिखरते जाते घटनाक्रमों को सहजता से शब्दों में पिरो कर कनाडा में बैठ जो माला समीर भाई ने बुनी थी वो एक रोज भारत में जा कुछ पन्नों में उन्होंने बिखेर दी और नाम दिया – बिखरे मोती।
समीर भाई को शुभकामनाओं सहित इस चर्चा को उनकी ही लिखी इन लाईनों से खत्म करता हूँ -
बड़े नाजों से मैंने छंद हर कविता में ढाला है
कभी मदहोश करता है, कभी अमृत का प्याला है
मेरे गीतों की रागिनियाँ, जरा तुम डूब कर सुनना
समन्दर की पनाहों से, हर इक मोती निकाला है।


August 1st, 2010 at 11:34 pm
छह महीने लगाये लेकिन जब लिखा तब बहुत सुन्दर लिखा। बहुत सुन्दर।
August 2nd, 2010 at 1:05 am
बहुत सुन्दर रही आपकी यह प्रस्तुति….समीर जी कि इस कृति से परिचय भी हुआ ….समीर जी को बधाई और शुभकामनायें …आपको आभार
August 2nd, 2010 at 1:17 am
बिखरे नहीं अनमोल मोती…
जय हिंद…
August 2nd, 2010 at 6:15 am
आँखों पर कला चश्मा चढ़ाये वह वजनदार आदमी परसों से दिखा नहीं -क्या आप जानते हैं वह कहा हैं ?
August 2nd, 2010 at 9:17 am
इन बिखरे मोतियों को सहेज कर पढ़ना पड़ेगा।
August 2nd, 2010 at 10:27 am
post ki shuruaat me ‘एक कान से दूसरे कान को छूती मुस्कान’ aur aakhir me
‘बड़े नाजों से मैंने छंद हर कविता में ढाला है
कभी मदहोश करता है, कभी अमृत का प्याला है
मेरे गीतों की रागिनियाँ, जरा तुम डूब कर सुनना
समन्दर की पनाहों से, हर इक मोती निकाला है’
ye panktiya.. bhut sundar post. dhanyavaad.
August 2nd, 2010 at 11:09 am
जब झलक है इतनी मस्तानी तो कितबिया का आलम क्या होगा… जी क्या होगा
हमहूँ हर जगह से कॉपी-पेस्ट करके नोटपैड पर सहेज रहे हैं, कुछ और इकट्ठा हो जाये तो एक पी.डी.एफ फाइल बनावेंगे अउर उसे बगिया में ले जाकर बाँचेंगे ।
गुरु जी ने एम.पी. से बिखरे-मोती डाक द्वारा ठीक-ठाक पठाया होगा, यू.पी. में आकर गुमराह होगया.. और अब तो गुमशुदा है ।
इसको लेकर ज्यादा लिखा-पढ़ी हमहूँ नहीं किये.. सोचा कि चलो ठीक है, आखिर बिखरे मोती ठहरी.. जहाँ भी होगी त हिन्दिये का प्रचार-प्रसार कर रही होगी ।
बकिया बढ़िया समीक्षात्मक पोस्ट है ।
August 2nd, 2010 at 3:26 pm
इस सुंदर चर्चा के लिए बधाई।
…………..
स्टोनहेंज के रहस्यमय पत्थर।
क्या यह एक मुश्किल पहेली है?
August 2nd, 2010 at 11:45 pm
बिखरे मोती के पढ़ने का इंतजार है…
August 5th, 2010 at 9:40 am
हमने पढ़ी है…
पूरी की पूरी
August 5th, 2010 at 6:31 pm
पढ़ी तो मैंने भी है किन्तु आपकी चर्चा बहुत रोचक लगी।
घुघूती बासूती
August 7th, 2010 at 6:13 pm
आप सभी के स्नेह का बहुत आभार.
तरुण के द्वारा की गई बिखरे मोती की चर्चा ने किताब में चार चाँद लगा दिये, बहुत आभारी हूँ.
August 11th, 2010 at 11:24 pm
सुंदर चर्चा है। जल्दी ही पुस्तक लेकर बिखरे मोती समेटता हूँ।
August 19th, 2010 at 7:21 am
’बिखरे मोती’ पठा दी है समीर जी ने मेरे आँगन भी ! आती होगी !
आधी किताब तो हमने पढ़ ली है, उसकी चर्चाओं से ! उत्कंठित हूँ सम्पूर्ण के लिए !
सुन्दर चर्चा का आभार ।