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आह वाह से उठकर पढ‌़ने वालों को हो सकता है इस पोस्ट के टाईटिल में विरोधाभास नजर आये, इसलिये आगे कुछ कहने से पहले टाईटिल के फर्क को जान लें। बढ़ने और सिमटने में वो ही फर्क है जो किसी भी ग्राफ के x-Axis और y-Axis में यानि बढ़ना vertically होता है और सिमटना horizontally। और अगर ऐसे भी सिमटना समझ नही आया तो एक पुराने हिंदी गाने के बोल पर ध्यान दीजिये ‘सिमटी सी शरमायी सी किस दुनिया से तुम आयी हो’। सिमटना वैसे ही है जैसे कोई कछुआ खतरे को भाँप अपने को कर लेता है।

आज से लगभग ५ साल पहले जब हिंदी ब्लोग शुरू ही हुए थे तब भारत और भारत से बाहर रहकर हिंदी ब्लोग लिखने वालों का प्रतिशत लगभग बराबर था। शायद कोई १९-२० का फर्क होगा, लेकिन धीरे धीरे भारत से बाहर रहकर हिंदी ब्लोगिंग करने वालों का प्रतिशत कम होने लगा वहीं भारत में रहकर हिंदी ब्लोगिंग करने वालों का प्रतिशत बहुत ज्यादा बढ़ने लगा। भारत में रहकर हिंदी में लिखने वालों को अनिवासियों के मुकाबले हमेशा ही कुछ फायदे रहे हैं लेकिन इस पोस्ट का मकसद ये फायदा नुकसान देखना नही है।

सिमटने और बढ़ने को क्वालिटी और क्वाटिंटी के सन्दर्भ में भी समझा जा सकता है। अमूमन ऐसा देखा जाता है जब कोई उत्पाद क्वाटिंटी में बढ़ता है मेरी नजर में भाषा के विकास के लिये बेरी का झाड़ होना ताड़ का पेड़ होने से ज्यादा अच्छा है और यहीं हिंदी ब्लोगिंग मात खा सकती है। उसकी क्वालिटी घटती जाती है और उसी क्वालिटी को बरकरार रखने के लिये ज्यादा वक्त और नजर की जरूरत होती है। यही बात मुझे हिंदी ब्लोगिंग में भी दिखती है, पहले जहाँ किसी भी हिंदी पोस्ट को पढ़ना शर्तिया बढ़िया पोस्ट पढ़ना होता था वैसा अब नही है। अब उसी क्वालिटी के लेख पढ़ने के लिये ज्यादा वक्त देना होता है क्योंकि बढ़ती संख्या के संख्या बावजूद कटेंट की क्वालिटी उस हिसाब से नही बढ़ी।

किसी भी भाषा के विकास के लिये बहुत जरूरी होता है उसका साथ साथ बढ़ना और फैलना (सिमटने का बिल्कुल उल्टा)। मेरी नजर में भाषा के विकास के लिये बेरी का झाड़ होना ताड़ का पेड़ होने से ज्यादा अच्छा है और यहीं हिंदी ब्लोगिंग मात खा सकती है। अभी भी सबसे ज्यादा हिंदी पढ़ने वालों की संख्या भारत में ही निवास करती है और ऐसे में अगर कोई अनिवासी हिंदी के लिये कोई प्रयास करता है (मसलन हिंदी ब्लोग) तो भारत में रह रहे हिंदी ब्लोगरस के लिये ये ज्यादा जरूरी हो जाता है उस व्यक्ति का प्रोत्साहन करना। क्योंकि हिंदी ब्लोगिंग को सिमटने से रोकने के लिये जरूरी है भारत से बाहर हिंदी ब्लोगरस का बढ़ना।

ब्लोगिंग का जो दूसरा मजबूत पक्ष होता है वो है पोस्ट के द्वारा परस्पर संवादों का शुरू होना। ब्लोगिंग के इस पक्ष पर भी हिंदी ब्लोगिंग को अभी बहुत लंबा सफर तय करना है। अमूमन मेरे यही देखने में आया है कि ये संवाद अक्सर आह वाह से ऊपर नही उठ पाते। और जहाँ संवाद शुरू होते भी हैं वहाँ या तो छींटाकसी ज्यादा होती है या खींचातानी। ऐसा बहुत कम होता है जब कोई संपूर्ण पोस्ट नजर आये यानि अच्छा लेखन और उतना ही अच्छा पाठकों का परस्पर संवाद, यहाँ अच्छा होने से बीइंग नाइस टाईप अर्थ नही वरन सार्थक वाद-विवाद से है।

ऐसा नही है कि अंग्रेजी भाषा के ब्लोगस में ये सब देखने में नही आता लेकिन वहाँ इस तरह के ब्लोग और उनका लेखन ना ज्यादा उभर पाता है और ना ही मीडिया या पाठकों के बीच कोई खास जगह बना पाता है। दूसरा खुद हिंदी भाषी होने के नाते मुझे ये बेहतर लगता है बजाय किसी अन्य भाषा के ब्लोगस से तुलना करके आगे बढ़ने के हम खुद अपने मानक तय करें और आगे बढ़े। जब तक हिदी ब्लोगिंग में ये नही हो पाता तब तक शायद यही कहना ठीक रहेगा - सिमटते हिंदी ब्लोग का बढ़ना जारी है

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