चलते-चलते लड़खड़ा गयी दिल्ली - Six
शुक्रवार के दिन पहले IPL 2009 का सेमी फाईनल मुकाबला देखा जिसमें दिल्ली की दिलेरी को लड़खड़ाते देखा और फिर उसके बाद अगले दिन दिल्ली -६ का वो ही हस्र होते देखा। शनिवार के दिन एक फिल्म हमको देखनी पड़ी, दूसरी हमने देखी। जो देखनी पड़ी उसका नाम था Night at the Museum: Battle of the Smithsonian जो कि अभी शुक्रवार को रीलिज हुई थी। सिनेमा हाल में बच्चों की संख्या बढ़ों (Adults) की संख्या से ज्यादा थी अब आप समझ ही गये होंगे हमने देखनी पड़ी शब्द का क्यों इस्तेमाल किया।
दूसरी फिल्म फिर घर आकर देखी जिसे रीलिज हुए ना जाने कितने शुक्रवार बीत चुके हैं यानि दिल्ली ६। कमाल की बात तो ये लगी कि IPL की दिल्ली की टीम और इस फिल्म में काफी समानता लगी। दोनों ही अंत में धराशायी हो गयी, जैसे दिल्ली की टीम के कुछ अच्छे पल आये थे जब वो जबरदस्त तरीके से जीते थे वैसे ही कुछ क्षण फिल्म में भी थे।
फिल्म और अच्छी हो सकती थी अगर उसे थोड़ा ज्यादा ईमानदारी से बनाया होता लेकिन फिल्मकारों की भारत की बेहिसाब तरीके से बढ़ती सारी आबादी को खुश करने की कोशिश ऐसे ना जाने कितनी फिल्मों का पहले ही सत्यानाश कर चुकी है। कुछ सीनों में वास्तविकता थी जैसे सड़क में लावारिस सी घूमती गाय का बछड़े देने वाला सीन और काला बंदर को लेकर टीवी की कवरेज और लोगों की बातें। वहीं फिल्म के शुरूआत में पड़ोसियों का प्यार बिल्कुल ही काल्पनिक सा लग रहा था।
यही नही मुझे ये भी समझ नही आता कि ये हिंदी फिल्म वाले अमेरिका में रह रहे भारतीयों को हमेशा ही ऐसा क्यों दिखाते हैं जैसे वो अमेरिका में रहकर बिल्कुल खुश नही हैं और फिल्मों में हर कोई जो अमेरिका से भारत आता है उसे ऐसे बताया जाता है जैसे कि भारत के अलावा कहीं और लोग प्यार और सौहार्दय से रहते ही नही हैं। जबकि वास्तविकता ऐसी बिल्कुल भी नही है। (आज अभी ही खबर पढ़ी-आस्ट्रिया में एक सिक्ख गुरू को किसी सिक्ख ने ही शायद गोली मारी और दंगे भारत में होने लगे, ट्रेन वहाँ जलायी गयी।)
साथ ही साथ अंत में जब प्यार और सौहार्दय की नदी बहाने वाले पड़ोसी एक बाबा की एक बात में बगैर कुछ सोचे समझे जब धार्मिक दंगा करने लगे वो भी हजम नही हुआ। फिल्म का अंत शायद और असरदार होता जब फिल्म के नायक अभिषेक बच्चन को उन्मादिता से पीटती हिंदू और मुसलमानों की भीड़ के हाथों मार दिया जाता। भारत में भीड़ के हाथों जान गँवाने की ऐसी ना जाने कितनी ही घटनायें घटती रहती हैं।
खैर, फिल्म में कोई कोई सीन अच्छा बन पड़ा था, फिल्म के अंत यानि क्लाइमेक्स ने ही शायद फिल्म के पीटने में मुख्य भूमिका निभायी हो। फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष था उसका गीत और संगीत जिसके बारे में मैं पहले ही बहुत कुछ लिख चुका हूँ।
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This post has 9 comments
May 26th, 2009
फ़िल्म देखी ही नहीं । क्या कह सकते हैं?
May 26th, 2009
बहुत सही कहा.. मैं भी आज सुबह ये ही सोच रहा था.. आस्ट्रिया में कुछ हुआ और दंगे भारत में श्रीलंका में कुछ हो तो दंगे भारत में.. और गाली अमेरिका को..
May 26th, 2009
भाई हम तो फ़िल्म देखने का समय ही नही निकाल पाते. आपकी समीक्षा पढ कर ही खुश हो लेते हैं.
May 26th, 2009
अंग्रेजी फिल्मों का हिंदी नाम बड़ा मजेदार होता है. पहली नाईट ऐट म्यूजियम जब २००६ में आई थी तब इसका हिंदी पोस्टर भुलाए नहीं भूलता. नाम था ‘म्यूजियम के अन्दर फंस गया सिकंदर’.
आज यूँही आपकी पोस्ट पढ़कर फिर याद आया. बाकी तो आपने सच कहा ही है.
May 26th, 2009
भारतीया प्यार की बात अच्छी ओर सच्ची कही आप ने, बाकी फ़िल्म देख कर अपना समय खराब क्यो करे? जब कि हमारी फ़िल्मे ९९% बकवास होती है, जिन का वास्तविकता से कोई नाता नही होता,
May 26th, 2009
अच्छी समीक्षा की है. जब मैं यह फिल्म देख कर निकला तो मैने भी चंद लाईना लिख डाली थी इस पर.
May 28th, 2009
बैठक से होकर गुजरा था…वहां कोई ना था….कोई होता वहां तो अच्छा होता…..हमारे आने पर भी आपका पहरा था…..पहरा ना होता तो अच्छा होता…..वैसे आपने अच्छा तो वाकई लिखा है….ना भी लिखा होता तो अच्छा होता……??
May 29th, 2009
एक बार फ़िर से देख लेना भाई। दिल्ली ठीक हो जायेगी।
May 30th, 2009
good
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