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अभी पिछली पोस्ट जल्दी-जल्दी में मैंने जूतम-बजारी पर लिखी थी और कल ही पराशर गौड़ जी ने अपनी खुद की लिखी ये कविता मेल से भेजी, जिसमें जूते और चप्पलों की बहसबाजी है इस बात की कि कौन बड़ा?

जूते चप्पलो में
हो गई बहस
छिड गई लड़ाई
लगे करने दोनों
अपनी अपनी बड़ाई!

चप्पलें बोली ……..
यदपि, देखने में हम
कोमल, नाजुक, कमजोर है
ध्यान रहे
हमारे किस्से जगत मशहूर हैं!

आम आदमी से लेकर
मंत्री संत्री, नेता हमें
अपने साथ रखने पर
मजबूर हैं!

नेता जी … नेताजी तो, .. हमें
बड़े प्यार से दुलारते हैं, पुचकारते हैं
और बड़े सम्मान के साथ
हमें पार्लियामेंट तक ले जाते हैं
ऐसा नहीं ……..
हम भी आड़े वक़्त उनके काम आते है!

टेलीविजन, अखबारों में
आये दिन हमारी तस्वीरें छपती है
जब जब हम
पार्लियामेन्ट में एक दूसरे पर बरसती हैं!

वे जूते से बोलीं ..
है तुम्हारा, ऐसा कोई किस्सा?
जो, संसद में लिया हो तुमने
कभी हिस्सा!

जूत्ता बोला …
बस … तुम में यही तो कमी है
बात को पेट में पचा नहीं पाती हो
यूँ ही खामाखाँ ,,,
चपड़ चपड़ करती रहती हो।

सुनो
चाहे हम रबड़ के हों
या हों, चाँद के
सारे मुरीद है हमारे
यहाँ से वहाँ तक के।

जब जब मै चलता हूँ
या चलूँगा …..
अच्छे अच्छों के मुँह
बंद हो जायेगें
इसीलिए तो सब कहते है
यार, चांदी का मारो तो
सब काम हो जायेगे।

पटवारी से लेकर
व्यापारी तक,
सिपाही से लेकर
मंत्री तक
सब हमारे कर्ज़दार है
तभी तो, लोग कहते है
जूता … बड़ा दमदार है
रही हिस्से किस्से की बात
तमाशा देखना, और देखोगे
आज के बाद संसद में
तुम नहीं, हम ही हम चलेगे !

ये किस्सा
अपने देश में तो देखोगे ही
संसार में भी नाम कमाऊँगा
देख लेना
दुनिया के अखबारों के
फ्रंट पेज पर अपनी तस्स्वीर छपाऊँगा।

देखा नहीं, इराक में क्या हुआ
बुश पर कौन चला? …. मै
चिदम्बर, अडवानी और अब
मनमोहन पर भी कौन चला? मैं

- पराशर गौड़, कनाडा

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