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एक ईराकी पत्रकार ने जूता क्या फेंका भारत में जूते यूँ फेंके जाने लगे जैसे कुछ समय पहले डाक्टरों (अस्पताल या मेडिकल स्कूलों) की हड़ताल हुआ करती थी। अगर ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन ऐसा आयेगा जब पब्लिक चाहे लंच बॉक्स रखना भूल जाये लेकिन बैग में एक जोड़ी जूता रखना नही भूलेगी। क्या पता कहाँ किस पर फेंकना पड़े और कभी अपने पर पड़ गया तो कहाँ लगा देखने से पहले जूता उठा बैग में डालेगी कल काम जो आ सकता है। जैसे नोट सर्कुलेट होकर आते जाते रहते हैं वैसे ही जूते आने जाने लगे।

गली मोहल्लों में बच्चों को कराटे की ट्रेनिंग देनी के बजाय जूते सटीकता से फेंकने और उनसे बचने के तरीके सिखाये जायेंगे। ये भी हो सकता है भारत में लोकप्रियता में इसका नंबर क्रिकेट के बाद या उससे पहले आ जाये।

जिन लोगों पर जूते पड़े हों पार्टियों में उनका रूतबा बड़ जायेगा, शर्मा जी की श्रीमती जब शान से अपने पति पर फेंके गये जूते का बखान करेगी तब हो सके वर्मा जी की श्रीमती उन्हें टोक कहने लगे, “अरे तुम्हारे पति पर तो सिर्फ देसी जूता पड़ा था और वो भी किसी देहाती ने फेंका था, मेरे पति पर तो ईंपोर्टेड जूता फेंका गया था वो भी किसी ऐरे गेरे ने नही बल्कि किसी इंजीनियर ने फेंका था। और वो इंजीनियर पहले प्रधानमंत्री पर भी जूता फेंक चूका है“।

ट्रकों के पीछे लिखी जाने वाली लाईनों में भी फेर बदल देखने को मिलने लगेगा मसलन “वक्त से पहले और किस्मत से ज्यादा जूते किसी को नही मिलते” या फिर “अच्छी किस्मत वाले तूझे फेंके जाने वाला जूता काला“। यही नही जूतों की दूकानों में, ऐसे फेंके जाने वाले जूते अलग से मिलने लगेंगे, इन्हें बनाने वाली कंपनियाँ हो सकता है इनके अलग से विज्ञापन निकालने लगे, एक बानगी देखिये - “सटीकता और स्पीड में बेजोड़ नेताओं में फेंके जाने में अव्वल” या “हमारे जूते की सोल में लगी है विशेष ईंपोर्टेड कंप्यूटर चिप जो टार्गेट की स्थिति भाँप कर सीधे उसी पर लगती है, फेंककर निशाने में लगने की गारंटी, उपयोग में इतनी आसान कि ईमरजेंसी में बच्चे भी फेंक सकते हैं“।

सामान्य ज्ञान की परीक्षा में हो सकता है इससे संबन्धित सवाल भी पूछे जाने लगे, “एक दूसरे पर विश्व में सबसे ज्यादा जूते किस देश में फेंके जाते हैं” या फिर “निम्नलिखित में से किस भारतीय नेता के ऊपर अभी तक जूता नही फेंका गया है” वगैरह वगैरह।

अगर इन बातों में से आधा भी हो गया तो सबसे बड़ा नुकसान होगा न्यूज मीडिया वालों को क्योंकि ऐसा होने से इस खबर में मसाला कम हो जायेगा, टीआरपी देने में इस खबर का महत्व कम हो जायेगा और मीडिया वाले समाचारों में इस खबर को डम्प कर देंगे क्योंकि तब तक वो आम जनजीवन का हिस्सा जो बन चुकी होगी

[आज लिखने का तो कोई प्लान नही था लेकिन इस खबर को पढ़ कर नही रहा गया, अक्सर इस तरह की खबरें पढ़ने में आने लगी हैं।]

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