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ख्वाब की दस्तक ने खोले बंद यादों के किवाड़ – 1

March 27th, 2009 | 16 Comments | Posted in old days of childhood

एक रोज काम के बोझ से थका ट्रेन में आंखें मूँदे बैठ वापस लौट रहा था तब अचानक मुझे सुनायी दिया, “ताना ना न न ना, ताना ना न न ना”। ऐसा लगा जैसे किसी ने घंटी बजायी हो उठा किवाड़ खोले, सामने कोई नही था। इधर उधर झाँक कर देखा एक बच्ची खिलखिलाकर हँस रही थी। मैं मुस्कुराया ही था कि सामने टिकिट कलेक्टर की जैसी आवाज सुनायी दी। मेरी आँखे खुल गयी ख्वाब था शायद लेकिन उसकी दस्तक ने मेरी यादों के बंद किवाड़ खोल दिये और मैं ट्रेन पास दिखा पहुँच गया स्कूली दिनों में। जब कभी ना खत्म होने वाले अनगिनत सीरियल नही हुआ करते थे, ना ही राजनीतिक पार्टियों जितने सैटेलाईट चैनल हुआ करते थे, ना ही झकाझक गहनों में लदी, एक दूसरे की ऐसी तेसी करने में जुटी सास-बहुओं की भरमार होती थी। तब जब मैं छोटा था, तब जब दूरदर्शन हुआ करता था, तब जब शायद टीवी सीरियलस हुआ करते थे

इतना पढ़कर भी अगर आपको कुछ याद नही आया तो ये सुनिये शायद आपको भी कोई दस्तक सुनायी देने लगे।

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इस और अगली कुछ पोस्टों में, मैं यादों की गलियों में जाकर क्लासिक दूरदर्शन के वक्त के कुछ सीरियलस याद करने की कोशिश करता हूँ, वो सीरियलस जो वक्त से समाप्त हुआ करते थे। क्यों ना आप भी इस सफर के हमसफर बन जाईये – क्या पता एक पुराना मौसम फिर से लौटे

शुरूआत कहाँ से करें, क्यों ना उसी से जिसका टाईटिल ट्रेक अभी अभी सुना। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ – मालगुड़ी डेज की। याद आया वो भोला भाला मासूम नटखट बच्चा, स्वामी। आर के नारायण की कहानियों पर आधारित सीरियल, उन कहानियों में, उस कहानी के पात्रों में , उनकी बातों में कितनी सरलता और सादगी थी। आज भी देखने में उतना ही आनंद आता है जितना बचपने में आता था।

दूसरा एक बहुत ही अच्छा सीरियल था, कहाँ गये वो लोग। आजादी के दीवानों पर बना वो सीरियल बहुत ही बेहतरीन था। ज्यादा कुछ तो याद नही शायद रविवार को आता था। उस सीरियल का टाईटिल ट्रेक भी बहुत भावुकता भरा था।

और आता था मोरल स्टोरी पर बना सीरियल, दादा दादी की कहानियाँ। जिसमें अशोक कुमार तो दादा बने थे और शायद दीना पाठक दादी। इसमें लिलीपुट भी अक्सर कई कहानियों (एपिसोड) में दिखायी देते थे। क्या खूब था वो सीरियल भी।

दादा दादी की कहानी की बात करता हूँ तो याद आती है वो धुन, विक्रम विक्रम बेताल बेताल, विक्रम और बेताल। सही पहचाना मैं बात कर रहा हूँ, विक्रम और बेताल सीरियल की जो रविवार की फिल्म शुरू होने से ठीक पहले आता था जिसमें हर रोज नई कहानी आती थी। बेताल कहानी सुनाता और अंत में राजा से सवाल पूछता था। अरूण गोविल बने थे राजा विक्रम और सज्जन बने थे बेताल। अरे वही बेताल जो कहानी के आखिर में कहता था, “तू बता मैं चला“।

राजा विक्रम की बात करी तो एक और सीरियल याद आता है, सिंहासन बत्तीसी। शायद बत्तीस कहानियाँ थी उसमें और हर कहानी का संबन्ध राजा के सिंहासन में मौजूद मूर्तियों से था, जो राजा को सिंहासन में बैठने से रोकने के लिये कहानी सुनाती थी।

कहानियों पर ही आधारित दो और सीरियल आते थे, जो बड़े लोगों के मतलब के ज्यादा होते थे। एक कहानी और कथा सागर (एक कहानी और दर्पण, ऐसा ही कुछ था)। एक कहानी में तो रेगुलर कहानियाँ आती थीं लेकिन कथा सागर में किसी एक लेखक के बारे में बताकर उसकी कहानी आती थी। कहानी का सलेक्शन अच्छा रहता था और उसे अच्छे से फिल्माया भी होता था।

आजकल फिल्मी कलाकारों को एकस्पोजर देने के लिये अनगिनत प्रोग्राम आते हैं लेकिन तब एक ही होता था, फूल खिले हैं गुलशन गुलशन। तब्बसुम उस प्रोग्राम की एंकर थी और गाहे बेगाहे शायरी भी सुनाया करती थी, यही कोई आधे घंटे का प्रोग्राम होता था, सीधा साधा सेट होता था लेकिन आज के ग्लैमरस प्रोग्राम से ज्यादा आनंद आता था।

बातें तो अभी शुरु हुई हैं, अभी और भी बहुत सीरियल हैं जिनकी बातें करनी है। उनका जिक्र अगली पोस्ट में करूँगा लेकिन अगर आपको इस पोस्ट में बताये सीरियलस का कुछ याद आता है तो क्या हम सबके साथ अपनी यादें बाटँना चाहेंगे? जल्दी से टिप्पणी देकर साझा कीजिये ना यादों को।

अगली पोस्ट में जारी….

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16 Responses to “ख्वाब की दस्तक ने खोले बंद यादों के किवाड़ – 1”

  1. Dr.Arvind Mishra Says:

    आह खूब -स्मृतियों के वातायन में ले गए आप ! मालगुडी डेज !

  2. अनूप शुक्ल Says:

    यादों की बारात निकली है सज के
    सुन्दर यादें।

  3. दिनेशराय द्विवेदी Says:

    जारी रखिए जी बारात को, अच्छा लग रहा है। मालगुड़ी डेज और कुछ अन्य के वीडियो भी यू-ट्यूब पर उपलब्ध हैं।

  4. manvinder bhimbder Says:

    malduddie ka swaami ….waah kya baat hai

  5. अशोक पाण्‍डेय Says:

    मधुर संगीत सुनते हुए स्‍मृतियों की डगर से गुजरना बहुत अच्‍छा लगा। लेकिन यह संगीत मैं खंड खंड में ही सुन सका। मेरे लैपटाप पर ब्‍लॉग के गीत ऐसे ही हांफ हांफ कर बजते हैं। इसका क्‍या कारण हो सकता है..मुझे किसी साफ्टवेयर की जरूरत है या ऐसा नेट की स्‍पीड कम होने की वजह से होता है ??

  6. ताऊ रामपुरिया Says:

    बहुत बढिया यादों की बारात है. बहुत धन्यवाद याद दिलाने के लिये.

    रामराम.

  7. mamta Says:

    अरे इतनी सारी बातें है की बस लिखना शुरू होगा तो ख़त्म ही नही होगा ।

    अरे आप हम लोग और buniyaad और ये जो है जिंदगी को कैसे भूल गए । :)

  8. anitakumar Says:

    मालगुडी डेज्स तो मेरा भी पसंदीदा प्रोग्राम हुआ करता था। एक और सिरियल चला था खूब लंबा॥वो था हम लोग– भारत पाक बंटवारे पर आधारित एक परिवार की कहानी। बसेसर राम का घिनोना करेक्टर, छुटकी और न जाने क्या क्या।

  9. amit Says:

    मालगुडी डेज़ तथा विक्रम और वेताल तो अपने को याद है, ये अपन भी देखे हैं। मालगुडी डेज़ अपने को कोई खास पसंद नहीं था, बोरिंग लगता था इसलिए सारे एपिसोड नहीं देखे, कुछ एपिसोड देखने के बाद इसको देखना बंद कर दिया था। विक्रम और वेताल अपने को बहुत पसंद था, बढ़िया धारावाहिक था, यह शृंखला तो बरसों से चंदामामा पत्रिका में भी छपती आ रही है, आज भी आती है! :)

  10. parul Says:

    :) )

  11. dr.anurag Says:

    मनोहर श्याम जोशी लिखित हम लोग जिसमे अशोक कुमार चश्मे पहनकर खास अंदाज में बोलते थे “देखेगे हम लोग “..बाद के दिनों में करम चाँद ओर पहला हास्य सेरियल जिसके लेखक भी शरद जोशी थे वो था “ये जो है जिंदगी ‘…. दो सीरियल ने मुझे खासा प्रभावित किया था एक था “उडान “सर्फ़ वाली कविता चौधरी का .दूसरा “कब तक पुकारू “जिसमे शायद हबीब तंवर ने खुद अभिनय किया था ….सबसे बड़ी बात एक प्रोग्राम था जिससे हम बड़े बोर होते थे वो था क्रषि दर्शन …

  12. Dr. Manoj Mishra Says:

    बहुत सारे सीरियल थे लेकिन यादों में कुछ एक ही थे ,मुझे याद है की जब रामानंद सागर का रामायण शुरू हुआ था तो उस दौर में पूरा शहर सूना दीखता था लगता था कि जैसे यहाँ कोई रहता ही नहीं है .

  13. mahen Says:

    क्या संजोग है भाई… आजकल बैठा मालगुडी डेज़ ही देख रहा हूँ और सोचता रहा हूँ कि अगर शंकर नाग की एक्सीडेंट में १९९० में मृत्यु नहीं हुई होती तो शर्तिया हमारे पास और भी बेहतरीन टी वी सीरियल्स और शायद फिल्में भी होतीं.
    हमने तो अपने बेटे का घर पर नाम स्वामी ही रखा हुआ है.

  14. राज भाटिया Says:

    बहुत ही सुंदर लगी यादो की बरात, चलिये हम भी साथ हो लिये.
    धन्यवाद

  15. समीर लाल Says:

    टेस्ट

  16. गौतम राजरिशी Says:

    …एक दो जो अपनी पसंदिदा फ़ेहरिश्त में थे “नींव” , “फिर वही तलाश” और “खोज” जिसमें किट्टु गिडवानी अपने चरमोत्कर्ष पर थीं…

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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