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ख्वाब की दस्तक ने खोले बंद यादों के किवाड़ – 2

March 30th, 2009 | 12 Comments | Posted in old days of childhood

स्कूल के दिनों में दूरदर्शन के बेहतरीन टीवी सीरियलस को याद करते हुए मैने कुछ सीरियलस पिछली बार बताये थे, आज उसी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए कुछ और सीरियलस को याद करते हैं।

शरद जोशी का लिखा हुआ एक बहुत ही सरल और सरस कामेडी सीरियस आता था, “ये जो है जिंदगी“। इस सीरियल के मुख्य किरदारों में, पति पत्नी के रूप में थे, शफी ईमांदार (या ईमांदार) और स्वरूप संपत, राकेश बेदी था स्वरूप संपत का भाई और हर एपिसोड में छोटे-छोटे अलग अलग किरदार में आते थे सतीश शाह। आधे घंटे का फूलटू मस्ती का सीरियल था ये। इसके टाईटिल गीत को गाया था किशोर दा ने।

उसके बाद जो दूसरा कॉमेडी सीरियल बहुत लोकप्रिय हुआ था वो था आनंद महेन्द्रु का “देख भाई देख“। ११ सदस्यों के सयुंक्त परिवार की कहानी थी देख भाई देख, ६ से लेकर ६५ साल तक की उम्र के सभी सदस्य थे। इसमें जबरदस्त अभिनय करने वालों में मुख्य कलाकार थे, शेखर सुमन, भावना बलसावर, फरीदा जलाल, नवीन निश्चल और लिलीपुट अलग-अलग एपिसोड में कभी कुछ कभी कुछ बनकर आते थे। देख भाई देख के डायलॉग भी लिलीपुट ने लिखे थे, इस का टाईटिल गीत गाया था उदित नारायण ने।

अगर इन दोनों सीरियल के बारे में याद करने में थोड़ा परेशानी हो रही है तो ये दो क्लिप सुनिये शायद सुनकर सब याद आ जाये -

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इनके अलावा भी कई अन्य हल्के फुल्के सीरियलस आते थे, जिनमें आनंद महेन्द्रु का ही था “इधर-उधर“। मुख्य किरदारों में थे, सुप्रिया पाठक, रत्ना पाठक और शायद दीना पाठक। हल्का फुल्का मनोरंजन वाला सीरियल था, कहानी तो अब याद नही।

एक और मजेदार कामेडी थी, “श्रीमान-श्रीमती“। जिसमें मुख्य कलाकार थे जतिन कंकिया (शायद यही नाम था), रीमा लागू, राकेश बेदी और अर्चना पूरन सिंह। अर्चना पूरन सिंह फिल्म अभिनेत्री थी और जतिन उनके पड़ोसी और एक-दूसरे के यहाँ तांकाझांकी और टांग खिंचाई से हास्य उत्पन्न होता था। इसी में था ना वो दिलरूबा अंकल।

जसपाल भट्टी के दो मजेदार व्यंग्य और हास्य से भरपूर सीरियल भी थे, “उल्टा-पुल्टा” और “फ्लॉप शो“। दोनों ही मजेदार थे जिसमें किसी ना किसी की खिंचाई होती थी लेकिन शायद उल्टा-पुल्टा ज्यादा सराह गया था। फ्लॉप शो में उनकी पत्नी ने ही सीरियल में भी उनकी पत्नी का किरदार निभाया था।

इसी में एक ओमपुरी का सीरियल भी आता था, “कक्का या काका जी कहिन“। इसके बारे में ज्यादा तो कुछ याद नही लेकिन ये भी हास्य सीरियल था।

रघुवीर यादव का हास्य सीरियल था, “मुंगेरी लाल के हसीन सपने“। जिसमें वो दिवास्वप्न देखता रहता था, उसके सपने आंख फड़फड़ाने से शुरू होते थे।

एक और सीरियल था, जो पूरी तरह से तो कॉमेडी नही था लेकिन मिडिल क्लास की दिन प्रतिदिन की समस्याओं पर बेस्ड सीरियल था। नाम था “वागले की दुनिया“, अंजन श्रीवास्तव और भारती अचरेकर मुख्य किरदार के रूप में थे। उस समय के बेस्ट सीरियलस में से एक।

हल्की फुल्की कामेडी की बात हो और अमोल पालेकर का जिक्र ना आये ऐसा भला हो सकता है। अमोल पालेकर और भारती अचरेकर अभिनीत सीरियल “आ बैल मुझे मार” भी बड़ा मजेदार था। जैसा कि नाम से ही लग रहा है, इसमें कहानी का नायक खुद ही अपने लिये समस्या खड़ी करता था।

अजीज मिर्जा और कुंदन शाह का एक मजेदार और शायद सबसे ज्यादा हिट धारावाहिकों में से एक था, “नुक्कड़“। जिसमें गुरू, टीचर जी, घनसू भिखारी, तांबी, गनपत हवलदार, कादर भाई और हरि जैसे किरदार काफी प्रसिद्ध हुए थे। इसका टाईटिल गीत कुछ यूँ था, “बड़े शहर की गली गली में बसा हुआ है नुक्कड़”। ये प्योर कॉमेडी तो नही था लेकिन हल्का फुल्की घटनाओं पर आधारित एक मनोरंजक धारावाहिक था। एक बार समाप्त हो जाने के बाद इसे दोबारा “नया नुक्कड़” के नाम से शुरू किया लेकिन वो उतना चला नही।

हल्के फुल्के हास्य धारावाहिकों में एक अंतिम सीरियल जो मुझे याद आ रहा है वो था, “वाह जनाब” (शायद यही नाम था)। इसमें शेखर सुमन और दो अन्य मुख्य किरदार थे, एक तो महिला पात्र था और दूसरा शेखर सुमन का कोई दोस्त था। इस सीरियल के किस्से कहानी लखनऊ शहर में घटते दिखाये गये थे। ये सीरियल मुझे कोई खास पसंद नही था और अपनी समझ से भी परे था।

ये तो थे हास्य से जुड़े कुछ पुराने धारावाहिक, अभी और भी बहुत सीरियल हैं जिनकी बातें करनी है। उनका जिक्र अगली पोस्ट में करूँगा लेकिन अगर आपको इस पोस्ट में बताये सीरियलस का कुछ याद आता है तो क्या हम सबके साथ अपनी यादें बाटँना चाहेंगे? टिप्पणी देकर साझा कीजिये अपनी यादों को।

अगली पोस्ट में जारी….

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12 Responses to “ख्वाब की दस्तक ने खोले बंद यादों के किवाड़ – 2”

  1. कुश Says:

    वाह क्या पोस्ट है.. पुराने दीनो की ओर ले गयी.. मुझे तो देख भाई देख और वागले की दुनिया बहुत पसंद थे.. देख भाई देख तो हम सभी परिवार के साथ बैठकर देखते थे.. बाद में सोनी पर इसके रिपीट एपिसोड्स भी आए थे.. मैं उन्हे भी नही छोड़ता था.. इस सीरियल के कई एपीसोड लंदन में भी शूट हुए थे.. जो उस समय में एक बड़ी उपलब्धि थी..

  2. dr.anurag Says:

    एक ओर याद आता है….यार फटीचर तू इतना इमोशनल क्यों है ???

  3. ताऊ रामपुरिया Says:

    बहुत धन्यवाद, पुराने दिनों की और लौटा लाने के लिये.

    रामराम.

  4. rajeev jain Says:

    bahut shukriya

  5. mamta Says:

    आपने भी क्या खूब सीरियल की याद दिलाई है । सभी सीरियल एक से बढ़कर एक थे ।

  6. ranju Says:

    सभी अच्छे थे यह सीरयल देख भाई देख बहुत ही पसंद था मुझे भी

  7. संगीता पुरी Says:

    बहुत सुंदर पोस्‍ट … पुरानी यादें ताजा हो गयी।

  8. अनूप शुक्ल Says:

    नास्टेलजिया गये!

  9. Lovely Says:

    हर तरफ लोग पुरानी स्मृतियों में बहने लगे हैं… क्या यह मान लिया जाय की नया कुछ अच्छा बचा ही नही. कुछ समय पहले दूरदर्शन में पुँरानी कालजयी रचनाओं की प्रस्तुति शुरू की गई थी ..जो शायद अब बंद कर दी गई है. मुझे नुक्कड़ और देख भाई देख बहुत पसंद थे.

  10. amit Says:

    देख भाई देख, जसपाल भट्टी के शो और मुँगेरी लाल के हसीन सपने अपने को भी बहुत पसंद थे। वागले की दुनिया, नुक्कड़ और श्रीमान श्रीमती अपने को कोई खासे पसंद नहीं थे इसलिए अधिक नहीं देखे तथा बाकी सीरियलों की कोई जानकारी नहीं! :)

  11. mahen Says:

    वह जो दौर था अब तो कल्ट ही लगता है. अनगिनत धारावाहिक थे, जिन्हें पाने की लालसा हमेशा रहती है पर अभी तक सिर्फ चाणक्य और मालगुडी डेज़ का ही जुगाड़ हो पाया है. भारत एक खोज तो प्रसार भारती वाले बीस हज़ार तक में बेच रहे हैं.

  12. maya bhatt Says:

    hindi mai kaise likhu,pata nahi,abhi abhi juri ho aap ke saath

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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