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अभी रविवार के दिन यहाँ प्रिंसटन में एक कवि सम्मेलन था जिसका आयोजन अनूप भार्गव जी ने किया था, हमें भी न्यौता मिला तो हम भी जा पहुँचे। इससे पहले कि कुछ गलतफहमी हो जाये मैं बताता दूँ हम छोटे से स्टेज में नही बड़ी सी दर्शक दीर्घा में बैठने के लिये गये थे। हालांकि हमने भी कविता में अपने हाथ आजमाये हैं लेकिन कविता को लेकर अपनी समझ उतनी ही है जितनी आजकल डाउजोंस में सिटी बैंक के स्टॉक की वैल्यू (एक डॉलर और ५०-६० सैंट)। और ये इसलिये बता रहे हैं क्योंकि हम अपना पहला अनुभव बयाँ कर रहे हैं और इसमें समझ समझ का फेर हो सकता है।

इस कवि सम्मेलन में कुल ६ कवि और कवियत्री अमेरिका के अलग अलग भाग से आये थे, साथ ही साथ यहाँ घनश्याम गुप्ता चन्द्र गुप्त, राकेश खंडेलवाल, अर्चना पांडा पंडा, डॉ विशाखा ठाकेर ठाकर और बीना टोडी की लिखी कविता संग्रह “धूप, गंध, और चाँदनी” का विमोचन भी होना था, छठे कवि थे अभिनव शुक्ला

इन कवियों का स्वागत करते हुए अनुप जी ने मंच के संचालन का जिम्मा दिया अभिनव को, घनश्याम दास चन्द्र गुप्त जी मनोनीत हुए अध्यक्ष और इस तरह शुरू हुआ होली के अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन। अभिनव ने सम्मेलन की शुरूआत आमवाले की बात से क्या कि थोड़ी देर तक खाने पीने के भावों पर ही कवियों का जोर रहा। हमारे लिये वैसे भी आमवाले और कवि में ज्यादा फर्क नही है एक मीठे आम बेचता है दूसरा मीठे बोलों की कविता बाँचता है। हाँ तो एक मजेदार आम और मैंगोशैक के नजराने के साथ अभिनव ने आमंत्रित किया विशाखा जी को और शुरू हुआ तालियों और ठहाकों का दौर। कविताओं में खान-पान, वैलेंटाईन-प्रेम-प्यार और पति-पत्नी और तकरार जैसे विषय छाये रहे।

विशाखा जी की कविताओं में गहरी संवेदनायें तो थीं ही लेकिन उनकी आवाज भी उतनी ही मीठी थी। तलाक के बाद भी अपने पति का इंतजार करती एक स्त्री के ऊपर लिखी कविता और गायकी तो कमाल की थी। सम्मेलन की दूसरी कवियत्री और उम्र में सबसे छोटी अर्चना के बोलों में उम्र की अल्हड़ता और चंचलपना साफ दिखता था। अपने पति के साथ एच४ में अमेरिका आयी एक पत्नी (यानि खुद पर) पर लिखी उनकी कविता “नौकरी की टोकरी” ने जहाँ एच४ में आने की व्यथा बयाँ की वहीं लोगों को गुदगुदाया भी। लगता है उनको अब ग्रीन कार्ड मिल चुका है और ये बात उनकी “नौकरी की टोकरी” पार्ट २ सुनकर समझ आ जाती है, दोनों ही कवितायें लाजवाब रही। तीसरी कवियत्री बीना टोडी की कविता में कुछ अलग सी ही सौम्यता थीं और वो अकेली मेहमान थीं जिन्होंने आम बेचने वाले और आमखाने वाले दोनों होने का लुत्फ उठाया।

कवियों में घनश्याम चन्द्र गुप्त जी सबसे बुजुर्ग थे और उन्होंने अपनी श्रीमतीजी की लिखी एक लाईन से प्रभावित होकर लिखी एक बड़ी ही प्यारी कविता सुनायी थी। जिसके छंद-अंतरे काफी काफी दिनों के अंतराल के बाद लिखे गये थे लेकिन फिर भी उनमें कमाल की तारम्यता (कंटिन्यूटी) थी। जब उन्होंने ये कविता पढ़ी थी तब मंच का संचालन राकेश जी कर रहे थे। उन्होंने उस प्यार की कविता के अंत में २ मिनट में तैयार मैगी जैसा भोग हास्य में लपेट कर बहुत ही खूबी के साथ जो परोसा, दर्शक ठहाके लगाये बिना रह ना सके। उनके बारे में जो सुन रखा था वो देख भी लिया, वो यही कि २ मिनट में मैगी तैयार करने में उनका कोई सानी नही। कवियों की कविता सुनकर वो उसी समय उसी अंदाज में अंतरा लिख देते हैं और वो अंतरा खाने में तड़के का ही मजा देता है। उन्होंने भी हास्य की कुछ जबरदस्त कवितायें पेश की जिन्हें सुनकर काफी कहकहे सुनने को मिले। ये तो थी उन कवि-कवियत्रियों की बात जो धूप, गंध और चाँदनी बन उस कवि सम्मेलन में बिखरे हुए थे। लेकिन इन सबसे अलग एक कवि और भी था।

आप लोगों ने सिक्का तो देखा ही होगा, इसमें एक हैड होता है दूसरा टेल, ज्यादातर लोग जब सिक्के को उछालते हैं तब या तो हैड आता है या फिर टेल। जबकि सिक्के को उछालने की महारत तभी है जब वो उछालने पर हमेशा खड़ा आये यानि हैड और टेल बराबर दिखायी दें।

सिक्के की तरह ही होती है कविता, जिसकी एक साईड होती है अच्छा लेखन और दूसरी होती है उसका वाचन (यानि उसके सुनाना)। कई लोग बहुत अच्छा लिखते हैं और कई कविता को बहुत अच्छा प्रस्तुत करते हैं। लेकिन कुछ बिरले ही होते हैं जो कविता रूपी सिक्के को उछाल कर हमेशा उसे जमीन पर खड़ा ही लाते हैं। ऐसे ही कवि हैं अभिनव शुक्ला, जिन्हें सुनकर लगता है कि उन्हें मंच पर कविता सुनाने का अच्छा खासा अनुभव है। वो जितनी अच्छी कविता लिखते हैं लगता है उससे बेहतर उसे प्रस्तुत करते हैं कह नही सकता “साड़ी बिच नारी है कि नारी बिच साड़ी है” (इसके आगे लाईन जोड़ने का मन कर रहा है जिसे यहाँ कहने का तुक तो नही है लेकिन ब्लोग तो हमारा ही है ना, तो वो लाईन ये है - डॉक्टर अनाड़ी है या बिमारी ही भारी है)। कविता और संचालन के मध्य उनके कहे चुटकुलों और प्रसंगों ने हंसी का अलग ही समाँ बाँधा हुआ था। अभिनव ने कमाल की हास्य कवितायें पेश की और जब हम रूखसत होने की तैयारी में थे तो उन्होंने पार्ले-जी (बिस्कुट) वाली एक बेहतरीन भावुक कविता पेश की जिसे सुनाने में मध्य में उनका गला भी रूँध गया था।

अनुपजी को भी आमंत्रित किया गया कि वो भी कुछ सुनायें और उन्होंने भी जो गागर में सागर भरा उसके क्या कहने। उनकी कही १६ शब्दों की एक कविता तो जबरदस्त थी ही लेकिन उसके बाद भी जो कविता उन्होंने सुनायी वो भी जबरदस्त थी।

फिलहाल कविता का दौर चालू था लेकिन बिना सबको बॉय बॉय बोले हमें रूखसती लेनी पढ़ी, हम यहाँ किसी भी कवि की लिखी लाईन इस लिये नही लिख रहे क्योंकि हमारे मैमोरी रैम के ऊपर हमें कुछ खास भरोसा नही।

और यही वजह है कि प्रोडक्शन प्रोब्लम के बीच जूझने के बावजूद हमने किसी तरह समय निकाल ये हाल अभी बयाँ कर डाला वरना जिस तरह ईकोनॉमी सुधरने को तरस रही है उसी तरह ये लेख भी हमारे वक्त को तरस रहा होताऔर जब तक वक्त मिलता तब तक हमारी मैमोरी रेम में फोरक्लोजर के लिये पड़े घरों जैसा ढेर इकट्ठा हो चुका होता जिसके ना सिरे का कहीं पता ना अंत का

अच्छी खबर से जैसे सिटी बैंक का स्टॉक वैल्यू पिछले कुछ दिनों में २०-३० सैंट बढ़ा, उसी तरह इस कवि सम्मेलन से लौट गाहे बेगाहे हमें काटने वाला कविता का कीड़ा भी कुलबुलाने लगा। वहाँ आये कवि-कवियत्री और श्रोता तो झेलने से बच गये लेकिन चलते चलते आपके झेलने के लिये उछाले जाता हूँ -

कविता तेरे प्यार में कवि बन गया हूँ
झोला टांगे आदमी की छवि बन गया हूँ
तूझको लिखना तो चाहता हूँ मगर बात नही बनती
तू हो गयी आकाश और मैं जमीं बन गया हूँ
अब तो शर्ट पैंट वालों की तू माशुका हो गयी है
और मैं घर में रखी बस एक डमी बन गया हूँ।

अंत में इतना ही कहूँगा कि उन एक से बढ़कर एक प्रतिभावान लोगों से मिलकर बहुत अच्छा लगा गालिब ने भी सुखनवर वाली बात बहुत सही कही थी।

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे, रेडीमेड चड्डियों का जमाना है, अब पहनता नहीं कोई कच्छे। आप सबको एक बार फिर होली मुबारक।

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