< Browse > Home / मेरी नजर मेरे विचार / Blog article: भारतीय संस्कृति भी कोई दूध की धुली नही है

| Mobile | RSS

भारतीय संस्कृति भी कोई दूध की धुली नही है

मैने अपनी पिछली पोस्ट में एक टीन प्रीगनेंसी का जिक्र किया था जो कि हमारे समाज (क्या पश्चिम क्या पूर्व) की विफलता का ही शायद नतीजा है। उसमें शास्त्रीजी की एक टिप्पणी आयी थी, जिसे पढ़कर ही मुझे कहना पड़ रहा है भारतीय संस्कृति (या सभ्यता या समाज) भी कोई दूध की धुली नही है। शास्त्री जी ने टिप्पणी की थी -

जिस तेजी से हम पाश्चात्य संस्कृति को आंख मीच कर आयात कर रहे हैं उस हिसाब से सन 2010 तक ये खबरें आपको हिन्दुस्तान के बडे शहरों से मिलने लगेंगी

लेकिन क्या वाकई में ऐसा है या होगा, मुझे नही लगता क्योंकि सच कहूँ तो मुझे अभी भी भारत के हाल यहाँ की पश्चिमी सभ्यता से बेहाल लगते हैं। मेरी इस बात की पुष्टि करने के लिये आया अगला कमेंट जिसमें घुघुती जी ने एक लिंक दिया था। अगर आप उसे पढ़ें तो पता चलेगा कि कैसे 13 साल की एक लड़की माँ बन गयी, जिसकी शादी भाई की शादी के बदले में की गयी।

इस गीता की कहानी उस टीन प्रीगनेंसी से ज्यादा खौफनाक है। वहाँ आपसी रजामंदी थी तो यहाँ गीता के केस में वहशीपना। जिसका शिकार भारत में लड़कियाँ कब से होती आयी हैं इसके लिये पश्चिम से कोई आयात नही हुआ। बस फर्क ये है कि इस वहशीपनें को शादी के रैपर में लपेट के किया गया जिससे सभ्यता के रखवालों को एक झूठा भ्रम बना रहे और इसका पता उस पोस्ट में मिली प्रतिक्रियाओं से लग भी जाता है, जो हैं ही नही।

ये वही देश है जहाँ कम उम्र की कोई भी गरीब लड़की किसी भी खूसट बुढ़े के साथ जबरदस्ती ब्याह दी जाती है। ये वही देश है जहाँ लड़की का पता चलते ही उसे भ्रूण में मार दिया जाता है। ये वही देश है जहाँ अंधविश्वासों के चलते छोटी लड़कियों को कभी भी किसी मेंढक या कुत्ते के साथ ब्याह दिया जाता है। ऐसे देश के रहने वाले हम लोगों को कम से कम टीन प्रीगनेंसी से डरने या चिंता करने की कोई जरूरत नही वरना तो वही बात होगी कि डाकुओं के मोहल्ले में रहने वाले चोरों से डरने लगे

मैने कोशिश तो बहुत की गुगल करने की लेकिन पता नही चल पाया कि भारतीय संस्कृति (या सभ्यता) में सती प्रथा का आयात पश्चिम सभ्यता के कौन से काल से हुआ। ना ही बाल विवाह का चलन किस पश्चिमी सभ्यता से सीखा गया इसका पता चल पाया। विधवाओं का तिरस्कार करने वाली बात का भी कुछ पता नही चला, वो हमारे समाज का एक कोढ़ था। आज भी आधी से ज्यादा जगहों पर जहाँ मर्द खुले मुँह घूमता है वहाँ औरतों को घूँघट डाल के रहना पड़ता है यहाँ ऐसा तो नही है।

हर बात को अगर हम संस्कृति और सभ्यता के खतरे के पूर्वाग्रह में बाँध कर देखेंगे तो कभी भी सही समस्या तक नही पहुँच पायेंगे और जब तक समस्या का सही पता नही चलेगा तो उसका निराकरण क्या करेंगे। हर समाज में अच्छाई और बुराईं होती हैं इस बात को मानना पहले बहुत जरूरी है वरना कहीं ऐसा ना हो कोई ब्लोगर कार्टूनिस्ट पेट दर्द को लेकर कोई कार्टून बनायें और उस पर टिप्पणियाँ पढ़ने को मिले और खोलो डोमीनोज या पिजा हट, ये तो एक दिन होना ही था

Leave a Reply 3,750 views |
Follow Discussion

31 Responses to “भारतीय संस्कृति भी कोई दूध की धुली नही है”

  1. rachna Says:

    aap ne bilkul sahii likha haen tarun हर बात को अगर हम संस्कृति और सभ्यता के खतरे के पूर्वाग्रह में बाँध कर देखेंगे तो कभी भी सही समस्या तक नही पहुँच पायेंगे और जब तक समस्या का सही पता नही चलेगा तो उसका निराकरण क्या करेंगे।

  2. seema gupta Says:

    हर बात को अगर हम संस्कृति और सभ्यता के खतरे के पूर्वाग्रह में बाँध कर देखेंगे तो कभी भी सही समस्या तक नही पहुँच पायेंगे और जब तक समस्या का सही पता नही चलेगा तो उसका निराकरण क्या करेंगे।

    ” very well written…..i too agree with your words..”

    Regards

  3. महेन Says:

    हर ग़लत चीज़ का आयात नहीं होता. हर संस्कृति में अच्छाइयां-बुराइयां मौजूद होती हैं. बहुत कुछ अपने यहाँ ग़लत रहा है बहुत कुछ दूसरों के यहाँ. हर ग़लत चीज़ के लिए पश्चिम को कटघरे में खड़ा करना संकुचित मानसिकता का पर्याय है, खासतौर पर जब आप उस संस्कृति से दो-चार न हुए हों. अपने यहाँ सती-प्रथा थी तो इंग्लॅण्ड में डायन करार दिए जाने की प्रथा विक्टोरियन युग में भी मौजूद थी. और जिस विषय में आपने कल लिखा था वह हमारे यहाँ परदे के पीछे खुले आम होता रहा है.

  4. कुश Says:

    संस्कृति कोई वस्तु नही जो हमने वहा से उठाकर यहाँ रख दी.. अपनी ग़लतियो का ठीकरा हमेशा से भारतीय लोग दूसरो पर ही फोड़ते आए है.. पाश्‍चात्‍य संस्कृति आती कहा से है? कौन से रास्ते से आती है ? ट्रेन से, बस से या प्लेन से? आने क़ी वजह क्या है?

    13 वर्षीय लड़की का जबरन ब्याह कराया जाना.. निहायत ही घटिया मानसिकता है.. जो निश्चित ही पश्चिम से नही आई है.. मगर इस पर तथाकथित बुद्धिजीव वर्ग चुप है.. क्योंकि इस पर बात करने से उनके खुद के नंगे होने क़ी संभावना है.. फिर शायद डर भी लगे क़ी लोग उन्हे नंगा कहेंगे तो?

    जोधपुर में 12 वर्षीय लड़की का विवाह 54 साल के एक व्यक्ति से कर दिया गया.. बाद में क़ानून क़ी मदद से लड़की को छुड़ाया.. ये तो वो केस था जिसका पता चला.. हमारे यहाँ संस्कृति क़ी बात करने वाले लोगो के खुद के घर में औरते परदा करती होगी.. बेटियो को बेटो का स्थान नही मिलता होगा.. बेटियो को घरो में बंद करके रखा जाता होगा..

    अपने मुँह पर दाग लिए लोग दूसरो क़ी कुरुपता पर हंसते है.. संस्कृति क़ी बात करने वाले लोग बलात्कार से पीड़ित लड़की के चरित्र पर उंगली उठा देते है.. दकियानूसी सोच से उपर उठकर यदि बात क़ी जाए तो उसी में मर्दानगी है.. पर विडंबना ये है क़ी ऐसे मुद्दो पर बात होने पर कुछ लोगो को मूत्र शंका होने लग जाती है..

  5. Dr.anurag Says:

    कल ही एक १७ साल की विवाहित लड़की के नवजात शिशु को देखने हॉस्पिटल गया था …ओर क्या कहूँ ?

  6. anoop Says:

    किसी भी आलेख को लिखने से पूर्व तथ्यों और आंकडो की सत्यता को सुनिश्चित करना निस्संदेह श्रमसाध्य कार्य होता है परन्तु आलेख की विश्वसनीयता और ग्राह्यता हेतु अनिवार्य और अपरिहार्य भी होता है. विशेषकर जब हम किसी धर्म या संस्कृति की आलोचना कर रहे हो तो मूल्यांकन और भी विश्वसनीयता के साथ होना चाहिए परन्तु इसके लिए पर्याप्त पठन-पाठन की आवश्यकता होती है.
    किसी भी पत्रिका में इस प्रकार के लेख पर्याप्त शोध के उपरांत लिखने पर ही प्रकाशित होते है परन्तु आज के इस समय में सब कुछ शीघ्र पा लेने में shortcuts ही काम आता है.विशेषकर जब ब्लॉग पर लिखना हो.
    आपने लिखा है “”भारतीय संस्कृति भी कोई दूध की धुली नही है” “ये वही देश है जहाँ कम उम्र की कोई भी गरीब लड़की किसी भी खूसट बुढ़े के साथ जबरदस्ती ब्याह दी जाती है। “” ये वही देश है जहाँ लड़की का पता चलते ही उसे भ्रूण में मार दिया जाता है। “” ये वही देश है जहाँ अंधविश्वासों के चलते छोटी लड़कियों को कभी भी किसी मेंढक या कुत्ते के साथ ब्याह दिया जाता है। “”
    सबसे पहले आपको संस्कृति, रिवाज, अन्धविश्वास, कुरीति, क्षेत्रीय सामाजिक मान्यता आदि का अन्तर समझना चाहिए. जो कमियां गिनाकर आपने भारतीय संस्कृति को दूध की धुली न होने का प्रमाण पत्र देने का सराहनीय कार्य किया है उनके लिए आपको प्रमाणिक भारतीय ग्रंथों का उद्धरण देना चाहिए जहाँ इनका समर्थन किया गया हो. किसी भी समाज की कुरीतिया जो व्यवहार में प्रचलित होती है आवश्यक नही कि संस्कृति का अंग हो.
    पर आज के समय में जब प्राचीन भारतीय मूल्यों आदि के विरुद्ध अप्रमाणिक सही, पर बोलना प्रगतिशीलता का लक्षण हो और तत्काल प्रसिद्धि दिलाने की क्षमता रखता हो तो शोध करने और संतुलित लिखने का दर्द कौन लेगा??

  7. Abhishek Ojha Says:

    आपकी इस पोस्ट से सहमत हूँ. हम तो अखबार में खुले आम निकलते हैं की ‘गोरी दुल्हन’ चाहिए और हम दूसरों को रेसिस्ट कहते हैं ! ऐसे ही कई बातें खुले आम होती हैं और उसी मामले में हम दूसरो पर दोषारोपण करते हैं.

  8. ranju Says:

    बुराई अच्छाई तो हर जगह है ..यह हमारे ऊपर है कि हम हर बात को किस तरह से लेते हैं …आपने सही लिखा है ..कई बातें जो पुराने समय से चली आ रही है वह आज भी बहुत दुःख देती हैं ..जैसे भूर्ण हत्या

  9. सुरेश चिपलूनकर Says:

    अनूप जी से सहमत… साथ ही यह भी बताने की कोशिश करें कि इन कुप्रथाओं का जनसंख्या के साथ कितने प्रतिशत का अनुपात बैठता है और सबसे बड़ी बात कि उस कुरीति को लेकर समाज में क्या क्रिया-प्रतिक्रिया है… क्या भारत के समाज ने उन कुप्रथाओं का स्वागत किया था? या दिल से अपना लिया था?

  10. रंजन Says:

    आपसे सहमत हुँ.. हम कौन होते है पश्चिम को बुरा भला कहने वाले.. हमें अपना घर ठीक करने की जरुरत है… ग्रंथो की बात करने ये क्या होगा.. वास्तविकता क्या है.. क्यों कुरुतिया है (है इसके लिये आंकडे नहीं चाहिये), क्यों भुर्ण हत्या होती है.. ये सभी कारण सामाजिक भले हो पर संस्कृति भी तो समाज की होती है..

  11. Gyandutt Pandey Says:

    सही कहा जी, बर्बरता में अपना समाज भी टॉप पर है।

  12. AKSHAT VICHAR Says:

    भारतीय संस्कृति में अनेक बुराइयां हों, रुढ़ीवादिता रही हों परंतु इन सबके बावजूद यह आपकी संस्कृति है और आपके द्वारा लेख के हैडिंग को इस प्रकार लिखा जाना कि ‘भारतीय संस्कृति कोई दूध की धुली नहीं है’ इसके प्रति आपके हिकारत भाव को ही दिखाता है। मां चाहे कितनी ही खराब हो बच्चे के लिये प्रिय होती है। अच्छा होता कि आप अपनी इस संस्कृति के गुण-दोष प्रकट करते परंतु यह कहकर की भारतीय संस्कृति….. एक तरह से भारतीय संस्कृति नीचा दिखाने का प्रयास ही किया है। रही कुप्रथाओं की बात तो काफी हद तक विदेशी आक्रमणकारियों के लगातार हमलों से भी ये पनपी हैं। हमारी लचीली संस्कृति अपने लचीलेपन के कारण अपने दोषों को हटाने में सक्षम है इसिलिये अनेकों धर्म, जाति, भाषा के बावजूद हम एक हैं। कम से कम हम की आलोचना करते हुए शब्दों के चयन में सावधानी बरत सकते हैं।

  13. अफ़लातून Says:

    १९३० के दशक में शिकागो में हुई वर्ल्ड एन्थ्रॉपॉलॉजिकल कॉंग्रेस में एक भारतीय विद्वान ने एक शोध-पर्चा पढ़ा था – ‘रूट्स ऑफ़ कास्ट सिस्टम इन इण्डिया’। विधवा द्वारा विवाह जाति छोड़कर (चूँकि जाति के भीतर पुनर्विवाह में दिक्कत होती)हो सकता है और इससे जाति नामक अत्यन्त कड़े व स्थिर वर्ग में टूट आ जाती इसलिए सती-प्रथा एवं विधवा-विवाह पर रोक की परम्पराएँ चलायी गयीं ।

  14. anil kant Says:

    एक बार में अपने बाल कटवा रहा था …वहां एक भाई दूसरे भाई से बोल रहा था कि पहले अपनी बहन की शादी करूँगा तब अपनी …जब दूसरे ने कहा कि वो तो अभी १०थ में ही पढ़ती है तो बोला गुर्जरों में (हरयाणा) जल्दी ही शादी कर देते हैं …पंजाबियों की तरह नही कि २८-३० साल तक बैठाले रखे …जब तक लड़की खस्सी हो जाए ….अब आप ख़ुद अंदाजा लगा सकते हैं कि नारी के बारे में कुछ लोगों के क्या विचार हैं ….जब मैंने उसे समझाने की कोशिश की तो वो मेरे ऊपर चढ़ बैठा ….. मैंने सोचा कि छोडो जब ये समझना ही नही चाहता तो क्या फायदा

  15. masijeevi Says:

    संस्‍कृति सेनाएं भी हमारी संस्‍कृति का ही हिस्सा हैं, क्‍या यह भी हमारी ही संस्‍कृति का ही हिस्‍सा है कि हम आत्मालोचना की बात बाते ही चिंहुक चिंहुक जाएं।

    हांलाकि एक बात तय है ‘सांस्‍कृतिक श्रेष्‍ठता’ का भाव जो आजकल के सेनाई रंगरूटों में दिखता है वह निश्चित तौर आयातित है क्‍योंकि ये अपनी प्रकृति में ही औपनिवेशिक है।

    संस्‍कृति की अपनी गति होती है वो उठती गिरती रहती है इसलिए इसकी झाड़पोंछ होती रहनी चाहिए।

  16. शास्त्री जे सी फिलिप् Says:

    यह सच है कि कोई भी संस्कृति अपने आप में पूर्ण नहीं है और हरेक में गलत बाते हैं. लेकिन आप ने जिस तरह भारतीय संस्कृति की धज्जी उडाने की कोशिश की है यह गलत है. कारण यह है कि यदि आप तुलनात्मक अध्ययन करेंगे तो पायेंगे कि “वर्तमान” पाश्चात्य समाज जिस आधार पर खडा है वह हर तरह से त्याज्य है घृणा के योग्य है.

    चिट्ठाजगत में जो अराजकतावादी हैं जो भारतीय समाज कि खिल्ली उडानें में बडी शान समझते हैं उनको इस आलेख ने अच्छा प्रोत्साहन और मसाला दे दिया है.

    सस्नेह — शास्त्री

  17. राज भाटिया Says:

    हम सब सिर्फ़ बुराईयो को ही क्यो देखते है, भारत मे कितने केस होते होगे ऎसे, कही इन बुराईयो को दिखा कर पश्चिम का गंद तो नही बटोरना चाहते, मै तो हमेशा ही कहता हुं, कि बुराईया, ओर अच्छाईया हर समाज मै है, लेकिन हमारी आदत है की विदेशी माल चाहे कितना भी घटिया क्यो ना हो , हम उसे पहले ना० १ पर लाने के लिये अपने माल की सॊ बुराईया जरुर गिनवाये गे,
    भारत मै कितने लोग है, जो लडकियो से नफ़रत करते है, भुर्ण हत्या करते है, अपनी बेटीयो को बेचते है ??? अगर यह % युरोप से मिलाओ तो आंखे खुल जाये, लेकिन हमारे यहा इन की बुराई को कोन देखता है,
    कभी सुना है भारत मे आदमी आदमी को खाये, बाप अपनी बेटी के संग जानबूझ कर शादी करे, एक ओरत के चार बच्चे हो, लेकिन उसे उन के बाप का नाम ना मालूम हो…

    कुछ लोगो की बेबकुफ़ी से पुरी संस्कृति खराब नही होती, ओर मुझे मान है कि मेने भारत मै , उस देश मै जन्म लिया जिसे आज पुरा विश्व्व नमन करता है, ओर यह सब मेने पिछले ३० सालो से महसुस किया है, कि हमारी संस्कृति को यह लोग आदर से देखते है.
    धन्यवाद इसे एक टिपण्णी के रुप मे ही लेना,

  18. anil pusadkar Says:

    सही लिखा आपने।सहमत हूं आपसे।

  19. Tarun Says:

    @अनूपजी, आप जो कह रहे हैं सही कह रहे हैं लेकिन दिस इज ट्रू अदर वे राउंड टू, यानि कि पश्चिम की कुरीति या सामाजिक समस्याओं के उदाहरण देकर हम भी पश्चिमी संस्कृति या सभ्यता को गलत नही ठहरा सकते। मुझे उन शब्दों के फर्क भी मालूम हैं लेकिन मुझे ऐसा लगता है संस्कृति कोई फिक्सड शाब्दिक अर्थ नही ये समय के अनुसार बदलता रहता है और इसके लिये उन सभी का योगदान होता है जिनका आपने जिक्र किया। कोई भी संस्कृति तभी बड़ी कही जायेगी जब वो दूसरी संस्कृति को भी बड़प्पन की नजर से देखे। मेरी समझ से कोई भी समाज किसी भी कुरीति का समर्थन नही करता होगा। लेकिन पश्चिमी सभ्यता के बारे में बात करते हुए हम ये नही सोचते।

    मैं या आप किसी को प्रमाण पत्र देने वाले कौन होते हैं, “भी” का मतलब यही होता है कि कमियाँ हम में भी है बार बार हम दूसरों को अपनी परेशानियों और समस्याओं के लिये दोष नही दे सकते।

    आपने जो विचार रखे उनके लिये धन्यवाद, मैने नोट किया है कि आपने मेरा ब्लोग अभी कुछ पोस्टों से ही टिप्पणी करना (या पढ़ना) शुरू किया है। आप टिप्पणियों में अपनी बात डिटेल में कहते हैं अच्छा लगता है, आशा है आगे भी ऐसे ही पढ़ते रहेंगे और अपने विचार रखते रहेंगे, धन्यवाद :)

  20. Tarun Says:

    @सुरेशजी, आपसे भी यही कहूँगा कि किसी भी समाज का बहुल हिस्सा किसी कुरीति को समर्थन देता हो ये देखा नही है। रहा सवाल आंकड़ों का तो वो ज्यादातर बात को उलझाने के लिये दिये जाते हैं, अगर कुरीति या समस्याओं के लिये ये सोचकर बैठे रहें कि अरे अभी तो ये आबादी का ५ प्रतिशत ही है जब १० प्रतिशत होगा फिर सोचेंगे तो हो गया।

    आप भी आजकल हमारी तरफ आने लगें हैं और टिप्पयाने लगे हैं, आशा है आगे भी आते रहेंगे, धन्यवाद :)

  21. Tarun Says:

    @अक्षत भैजी,
    आपने टाईटिल में से “भी” हटा दिया और उससे सारा मतलब ही बदल जाता है और भारतीय संस्कृति के प्रति मेरी भावना का आप सिर्फ एक लेख से अनुमान नही लगा सकते। अगर हम दूसरों की या उनकी संस्कृति या सभ्यता की आलोचना कर सकते हैं तो हमें अपनी आलोचना करनी और सुननी भी आनी चाहिये।

    १० साल से भारत के बाहर रहकर भी भारत और भारतीयों के बारे में बात करना, लिखना और उन्हें पढ़ना आपकी नजर में हिकारत का भाव हो सकता है मेरी नजर में नही।

    आप पहली बार मेरे ब्लोग में आये और टिप्पणी की शुक्रिया, आशा है आगे भी आते रहेंगे :)

  22. Tarun Says:

    @शास्त्रीजी, अगर इतना भर कहने से किसी की धज्जियाँ उड़ जाती हैं तो हो गया, मेरी नजर में इतनी कमजोर नही है भारतीय संस्कृति और समाज। तुलनात्मक अध्ययन के कोई मायने नही हैं क्योंकि वर्तमान पाश्चात्य समाज के प्रति हम जो भाव रखते हैं कुछ वैसा ही भाव हो सकता है वो हमारे लिये भी रखते हों। और वो तालिबानी समाज हमारे समाज के प्रति भी शायद यही कहता हो वो त्याज्य है घृणा के योग्य है। लेकिन उनके ऐसा समझने से क्या ऐसा हो जायेगा।

    पहले तो इसमें ऐसा कुछ नही है लेकिन अगर इस आलेख से किसी अराजकतावादी को मसाला मिलता भी है तो उनके लिखे से राजकतावादियों (अराजकतावादी का विलोम यही हुआ ना ;) ) को भी कम मसाला नही मिलता है।

    आजकल आप भी हमारे ब्लोग में आने लगे हैं, धन्यवाद. आशा है ऐसे ही आते रहेंगे और मसाला आदि की चिंता किये बगैर टिप्पणी करके उत्साह वर्धन करते रहेंगे :)

  23. Tarun Says:

    @भाटियाजी, आप बिल्कुल सही कह रहे हैं मेरा भी यही कहना है कि हर समाज में अच्छाई और बुराई हैं। एक दूसरे को दोष देने से ये कम नही होने वाली इसलिये दोष देना छोड़ देना चाहिये। मुझे भी अपनी संस्कृति से उतना ही प्रेम है जितना आपको या किसी तीसरे को लेकिन मुझे ये भी अच्छा नही लगता कि किसी दूसरे की संस्कृति को नीचा दिखा मैं ये करूँ।

    आप भी आकर टिपयाने लगे हैं आशा है आगे से भी आते रहेंगे और ऐसे ही टिपयाते रहेंगे :)

  24. Tarun Says:

    @मसीजिवी, बिल्कुल सही कहा झाड़पोंछ होती रहनी चाहिये इससे चमक बनी रहती है :)

  25. amit jain Says:

    आप के लेख पर मेरे विचार आप यहाँ सुन सकते है http://abcamit.blogspot.com/
    धन्यवाद

  26. Tarun Says:

    @रचना, सीमा, महेन, कुश, अनुराग, अभिषेक, रंजनाजी, रंजन, ज्ञानजी, अफलातूनजी, अनिलकांत और अनिल आप सभी का अपनी बात रखने के लिये धन्यवाद :)

    टिप्पणियों में सयंम और सौहार्दय बनाये रखने के लिये सभी को विशेष धन्यवाद :) , बहुत कम ब्लोग पोस्ट होती हैं जिनमें इतनी डिटेल में और अलग अलग विचारों की टिप्पणियाँ मिलती हैं।

  27. Tarun Says:

    @अमित, आपकी टिप्पणी करने का आयडिया इन्नोवेटिव है, आपने शायद ध्यान से नही पढ़ा। कहने का तात्पर्य था कि कमियाँ हम में भी है सिर्फ पश्चिमी संस्कृति में नही। जब हम या दूसरे दूसरी संस्कृति की बखिया उधेड़ते हैं तब क्या हम या वो उनके ग्रंथ, किताबें खंगालते हैं, कभी नही।

    बात सिर्फ इतनी है कि हर संस्कृति और समाज में अच्छाई और बुराई होती हैं और हमें सब को उसी तरह से लेना चाहिये ना कि एक दूसरे पर दोषारोपण करके।

    आशा है आगे भी आपके विचार जानने का मौका मिलता रहेगा :)

  28. अनूप शुक्ल Says:

    बढ़िया लिखा जी। टिप्पणियां भी अच्छी हैं! बधाई!

  29. Anurag Says:

    Come on, you are trying to show the mirror to Indian culture? That never works… you know. We can only raise fingers and not look at ourselves. Apparently that’s obvious from some of the previous comments. When you get time look at this video again http://www.youtube.com/watch?v=a2PH1a2fVew&eurl=http://hindi-mishranurag.blogspot.com/

  30. dhara vallabh Says:

    aapke lekh se mai sahmet hoo.
    bahoot aacha

  31. dabas Says:

    i am not at all agreed with this as poet is talking about india of 200-300 years ago when we were under slavery, if we saw our history before 16th century then anoop feel shame on this poem.

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

टिप्पणियों का शटर नयी पोस्ट पब्लिश करने के बाद कुछ दिनों ही खुला रहता है। पुरानी पोस्टस में आने वाले स्पॉम टिप्पणियों के मद्देनजर यह निर्णय लेना पड़ा, असुविधा के लिये खेद है। आप को अगर ये ब्लोग और इसमें लिखी पोस्ट पसंद आती हैं तो आप इसे सब्सक्राइब करके भी पढ़ सकते हैं, धन्यवाद।