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ध्यान रहे मैने गुलाबी नही कहा, क्यों? वो बाद में बताऊंगा पहले चड्ढी की कबड्डी से संबन्धित तीन पोस्ट का जिक्र करना चाहूँगा जो मैने पिछले १-२ दिन में पढ़ी थी। पहली पोस्ट थी सुरेश चिपलूनकर की जिन्होंने शुरूआत तो गुलाबी चड्डी भेजने के विरोध से की लेकिन फिर मुद्दे से भटक गये और व्यक्तिगत आक्षेप लगाने लगे उस लेडी पत्रकार पर जिसने ये गुलाबी समा देश में बाँधा हुआ है। क्योंकि वैसे ही सवाल रामसेने के मुत्तालिक भी उठाये जा सकते हैं। मेरी समझ से ये भी वैसा ही विरोध था जैसा पब में लड़कियों को पीटने के बाद मुत्तालिक पर आक्षेप लगने लगे थे। मुझे लगता है हमला व्यक्ति पर नही बल्कि सोच पर होना चाहिये क्योंकि ये व्यक्ति तो रक्तबीज होते हैं एक को मारोगे तो दो आ जायेंगे। विरोध रामसेने से पहले उस निकम्मी सरकार का भी होना चाहिये जो नागरिकों को सुरक्षा तक नही दे सकती। लेकिन उस दिशा में कुछ खास पढ़ने को नही मिला ये भी हो सकता है कि मुझे ही नजर ना आया हो।

दूसरी पोस्ट थी सुजाता की जो गुलाबी चड्डी भेजने का समर्थन कर रही थी लेकिन चड्डी के समर्थन का जो तर्क उन्होंने दिया वो मेरे गले नही उतरा। चड्डी (चाहे जनाना ही सही) को उन्होंने स्त्री के प्राइवेट स्पेस का प्रतीक करार दिया जो कि उतना सत्य नही है क्योंकि ये चड्डियाँ मर्दों का भी प्रतीक रही है। चड्डी से ज्यादा स्त्रेण है ब्रा लेकिन विरोध के लिये इन दोनों में से किसी का भी भेजना हमारी सोच और तरीकों का दिवालियापन ही बताता है। अगर किसी स्त्रेण प्रतीक को भेजना ही विरोध समझा जा सकता है तो गुलाबी चुड़ियाँ भी भेजी सकती थी। ये हमेशा से ही मर्दों को उनकी नामर्दी बताने का प्रतीक रही हैं।

लेकिन क्रिया और प्रतिक्रिया के फलस्वरूप होने वाले विरोध में पहले ये जानना ज्यादा जरूरी हो जाता है कि विरोध किया किस बात का जा रहा था। रामसेने वाले पब का विरोध कर रहे थे या लड़कियों के पब जाने का, जाहिर है उनकी हरकतें देख कोई भी बता सकता है विरोध कम से कम पब का तो नही हो रहा था। क्योंकि अगर ये होता तो जोर पब बंद करवाने में ज्यादा दिया जाता ना कि सिर्फ लड़कियों पर हाथ चलाने के। क्या लड़के नही थे उस पब में?

प्रतिक्रिया स्वरूप जो चड्डियाँ भेजी जा रही हैं वो किसके विरोध में भेजी जा रही हैं लड़कियों या महिलाओं पर हाथ उठाया गया, उनके साथ मारपीट की गयी इस बात पर या फिर इस बात पर कि लड़कियों को पब में पीने से रोका गया। इस पुरूषवादी समाज में महिलाओं के साथ इस तरह की मारपीट पहली बार नही हुई है, इससे पहले कई मर्तबा हो चुकी है लेकिन कभी उस जोर शोर से हल्ला नही मचाया गया जैसा इस वक्त। अभी भी वक्त है बजाय इस विरोध को एक घटना विशेष पर दर्ज करने के किसी भी रूप में महिलाओं के साथ मारपीट करने की बात होना चाहिये। और अगर विरोध इस बात पर है कि महिलाओं को पब में क्यों नही पीने दिया गया? तो बात सही है अधिकार समान होने चाहिये लड़के और लड़कियों को बराबर हक मिलने चाहिये।

लेकिन पब में जाने वाले क्या लड़के क्या लड़कियाँ समाज के कितने प्रतिशत लोगों का प्रतिनिध्त्व करते हैं मुश्किल से शायद १५ प्रतिशत या उससे भी कम। जबकि प्रतिशत में इससे कहीं ज्यादा महिलाएं यदा कदा जाने कब से शराबबंदी के खिलाफ आवाज उठा रही हैं, उनकी मदद के लिये कोई आया हो कभी देखने सुनने में नही आया। उसके विरोध में उठी आवाजें सुनने को नही मिली, क्योंकि इस शराब ने उनके घर बरबाद करके रख दिये हैं। शायद वो भी नही जानती कि सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को कोई नही मारता।

मेरे बेटे को, जो कि दूसरी क्लास में है अभी कल एक होमवर्क मिला था चूँकि इसका उदाहरण यहाँ ठीक बैठता है इसलिये दे रहा हूँ। उसे एक ऐसी चीज ड्रा करनी थी जो फैमिली की जरूरत (Need) में आती है मसलन रोटी, कपड़ा और छत (मकान) और दूसरी एक ऐसी चीज ड्रा करनी थी जो हम चाहते हैं (Want) जैसे 50 इंच टीवी, वर्ड टूर वगैरह वगैरह। यहाँ चल रही बात को अगर उसके होमवर्क में फिट करूँ तो शायद कुछ ऐसा होगा, पब उन 10-15 प्रतिशत जनसंख्या के लिये Want है, जरूरत नही है लेकिन इट्स अलवेज नाइस टू हेव जबकि शराबबंदी कम से कम 30-40 प्रतिशत जनसंख्या के लिये Need है, जिंदा रहने के लिये, परिवार चलाने के लिये शराब (शराब के ठेके) का बंद होना उनकी जरूरत है, इट्स मस्ट टू हेव। अब तय हमें करना है कि विरोध किस का करना है, कहीं ऐसा ना हो, एट द एंड इट्स ए वॉर बिटविन पीपुल हू नीडस एंड पीपुल हू वांटस

अपने देश में इससे भी कहीं अधिक जरूरी मुद्दों की कोई कमी नही है और इसी बात पर जोर देकर पोस्ट लिखी थी अनिल पुस्देकर ने। उन मुद्दों के लिये आवाज उठाने से मुझे नही लगता किसी की आधुनिक सोच पर सवाल उठाया जा सके। ना ही संस्कृति की रक्षा पब बंद करके की जा सकती है और ना ही पब में जाने वाले स्त्री या पुरूष को आधुनिक या वेस्ट्रन ख्यालों वाला माना जा सकता है और ना ही वहाँ जाना किसी आजादी का बिंब है।

तरीकों पर बहस की जा सकती है उनको सही गलत ठहराया जा सकता है लेकिन मुख्य बात ये है कि आज का युवा या युवती आवाज उठाना जानती है और देर सबेर उसको ये भी समझ आ जायेगा कि किसी बात का विरोध करने का सबसे सही तरीका क्या हो सकता है।

अपनी पोस्ट के टाईटिल से इतना भटकने के बाद अब वापस आता हूँ मुन्ना भाई पर। याद है मुन्ना भाई वाली फिल्म में कुछ बूढ़ों को उनके घर से निकाल दिया जाता है। मेरी समझ में घर हर लिहाज में पब से कहीं ज्यादा प्राइवेट माना जायेगा, जहाँ कोई भी फूल चड्डी पहन के खिल सकता है (मतलब कोई भी इसे पहन घूम सकता है)। देखा जाये तो उन बुड्ढों को घर से निकालना सही मायने में उनके प्राइवेट स्पेस में अतिक्रमण हुआ लिहाजा जरा सोचिये अगर विरोध में मुन्ना भाई ने उस प्रोपर्टी डीलर के यहाँ फूलों के गुलदस्ते की जगह चड्डियाँ भिजवायी होती (पिंक अगर स्त्रियों का रंग है तो ब्लू पुरूषों का माना जाता है)। फिल्म में घर में जगह जगह, दरवाजे पर, गेट पर जो गुलदस्ते नजर आ रहे थे उसकी जगह ब्लू चड्डियाँ देखने को मिलती तो? शायद तब सभी तथाकथित बुद्धिजीव इस बात का जमकर विरोध करते और फिल्म एक विवाद बनकर रह जाती।

मेरी नजर में मुतालिक और निशा दोनों का ही तरीका गलत है लेकिन मैं अपने को गलत कह के इन दोनों को सही मान सकता हूँ अगर कल रामसेने काश्मीर में आतंकवादियों का सामना करने जाती है, अगर वो देश में बढ़ते भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ी होती है, अगर वो प्राकृतिक आपदाओं के वक्त लोगों की मदद को आगे आती है, वो बढ़ते अपराध के खिलाफ खड़ी होती है। और दहेज को लेकर किसी महिला को परेशान करने वाले परिवार वालों को गुलाबी चड्डी भेजी जाती है, महिलाओं के खिलाफ डोमेस्टिक वायलेंस करने वालों को ये गुलाबी चड्डी भेजी जाती है, बलात्कारियों को ये गुलाबी चड्डी भेजी जाती है, लड़कियों की भ्रूण हत्या करने वालों के खिलाफ गुलाबी चड्डी भेजी जाती है। जिस दिन ऐसा होगा उस दिन मुझे ये मानने में बहुत खुशी होगी कि ये दोनों ही सही थे मैं गलत था लेकिन तब तक…

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