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ये तो सभी जानते हैं कि त्रेता युग में विभिषण ने रावण को हरवाने में भगवान राम की मदद की थी जिसके फलस्वरूप इस तरह के केस के लिये ही ये कहावत बनी है - घर का भेदी लंका ढाये।

उसी त्रेता युग में सुर्पनखा भी हुई थी, जो पहले राम पर लट्टू हुई लेकिन राम के मना करने पर लक्ष्मण से विवाह करना चाहती थी। कुछ देर तक तो वो दोनों भाईयों के बीच शंटिंग करती रही और फिर अंततः लक्ष्मण ने उसकी नाक काट उसे भागने पर मजबूर किया।

ये सुर्पनखा टाईप केस तो आजकल भी होते रहते हैं बल्कि अभी तो एक इसी तरह का केस फिजा में चाँद बन सभी तरह की सीमा तोड़ गूँजायमान है। बस फर्क इतना है तब शंटिंग करने वाली एक स्त्री थी और अब एक पुरूष। तो क्या इस तरह के केस में हम ये कह सकते हैं - सुर्पनखा बन नाक कटाये (बिल्कुल उसी लहजे में जैसे घर का भेदी लंका ढाये)।

निठल्ली त्रिवेणीः अपन को भाषा की इत्ती समझ नही है कि नियम के मुताबिक त्रिवेणी लिख सके, इसलिये निठल्ली त्रिवेणी कह रहे हैं यानि त्रिवेणी का हमारा जेनेरिक वर्जन, वैसे ही जैसे कभी आपको निठल्ले दोहे सुनाये थे। भारत में कुछ शहर ऐसे हैं जहाँ वोटरों के पास कोई च्वाइस नही होती, उन्हीं को ध्यान पर रख ये लिखने की कोशिश की है।

कोई है चोर, कोई है डाकू
कोई चलाये छुरी, कोई चलाये चाकू

जनता का क्या, खरबूज बन के जाती है और कट के आती है।

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