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आते जाते खुबसूरत आवारा सड़कों पे – ब्लागर चर्चा 1

January 27th, 2009 | 22 Comments | Posted in जरा हट के

[इस सीरिज में हिंदी के कुछ ऐसे ब्लोगरस (या ब्लोग) की बात करेंगे जो मुझे पसंद हैं, इनमें से कुछ साथ चलते चलते कब दोस्त बन गये पता ही नही चला। इस सफर के लिये इस गीत की चंद लाईने बहुत उपयुक्त हैं - "आते जाते खुबसूरत आवारा सड़कों पे, कभी कभी इत्तेफाक से, कितने अंजान लोग मिल जाते हैं, उनमें से कुछ लोग भूल जाते हैं, कुछ याद रह जाते हैं"। इनके बारे में बात करने का कोई क्रम नही है, जिसके बारे में सबसे पहले बात करेंगे वो उतना ही पसंद है जितना कि वो जिसे सबसे अंत में आपसे मिलवायेंगे। ये वो ब्लोग हैं जिन्हें मैं अक्सर पढ़ते रहता हूँ, पसंद करता हूँ लेकिन इसका ये मतलब नही कि मैं सिर्फ तारीफ ही करूँगा हो सकता है वो भी कह दूँ जो बात इनमें नापसंद हों।]

मेरा पन्ना वाले जीतूः जीतेन्द्र चौधरी शायद नाम ही काफी है क्योंकि अधिकांश हिंदी ब्लोगरस उन्हें पहले से ही जानते हैं। एक जमाना था जब जीतू भाई हर नये ब्लोगरस से सिर्फ एक ईमेल की दूरी भर रहते थे। आज भी रहते हैं बस वो खुद ये कहते नहीं। आज से लगभग पांच साल पहले मैंने जब हिंदी में लिखना शुरू किया था तो जो सबसे पहली हिंदी ब्लोगर की टिप्पणी आयी थी वो जितेन्द्र की ही थी। वही जितेन्द्र कब जीतू हो गये पता ही नही चला, नारद काल में तो जीतू और नारद एक दूसरे के पर्यायवाची भी हो गये थे। आजकल नारद ने थोड़ा बैकफुट ले लिया और जीतू भी कम दिखायी पड़ते हैं।

हमने एक बार उनके साथ अनमोल वचन वाला प्रोजेक्ट भी शुरू किया था, फिर फोटो ब्लोग प्रतिबिम्ब लेकिन आज के दिन दोनों में विरानी है। ये शायद अकेले हिंदी ब्लोगर हैं जिनकी खुद के बारे में बनायी लिस्ट सबसे लंबी ही नही है बल्कि पब्लिक के लिये ओपन भी है।

फुरसतिया माने अनुप शुक्लः ये दूसरे कानपुरिया हैं जिनका लिखा तो पसंद है ही लेकिन ये खुद भी मासाअल्लाह किसी से कम नही। जैसे जीतू नारद के पर्याय थे वैसे ही अनुपजी चिट्ठाचर्चा के पर्याय और आज भी हैं। फुरसतिया के लेखन की सबसे विशेष बात ये है कि उन्हें पढ़कर लगता है काफी फुरसत में लिखे गये हैं, आजकल इनकी पोस्ट का साईज थोड़ा छोटा हो गया है वरना तो पहले इन्हें पढने के लिये खुद भी फुरसतिया होना पड़ता था।

पहली हिंदी ब्लॉगजीन निरंतर में इनका भी सवाल जवाबों का मजेदार कॉलम हुआ करता था। कविता बनाने में इनका कोई सानी नही है, जी हाँ ये कविता लिखते नही बनाते हैं और वो भी चंद समय में, पोस्ट लिखते लिखते जब लगता है इसकी लंबाई कम हो रही है तो तुरत बना डालते हैं, कभी खुद से तो कभी कहीं और से बना माल चेप मारते हैं। आज के दौर में जब अपने खुद के लिखे किसी लेख का लिंक नही मिलता या याद नही होता ये ज्यादातर लिंक कहाँ से ढूँढ लाते हैं, ये गुढ़ रिसर्च का विषय है। इनकी वन लाईना वो ही मजे देती है जैसे खाने में तड़का।

जवानी के दिनों में इन्होंने साइकिल बड़ी दौड़ायी है, अब जवानी ढलने सी लगी है लेकिन दौड़ाने का शौक अभी तक बरकरार है इसलिये आजकल चिट्ठाकारों को चिट्ठाचर्चा के मंच तक दौड़ा लाते हैं। स्वयंभु फुरसतिया का फुरसत का अंदाजेबयाँ ये है – हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै। लेकिन बकौल कल्लू पहलवान वो औरों से कहते फिरते हैं – मुझसे बोलो तो प्यार से बोलो

ये सिलसिला आगे जारी रहेगा और मिलवायेंगे अपनी पसंद के ३ और ब्लोगरस से…

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22 Responses to “आते जाते खुबसूरत आवारा सड़कों पे – ब्लागर चर्चा 1”

  1. समीर लाल Says:

    ये बेहतरीन सिलसिला शुरु किया है..लोगों को एक दूसरे को आपकी नज़रों से जानने का मौका मिलेगा. साधुवाद. शुभकामनाऐं.

  2. समीर लाल Says:

    शीर्षक से लगता है कि गाना सुनाने जा रहे हो,शायद गैर संगीत प्रेमी न खोलें लिंक को. इसे जरा क्लियर करो कि ब्लॉगर चर्चा या ऐसा कुछ कि लोगों को पता चले.

  3. Gyan Dutt Pandey Says:

    पहले पहल दो प्यारे इन्सानों से रूबरू कराया। धन्यवाद।

  4. Tarun Says:

    @समीर जी, आप सही कह रहे हैं, सलाह के लिये धन्यवाद। इस बार तो तरकश से तीर निकल चुका है लेकिन अगली बार तीर में ये लेबल लगा कर छोड़ा जायेगा।

  5. अनूप शुक्ल Says:

    सबेरे-सबेरे यह पोस्ट पढ़ी। आनन्दित च पुलकित हुये। दो कनपुरियों का जिक्र देखकर और मजा आया। कानपुरिये अपनी तारीफ़ का कब्भी बुरा नहीं मानते।
    इस पोस्ट के बाद फ़िर निठल्ले तरुण की तमाम पोस्टें देखीं और जो नहीं देखीं उनको याद किया। अच्छा लगा।
    जीतेन्द्र आजकल काफ़ी व्यस्त हैं। लिखने-विखने में कम समय दे पाते हैं। लेकिन लेकर सितम्बर २००५ से अभी हाल के दिनों तक इन्होंने हिन्दी ब्लाग जगत में जबरदस्त हलचल मचाये रखी। लिखने-पढ़ने-टिपियाने-सिपियाने के अलावा तमाम कामों में इनका हाथ रहा। जीतेन्द्र की सबसे बड़ी खूबी में से यह भी रही कि दूसरे को झांसा देकर काम करा लेना। टोपी पहना देना। खुराफ़ाती भी बहुत रहे। रहे क्या जी हैं अभी भी। जित्ती मौज हमने जीतेन्द्र से ली और जीतेन्द्र से हमने ली उत्ती शायद अभी तक किसी ने आपस में ब्लाग जगत में न ली होगी। बच्चा फ़िर से कब उचक के आयेगा आगे इसका इंतजार है।
    अपने बारे में क्या कहें? :) काफ़ी कुछ कह दिया गया!
    वैसे यह लेख जिसका लिंक दिया उस नाम से सरिता शर्माजी की आवाज में बहुत प्यारी कविता है उनकी। मुझसे बोलो तो प्यार से बोलो। कभी सुनवायेंगे।
    हमारे लेख के साइज छोटे होते गये कारण शायद कुछ व्यस्त होते जाना है। लेकिन मन है कि खूब लम्बे-लम्बे लेख लिखे जायें। तमाम योजनायें हैं देखो कब पूरी होती हैं।
    अभी तो धन्यवाद योजना पूरी कर रहे हैं। शुक्रिया हमारे जिक्र का।

  6. Arvind Mishra Says:

    अरे तरुण भाई काहें को हमारे नए नए धंधे पर लात मार रहे हो -हाय राम अब मेरे चिट्ठाकार चर्चा का क्या होगा !

  7. Manoshi Says:

    इसे भी देखें तरुण-

    http://manoshichatterjee.blogspot.com/2008/12/blog-post_04.html

  8. seema gupta Says:

    ” आपकी पसंद वाकई लाजवाब है….ये दोस्ताना हमेशा कायम रहे…इसी दुआ के साथ…”

    Regards

  9. mamta Says:

    दो महान ब्लौगर से मिलवाने का शुक्रिया ।

  10. अतुल शर्मा Says:

    ऐसे विशाल व्यक्तित्वों को बहुत कम शब्दों में समेट दिया आपने।

  11. ताऊ रामपुरिया Says:

    बहुत आभार आपका, दो पुराने चावलों से रुबरू करवाने के लिये.

    रामराम.

  12. जीतू Says:

    अरे वाह! अभी थोड़ी देरे पहले शुकुल चैट पर मैसेज डालकर गए है, कि तुम्हारे नाम की सुपारी ली है किसी ने। वैसे चैट मैसेज तो तुरत फुरत देखने की चीज होती है, लेकिन क्या करें, यहाँ बाजे बजे पड़े है, ढोल मंजीरे इधर उधर करके, देखा, तो ये मैसेज दिख गया। खटाक से लिंक पर क्लिक किया गया।

    अपनी तारीफ पढकर कौन खुश ना होएगा, तारीफ़ के लिए धन्यवाद भैया। लेकिन क्या है कि अब हम तारीफ़ से बहुत डरते है, इधर लोग तारीफ करते है, उधर दन्न से कोई काम टिका देते है। ऑफिस मे भी हम तारीफ़ और वर्कलोड को झेलते झेलते थक गए है, फिर भी तरुण भैया, तुमने तारीफ़ पूरे तन मन, (धन से भी करो ना) की है, इसका बहुत बहुत धन्यवाद। फिर मिलते है।

  13. amit Says:

    वाह-२, खूब सीरीज़ चालू किए हो तरूण भाई, समीर जी से पूर्णतया सहमत कि इस शृंखला के बहाने आपकी नज़र से भी लोगों को जानने का मौका मिलेगा! :)

  14. amit Says:

    बाकी अनूप जी और जीतू भाई के लिए तो शब्द कम पड़ जाएँगे – दोनों एक से बढ़कर एक हैं और बहुत ही मजेदार इश्टाईल में लिखते हैं! :)

  15. Dr.anurag Says:

    शुक्ल जी से तो परिचित है ही….उनके लेखन में ख़ास विविधता है जो लिखने वाले का एक बड़ा गुण है …सेंस ऑफ़ ह्यूमर में तो लोगो को हम सर्वोपरि मानते है एक शुक्ल जी दूसरे डॉ अमर कुमार .
    .जीतू जी का जिक्र सुनकर उत्सुकता हो गयी है ..

  16. Abhishek Ojha Says:

    अनुरागजी की हाँ में हाँ… शुकुल जी से तो आजकल बात भी होती है !

  17. rajeev thepda Says:

    waah…waah….waah…..waah…..!!

  18. विवेक सिंह Says:

    सच कहूँ तो मैंने आज तक जितेन्द्र जी की फुरसतिया के जन्म दिन वाली पोस्ट ही पढी थी पुरानी कहीं . उसके हिसाब से तो वे फुरसतिया से कहीं इक्कीस ही दिखे . और अनूप जी का तो खैर कहना ही क्या ! शब्द नहीं मिल रहे ! जाने किधर गए , अभी तो यहीं रखे थे . कुश को बोलना पडेगा थोडे से जेब से निकाल कर दें :)

  19. Shiv Kumar Mishra Says:

    अरे वाह!
    ये शुकुल जी तो वही हैं…अपने कानपुर वाले. अरे ठीक कहा भइया. हम तो शुकुल जी के बहुत बड़े फैन हैं. और जीतू भाई के भी. आप भी इनके फैन हैं! तब तो दोनों मिलकर फैन क्लब खोल लेते हैं.

  20. Ranjan Says:

    aapake saath ham bhi mil aaye en mahapurusho se…

  21. डा. अमर कुमार Says:


    ताऊ, कृपया अपनी टिप्पणी में भूल सुधार कर लें,
    इन धुरंधरों के लिये पुराने चावल नहीं, महीन चावल लिखें !

  22. Anurag Mishra Says:

    Tarun Jee! Would you please make your complete feed available for the people who read you on feeds :) .

    Thank You

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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