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हिंदी ब्लोगिंग का समाचार पत्रों में उल्लेख रामखिलावन की भैंस की खबर जैसा है

January 6th, 2009 | 17 Comments | Posted in बस यूँ ही

पिछले एक साल में हिंदी ब्लोगरस या ब्लोगिंग का हिंदी समाचार पत्रों में कई बार उल्लेख हुआ है अगर एक या दो लेखों को छोड़ दें तो ज्यादातर आलेख पढ़कर लगा कि ये उसी तरह से छपे हैं जैसे रामखिलावन की भैंस की खबर। ज्यादातर सभी आलेखों में अगर मगर करके गिने-चुने १०-१२ ब्लोगस (या ब्लोगरस) का ही रह रह कर जिक्र आया है। एक तरफ हिंदी ब्लोगस की संख्या ६००० हजार तक पहुँचने का ढिंढोरा पिटा हुआ होता है दूसरी तरफ बात सिर्फ गिनती के ब्लोगस की, इसका मतलब सीधा यही लगता है कि जो है यही है बाकि तो बस ऐसे ही जैसे भूस का ढेर।

इस तरह के ज्यादातर आलेख पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर लिखे गये लगते हैं और इन्हें पढ़कर हमें अपना रामखिलावन याद आ जाता है। आज से दस साल पहले उत्तर प्रदेश में हिंदी के दो मुख्य समाचार पत्र थे (बेशक अभी भी हैं) अमर उजाला और दैनिक जागरण। इन समाचार पत्रों में यदाकदा इधर उधर कोनों में बड़ी मजेदार खबरें छपा करती थी (कह नही सकता आज भी छपती हैं या नही) मसलन फलाना गाँव के शम्भु चौधरी की गाय ने एक बछिया को जन्म दिया या फिर फलाना गाँव के फलाने व्यक्ति की भैंस भाग गयी। इस तरह के खबरों की सच्चाई तो देने वाले ही जानें लेकिन इतना पता तो चल ही जाता है समाचार पत्रों में कुछ भी छपवाया जा सकता है।

अब चलते चलते रामखिलावन की बता दें, ये दरअसल दुधिया था अड़ोस पड़ोस के घरों में दूध लाता था। एक दिन आया और दो किलो दूध की जगह उसने सिर्फ आधा किलो ही दूध दिया। जब उसे बोला गया कि भैया इतना कम दूध क्यों दे रहे हो, हमारे यहाँ तो दो किलो आता है। रामखिलावन बोला, आपने अखबार नही पढ़ा क्या? पूछने पर उसने बताया कि उसकी तीन-चार भैंस बीमार हो गयी है और इसकी खबर अखबार में भी छपी है

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17 Responses to “हिंदी ब्लोगिंग का समाचार पत्रों में उल्लेख रामखिलावन की भैंस की खबर जैसा है”

  1. dr parveen chopra Says:

    राम खिलावन वाली बात भी क्या खूब रही — वैसे इन चिट्ठों के बारे में जिस तरह से अखबारों में लिखा जाता है उन लेखों को पढ़ कर मेरे मन में भी लगभग यही विचार उत्पन्न होत हैं — आपने बहुत बढ़िया ढंग से लिखा है।
    नववर्ष की बहुत बहुत शुभकामनायें —– वैसे मुझे आप की वही एक साल पुरानी टिप्पणी हमेशा याद रहेगी जिस से मैंने कमैंट मॉ़डरेशन का औचित्य सीखा था।

  2. ताऊ रामपुरिया Says:

    एक तरफ हिंदी ब्लोगस की संख्या ६००० हजार तक पहुँचने का ढिंढोरा पिटा हुआ होता है दूसरी तरफ बात सिर्फ गिनती के ब्लोगस की, इसका मतलब सीधा यही लगता है कि जो है यही है बाकि तो बस ऐसे ही जैसे भूस का ढेर।

    इस तरह के ज्यादातर आलेख पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर लिखे गये लगते हैं

    शायद आपने सभी के मन की बात कह दी है. इस बात को ऊठाने के लिये आभार.

    रामराम.

  3. Abhishek Ojha Says:

    बात तो सही है… वैसे दैनिक जागरण में ऐसी ख़बर २ साल पहले तक तो छपती थी, अब पता नहीं !

  4. Suresh Chiplunkar Says:

    ताऊ से सहमत, ब्लॉग जगत में गुटबाजी तो सत्य है ही, “वैचारिक खुन्नस” रखने वाले भी लम्बे समय तक लगातार “रगड़ने” की फ़िराक में लगे रहते हैं…

  5. संजय बेंगाणी Says:

    पढ़ते ही मुस्कान होंठों पर चिपक सी गई है, रूक ही नहीं रही.

  6. ghughutibasuti Says:

    देखिए, कुछ कहने पर लगता है कि हा्थ ना पहुँचे तो अंगूर खट्टे हैं ।
    वैसे आपके राम खिलावन बहुत पसन्द आए।
    घुघूती बासूती

  7. ghughutibasuti Says:

    राम खिलावन की भैंस और भी अधिक पसन्द आई। :D
    घुघूती बासूती

  8. कुश Says:

    हमारा ठप्पा भी समझिए… बिल्कुल सही लिखा आपने…

  9. Dr.Arvind Mishra Says:

    लगता है प्रिंट मीडिया ब्लागजगत को सही सन्दर्भों में नही ले पा रहा है -अभी भी मुम्बई के कुछ हिन्दी समाचार पत्र जो उत्तर प्रदेश के मुम्बई में रहने वाले “परदेशी ” वासियों में लोकप्रिय है ऐसी ही खबरे छापते हैं कि फलाने की भैंस पडवा बियाई है ! यह वैसे बेवकूफी कीखबर है मगर अपने सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्यों में वतन की याद दिला देने वाली ख़बर है -अपनी जड़ों से सैकणों किमी दूर का आदमी इन ख़बरों से अपने गृह विरह का तादात्म्य स्थापित कर पाता है .अब प्रिंट मीडिया(वहां कौन से गृह विरही हैं जो ब्लाग जगत से जुड़े हैं ? )इस नजरिये से ब्लागजगत को क्यों देख रहा है समझ के परे है !

  10. डा. अमर कुमार Says:


    तरूण भाई, भला आप अंतर्यामी तो नहीं ?
    फिर, यह कैसे जाना कि मैं इसपर लिखना तो चाह रहा था..
    पर, एक झिझक थी.. न जाने कौन मेरी हैसियत को ही ललकार दे ?
    आपने मेरी हसरत पूरी कर दी.. पर धन्यवाद नहीं दूँगा, पहले से ही बड़ा औपचारिक है, यह माहौल!

  11. प्रवीण त्रिवेदी-प्राइमरी का मास्टर Says:

    काफी हद तक ठीक कह रहे हैं आप , पर जहाँ तक मैं समझता हूँ , की ब्लॉग्गिंग की दुनिया को भी अपने आप में सार्थक चिंतन करने की जरूरत है , ज्यादातर ब्लॉग्गिंग अभी भी अपने मन की भड़ास निकलने का ही जरिए ही बनी हुई है ……/
    वैसे भी मैं चूकि उन 10-12 ब्लोग्गेर्स में नहीं आता हूँ ….. इसलिए मेरी बातों को अन्य सन्दर्भों में न देखा जाए!!!

    शायद इसी चिंतन से कुछ आगे की राह निकले !!

    और अब चलिए !! मेरी मदद करने …..

  12. Gagan Sharma Says:

    विज्ञान ने एक खिलौना पकड़ा दिया है, उससे सब अपने-अपने अंदाज में खेल रहे हैं। परिपक्वता या गंभीरता जैसी कोई बात सभी जगह नहीं है। रही-सही कसर फिल्म जगत के लोगों ने पूरी कर दी है, जिन्होंने इसे अपने प्रचार का माध्यम बना लिया है। लोगों को लगता है कि हम सितारे के रुबरु हैं। अभी कहीं पढा कि आमिर खान ने अपने ब्लाग पर एक लाईन में बकरीद की बधाई दी और उस पर 1265 टिप्पणीयां भेजी गयीं।

  13. hempandey Says:

    समाचार पत्रों में प्रकाशित आलेख ब्लोगों के बारे में क्या कहते हैं इसकी चिंता न करते हुए सतत विचारशील ब्लॉग लेखन चलता रहेगा तो एक दिन समाचार पत्रों को भी कायल होना ही पडेगा -
    खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तदबीर से पहले
    खुदा बन्दे से ये पूछे – बता तेरी रजा क्या है.
    वैसे गुटबाजी और पूर्वाग्रह तो साहित्यकारों के क्षेत्र में भी चलती आयी है.

  14. amit Says:

    टेन्शन नहीं लेने का, इस बात पर मैं कुछ समय से विचार प्रकट करने की सोच रहा हूँ, जल्द ही विचारों को पिरोकर कंठहार प्रस्तुत करूँगा! ;)

  15. अनूप शुक्ल Says:

    अच्छा कहा। वैसे रवीश कुमार हिंदुस्तान में जब जिक्र करते हैं तो लगभग हमेशा नये/अलग ब्लागर्स का जिक्र करते हैं जो दस-बारह चर्चित में नहीं आते।

  16. Tarun Says:

    @अनुप जी, इसलिये पहले ही १-२ को छोड़कर कह दिया है, वेब दुनिया में भी ऐसे ही अलग अलग ब्लोगर्स का जिक्र होता है। बात उन लेखों की हो रही है जो ब्लोगिंग की खबर की तरह प्रस्तुत किये जाते हैं और जिनमें चंद लाईनों में ही सबकुछ समेटने की कोशिश की जाती है। ;)

  17. sareetha Says:

    ब्लॉग जगत ही क्या दुनिया भर में गुटबाज़ी का राज कायम है । लेकिन इससे क्या ? ये कोई इलेक्ट्रानिक मीडिया नहीं है ,जो ’जो दिखेगा वो बिकेगा” की तर्ज़ पर हर किसी को पापुलर बना दे राखी सावंतों और मोनिका बेदियों की तरह । अखबार में एक दिन छपने से क्या बनने बिगडने वाला है ।

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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