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[इस सीरिज में हिंदी के कुछ ऐसे ब्लोगरस (या ब्लोग) की बात करेंगे जो मुझे पसंद हैं, इनमें से कुछ साथ चलते चलते कब दोस्त बन गये पता ही नही चला। इस सफर के लिये इस गीत की चंद लाईने बहुत उपयुक्त हैं - "आते जाते खुबसूरत आवारा सड़कों पे, कभी कभी इत्तेफाक से, कितने अंजान लोग मिल जाते हैं, उनमें से कुछ लोग भूल जाते हैं, कुछ याद रह जाते हैं"। इनके बारे में बात करने का कोई क्रम नही है, जिसके बारे में सबसे पहले बात करेंगे वो उतना ही पसंद है जितना कि वो जिसे सबसे अंत में आपसे मिलवायेंगे। ये वो ब्लोग हैं जिन्हें मैं अक्सर पढ़ते रहता हूँ, पसंद करता हूँ लेकिन इसका ये मतलब नही कि मैं सिर्फ तारीफ ही करूँगा हो सकता है वो भी कह दूँ जो बात इनमें नापसंद हों।]

मेरा पन्ना वाले जीतूः जीतेन्द्र चौधरी शायद नाम ही काफी है क्योंकि अधिकांश हिंदी ब्लोगरस उन्हें पहले से ही जानते हैं। एक जमाना था जब जीतू भाई हर नये ब्लोगरस से सिर्फ एक ईमेल की दूरी भर रहते थे। आज भी रहते हैं बस वो खुद ये कहते नहीं। आज से लगभग पांच साल पहले मैंने जब हिंदी में लिखना शुरू किया था तो जो सबसे पहली हिंदी ब्लोगर की टिप्पणी आयी थी वो जितेन्द्र की ही थी। वही जितेन्द्र कब जीतू हो गये पता ही नही चला, नारद काल में तो जीतू और नारद एक दूसरे के पर्यायवाची भी हो गये थे। आजकल नारद ने थोड़ा बैकफुट ले लिया और जीतू भी कम दिखायी पड़ते हैं।

हमने एक बार उनके साथ अनमोल वचन वाला प्रोजेक्ट भी शुरू किया था, फिर फोटो ब्लोग प्रतिबिम्ब लेकिन आज के दिन दोनों में विरानी है। ये शायद अकेले हिंदी ब्लोगर हैं जिनकी खुद के बारे में बनायी लिस्ट सबसे लंबी ही नही है बल्कि पब्लिक के लिये ओपन भी है।

फुरसतिया माने अनुप शुक्लः ये दूसरे कानपुरिया हैं जिनका लिखा तो पसंद है ही लेकिन ये खुद भी मासाअल्लाह किसी से कम नही। जैसे जीतू नारद के पर्याय थे वैसे ही अनुपजी चिट्ठाचर्चा के पर्याय और आज भी हैं। फुरसतिया के लेखन की सबसे विशेष बात ये है कि उन्हें पढ़कर लगता है काफी फुरसत में लिखे गये हैं, आजकल इनकी पोस्ट का साईज थोड़ा छोटा हो गया है वरना तो पहले इन्हें पढने के लिये खुद भी फुरसतिया होना पड़ता था।

पहली हिंदी ब्लॉगजीन निरंतर में इनका भी सवाल जवाबों का मजेदार कॉलम हुआ करता था। कविता बनाने में इनका कोई सानी नही है, जी हाँ ये कविता लिखते नही बनाते हैं और वो भी चंद समय में, पोस्ट लिखते लिखते जब लगता है इसकी लंबाई कम हो रही है तो तुरत बना डालते हैं, कभी खुद से तो कभी कहीं और से बना माल चेप मारते हैं। आज के दौर में जब अपने खुद के लिखे किसी लेख का लिंक नही मिलता या याद नही होता ये ज्यादातर लिंक कहाँ से ढूँढ लाते हैं, ये गुढ़ रिसर्च का विषय है। इनकी वन लाईना वो ही मजे देती है जैसे खाने में तड़का।

जवानी के दिनों में इन्होंने साइकिल बड़ी दौड़ायी है, अब जवानी ढलने सी लगी है लेकिन दौड़ाने का शौक अभी तक बरकरार है इसलिये आजकल चिट्ठाकारों को चिट्ठाचर्चा के मंच तक दौड़ा लाते हैं। स्वयंभु फुरसतिया का फुरसत का अंदाजेबयाँ ये है - हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै। लेकिन बकौल कल्लू पहलवान वो औरों से कहते फिरते हैं - मुझसे बोलो तो प्यार से बोलो

ये सिलसिला आगे जारी रहेगा और मिलवायेंगे अपनी पसंद के ३ और ब्लोगरस से…

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