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स्लमडॉग ऐसी फिल्म नही जिस पर इतनी ज्यादा क्रिया प्रतिक्रिया की जाये, कुछ इसे फिल्म से हटकर सोचते हैं और वहाँ पर सवाल या समस्या उठ खड़ा होता है। अब सवाल ये है कि समस्या स्लम से है या डॉग से या उसे मिलेनियर बनाने वाले से?

समस्या स्लम से तो होनी नही चाहिये क्योंकि वो तो हमारा अभिन्न हिस्सा है, हर शहर में ये छोटे बड़े रूप में मिल ही जाता है। समस्या डॉग से भी नही होनी चाहिये क्योंकि आदमी का सबसे प्यारा जानवर वो ही है और उसकी वफादारी का तो तोड़ ढूँढे नही मिलता। तो अब बचा वो जिसने उसे मिलेनियर बनाया, दुर्भाग्य से वो ब्रिटिश है सो सारी जूतियाँ उसी के सिर। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि क्या वो वाकई में इतनी जूतियों का हकदार है, सिनेमा की नजर से देखें तो बिल्कुल नही, उसने अपना काम बखूबी निभाया है। इस फिल्म की तारीफ सिर्फ चार बातों का नतीजा है - बेहतर निर्देशन, पटकथा, संगीत और स्लम (डॉग)।

आज हम (लोग) जिस बात (भारत की गलत छवि) के लिये हल्ला मचा रहे हैं उसके जिम्मेदार कुछ हद तक हमारे फिल्मकार भी हैं जिन्हें हम बालीवुड कहते हैं ना कि सिर्फ हालीवुड। क्योंकि बालीवुड ने खुद भारत कि ये छवि बनायी है, ये हमारे फिल्मकार ही हैं जो हर अच्छी, खुबसूरत जगह दिखाने के लिये विदेश चले जाते हैं, यूरोप, अमेरिका व अन्य स्थल के सुन्दर स्थानों को फिल्मों में दिखाते हैं। भारत में शूटिंग का नंबर तब ही आता है जब तंग गलियाँ दिखानी हो या स्लम। जाहिर है इससे हालीवुड को यही संदेश जायेगा ना कि अगर गरीबी या खुबसूरती का उलट दिखाना है तो बालीवुड के देश जाओ।

अपनी फिल्मों (खासकर जौहर, चोपड़ा) के एन आर आई तो गरीब होते ही नही है जबकि हकीकत में ऐसा होता नही है। टीवी सीरियल में सजे धजे, गहने डाले लोगों को बिस्तर में सोते देखने की इतनी आदत हो गयी है कि अगर कोई हमें फिर से वो बदबूदार जगह दिखा दे जो कहीं से भी रहने लायक नही है तो हमें कहना पड़ता है कि भैय्या हमें मालूम ही हमारी चड्डी फटी है लेकिन तुम उसे क्यों दिखा रहे हो।

याद है १९८० का दशक जब आर्ट फिल्में बना करती थी, आज के कुछ नामी कलाकार मसलन ओमपूरी, शबाना, नसीर और कुछ निर्देशक उन्हीं फिल्मों की देन हैं। लेकिन उन फिल्म में होता क्या था समाज के ऐसे ही तबके की कहानी। बस इसी में थोड़ा फर्क आ गया है, अपने लोग कमर्शियल फिल्मों की तरफ मुड़ गये और बाहर से आकर लोगों ने उसी तबके को कमर्शियल सांचे में ढाल सबको दिखा दिया और लगे हम उसे गलियाने।

गरीबी और गरीब दूसरे देशों में भी है लेकिन क्या हमारे फिल्मकार वो शुट कर हमें दिखायेंगे? एक गरीब भारत की तस्वीर खिंचने बाहर से विदेशी इसीलिये आते हैं क्योंकि हमने भारत की ऐसी तस्वीर उनके सामने रखी है, क्योंकि हमने भारत के शहरों को ऐसा बना के रखा है। फिर इसके लिये उन्हें दोष देना अपनी ही गल्तियों को छुपाने जैसा है। विदेशी ही क्यों विदेश में जा बसे भारतीय फिल्म मेकर भी तो भारत से जुड़े ऐसे ही विषय तलाशते रहते हैं अपनी फिल्म बनाने को, याद है सलाम बाम्बे, उसकी कहानी भी कुछ इसी तबके पर थी ना।

बजाय मिलेनियर बनाने वाले को गरियाने के अगर हम स्लम बनाने वालों को गरियाते तो शायद ज्यादा बेहतर होता। तारे जमीं पर आस्कर में जाती है लेकिन उस पर मीडिया द्वारा उतने लेख नही लिखे जाते जितना एक अभारतीय फिल्म के ऊपर (भले ही स्लम हमारा हो लेकिन ये मानी तो ब्रिटेन की फिल्म जाती है)। तो जाहिर है वो ही चीज बिकेगी इस ग्लोबल दुनिया में जिसका विज्ञापन जितना ज्यादा हो।

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