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स्लमडॉग मिलेनियर को अभी तक हाल में ही संपन्न हुए गोल्डन ग्लोब समेत काफी पुरस्कार मिल चुके हैं। स्लमडॉग मिलेनियर की कहानी एक भारतीय विकास स्वरूप के द्वारा लिखी किताब (Q & A) पर आधारित है।

स्लमडॉग मिलेनियर की कहानी स्लम में अपने भाई सलीम के साथ रह रहे एक लड़के जमाल मलिक के इर्दगिर्द घूमती है। फिर एक दिन हिंदू मुस्लिम दंगे हो जाते हैं जिसमें इन बच्चों के सिर से माँ का साया उठ जाता है और ये अपनी जान बचाने के लिये स्लम से भाग उठते हैं। ऐसे में बारिश से बचने के लिये जब ये दोनों एक शेल्टर में रूकते हैं तो इन्हें मिलती है एक लड़की लतिका।

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कहानी आगे बढ़ती है और जमाल (Dev Patel) स्लम से निकल एक कॉल सेंटर में चाय पिलाने का काम करने लगता है, जिसे सब ‘चायवाला‘ कहते हैं। फिर एक दिन वो कौन बनेगा करोड़पित में भाग लेता है और जीत जाता है।

यही है कहानी इस फिल्म की, सीधी सरल साधारण सी लग रही है ना कहानी, शायद ऐसा हो लेकिन इस कहानी को जितने बेहतरीन तरीके से Simon Beaufoy ने स्क्रिप्ट किया है उतना ही कमाल का निर्देशन है Danny Boyle का और ये दर्शकों को सीट से हिलने नही देता। इसलिये मुझे कोई आश्चर्य नही हुआ जब इन दोनों को गोल्डन ग्लोब दिया गया।

फिल्म की शुरूआत होती है एक कमरे से जहाँ जमाल के ऊपर थर्ड डिग्री का ईस्तेमाल हो रहा था और पहला डायलॉग सुनायी देता है एक देसी गाली, कांस्टेबल सौरभ शुक्ला के मुँह से ये प्यारे से बोल फुटते हैं। उसके बाद होती है पुलिस इंस्पेक्टर (ईरफान) की एंट्री और कहानी फ्लैशबैक में पहुँच जाती है, क्लाईमेक्स से जरा पहले ही कहानी वर्तमान समय में वापस आती है।

पुलिस यही जानना चाहती है कि कैसे एक चायवाला जिसने अपना बचपन एक स्लम में गुजारा हो कौन बनेगा करोड़पति में जीत के इतने करीब पहुँच सकता है। जानना चाहती है कैसे उसको उन सारे सवालों का जवाब मालूम है जो सीरियल का एंकर प्रेम कुमार (अनिल कपूर) पूछता है। वास्तव में ये प्रेम कुमार ही होता है जो जलन के मारे उसे पुलिस तक पहुँचा देता है। फिर पुलिस स्टेशन में जमाल अपनी कहानी सुनाता है, वो अपने लाईफ के उन हिस्सों के किस्से बयान करता है जहाँ से उसको कौन बनेगा करोड़पति से जुड़े सवालों के जवाब मालूम चलते हैं। सिवाय अंतिम सवाल के जिसका जवाब वो तुक्के से देता है बावजूद इसके कि वो सवाल से संबन्धित घटना भी उसके जीवन में घटी होती है। मुझे इस फिल्म की स्क्रिप्ट में सवालों के जवाब बताने का यही तरीका सबसे ज्यादा पसंद आया।

फिल्म में जवान लतिका का किरदार निभाया Freida Pinto ने, इस फिल्म में महेश मांजरेकर का भी एक रोल है, वो स्लम के माफिया डॉन जावेद के किरदार में हैं। एक बहुत छोटे से किरदार में राज जुत्शी भी नजर आते हैं। फिल्म का अंत होता है रेलवे स्टेशन में जहाँ अन्य आम फिल्मों की तरह ही बचपन के प्रेमियों का अंततः मिलन होता है, उसके बाद ही कास्टिंग शुरू होती है साथ ही ए आर रहमान द्वारा संगीतबद्ध गीत ‘जय हो’ पर जमाल और लतिका अन्य लोगों के साथ थिरकते नजर आते हैं। गीत गुलजार ने लिखा है और संगीत के लिहाज से काफी अच्छा एनर्जी से भरपूर बन पड़ा है शायद यही वजह है जिसने रहमान को इसके लिये ओरिजिनल स्कोर का गोल्डन ग्लोब दिलाया।

फिल्म अच्छी है, शायद बहुत अच्छी लेकिन फिर भी मैं इसके गोल्डन ग्लोब में बेस्ट मूवी के खिताब मिलने पर कुछ नही कहूँगा। लेकिन एक बात तो पक्की है कि हॉलोकास्ट और गरीबी (और गरीब लोग) पश्चिमी दुनिया के लोगों का सबसे पसंदीदा विषय है और इसमें फिल्म बनाने से फिल्म को पुरस्कार की दौड़ में काफी एडवांटेज पहुँचता है।

फिल्म से जुड़ी अन्य बातों में, लवलीन टंडन ने कास्टिंग डायरेक्टर से इस फिल्म में शुरूआत की लेकिन डायरेक्टर को दिये सुझावों ने उनको फिल्म का सहायक डायरेक्टर बना दिया।

अंत में फिल्म का एक सीन याद आ रहा है जो एक मुस्कान चेहरे पर का देता है। अपने बचपने में स्लम से निकलते ही गलतफहमी के चलते जमाल को टूरिस्ट आगरा के ताज महल का गाईड समझने लगते हैं। एक दिन एक विदेशी जोड़ा घूमने आता है और जमाल को ताज महल घूमाने के लिये कहता है। इतिहास की जानकारी ना होने के बावजूद जमाल ताजमहल की कहानी का अपना ही वर्जन सुनाने लगता है। एक जगह वो कहता है कि जब दुर्घटना में मुमताज की मृत्यु हो जाती है तो शहजादा खुर्रम उसके लिये ये कब्रगाह बनाता है। ये सुनते ही विदेशी जोड़ा कहता है लेकिन इन पेपरस में तो लिखा है कि उसकी मृत्यु बच्चे को जन्म देते हुई। जमाल तुरंत जवाब देता है कि हाँ ये सही है, जब मुमताज को बच्चे की डिलीवरी के लिये अस्पताल ले जाया जा रहा था तभी रास्ते में दुर्घटना के दौरान उसकी मृत्यु हुई।

भारत में ये फिल्म शायद इस सप्ताहंत रीलिज होने वाली है, मेरी नजर में वाकई में A MUST WATCH Film.

मेरा वोट मेरी राय: ****

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