< Browse > Home / मस्‍ती-मजा, व्यंग्य / Blog article: अगर तुम ना होते

| Mobile | RSS

अगर तुम ना होते

मैं इस नाम की फिल्‍म की बात नहीं करने जा रहा बल्‍िक एक काल्‍पनिक लेख की बात कर रहा हूँ। धार्मिक भावना वाले व्‍यक्‍ति को हो सकता है इसे पढ़ के ठेस पँहुचे (जिसका मेरा कतई इरादा नही है), इसलिये गुजारिश है कि वो इसे या तो ना पढें और या फिर निठल्‍ला चिंतन समझ पढ़ने के बाद भूल जायें।

ना जाने ये कलयुग का असर था या राक्षस योनि में जन्‍म लेने का असर, बार-बार पृथ्‍वीवासियों द्वारा अपने को ‘घर का भेदी’ कहे जाने से क्षुब्‍ध हो एक दिन विभीषण राम के पास गुस्‍से में पहुँच गये। पहुँचते ही जैसे विभीषण ने बोलना शुरू किया कि पास में खड़े लक्ष्‍मण की भौंह हमेशा कि तरह टेढ़ी हो गयी, ये क्‍या तमीज हुई ना दुआ ना सलाम, प्रभु की इतनी बेइज्‍जती। राम ने उन्‍हें शांत कर विभीषण से उनके आने का कारण पूछा।

प्रभु बार-बार अपने को ‘घर का भेदी’ कहा जाता हुआ अब नही सुना जाता। आप ही बतायें कुभंकरण ने भी तो रावण को कहा था सीता मैय्‍या को लौटा देने को, रावण के नहीं मान ने पर आपके खिलाफ लढ, मृत्‍यु को प्राप्‍त कर शांति पाली। और मैं जिसने रावण के खिलाफ जाकर आपकी मदद की उसे अपमान के इस घुंट से रोज रोज मरना पड़ता है, अन्‍याय के खिलाफ जाने का क्‍या ये ही फल है। वहाँ देखिये जरा, अफगानिस्‍तान और इराक तो इस तरह से घर के भेदियों से भरा पड़ा है, लेकिन उन्‍हें तो सिर्फ शाबासियां मिल रही हैं। उन देश के शासनों ने तो सीता मैय्‍या को उठाने जैसा कोई अपराध भी नहीं किया।

आप ही बताओ हनुमान जी की पुँछ में आग लगवाने वाले प्‍लान की भूमिका किसने रखी थी, और सारी वाही वाही हनुमान ले गये। वो तो शुक्र मनाईये कि उन्‍हें सीता मैय्‍या मिल गयीं नही तो कहीं संजीवनी पर्वत की तरह, पूरी लंका ही उठा लाते कि ‘लो प्रभु ये रही लंका ढूंढ लो इसमें सीता मैय्‍या कहाँ है’। भला बताईये आप का क्‍या इतना गुणगान होता, सुमेर वैध का पता नहीं बताता तो कहानी वहीं खत्‍म थी। अगर मैं रावण की नाभि का भेद नहीं बताता तो आप अभी तक रावण के सर काट रहे होते, और वह नामाकुल राक्षसी हँसता रहता और उसके सिर जुड़ते रहते। ना कभी रावण मरता, ना आपका कहीं मंदिर बनता और ना ही इन पृथ्‍वी वासियों को दशहरे की छुट्टियां मिलती जो हर बार ‘घर का भेदी लंका ढाये’ कहते रहते।

जहाँ देखिये आपके ही मंदिर हैं, आपकी ही जय-जयकार है, यहाँ तक की आपके नाम को लेकर सरकारें बन रहीं हैं, गिर रहीं हैं। लेकिन उन बेचारे भरत की कहीं कोई चर्चा नहीं। अगर वो अयोध्‍या में गद्‍दी संभाल राज करने लग जाते और आपको नही लौटाते तो आप क्‍या करते, ज्‍यादा से ज्‍यादा लंका के ही राजा बनते ना। आपके मंदिर वहाँ बनते, दशहरे की छुट्टियां वहाँ होती। आखिर क्‍यों आपको मर्यादा पुरूषोत्तम कहतें हैं, आपने सिर्फ पुत्र की ही मर्यादा तो निभाई, पति और पिता की मर्यादा निभाने में तो आप से भी चुक हो गयी – सीता मैय्‍या को अग्‍नि परीक्षा देने को कहा, एक साधारण से धोबी के कहने पर गर्भावस्‍था में, सीता मैय्‍या के अग्‍नि परीक्षा देने के बावजूद घर से निकाल दिया।

विभीषण जो मन में आया बोले जा रहे थे, लक्ष्‍मण आखिर तेश में आ ही गये और बोले – ऐ विभीषण! संभल के बात कर, सूर्पनखा की नाक काटी थी तुम्‍हारी जबान छीन ली जायेगी। तुम यहाँ अपने अपमान का रोना रोने आये हो या राम भैय्‍या को अपमानित करने। लक्ष्‍मण के क्रोध से वाकिफ विभीषण जल्‍दी से हाथ जोड़ बोले क्षमा प्रभु क्षमा! अपमान के दंश ने मेरी बुद्वि हर ली।

मुस्‍कुरा के प्रभु बोले, ‘मानव का स्‍वभाव ही ऐसा है, विभीषण। तुम ही बताओ जिस मानव ने सीता को नहीं छोड़ा और उस तुच्‍छ मानव के कहने पर मुझे सीता को निकालके अपने लिये कंलक लेना पड़ा वो भला तुम्‍हारी कहाँ से कद्र करेगा। तुम तो वैसे भी उनके लिये दूसरे देश के वासी हो। और जो कुछ भी हुआ वह सब तो पहले ही लिखा गया था, मैं मानता हूँ मानव का मन पड़ने में जरा थोड़ी भूल हो गयी और दो-चार ऐसी बातें हो गयीं जो नहीं होनी चाहिये थी। लेकिन अब तो कुछ नहीं हो सकता इसलिये इतना ही कह सकता हूँ -

राम अभी भी रावण से लड़ रहे होते,
रावण के भाई विभीषण, अगर तुम ना होते।

अपनी महत्ता प्रभु के मुँह से सुन विभीषण की छाती थोड़ा चौड़ी हो गयी वो खुशी-खुशी राम को प्रणाम कर अपने निवास की ओर प्रस्‍थान कर गये।

विभीषण के जाते ही लक्ष्‍मण बोले, ये क्‍या इतनी बातें सुनकर भी आप तनिक गुस्‍सा नहीं किये उल्‍टा विभीषण की ही तारीफ कर दी।

प्रिय लक्ष्‍मण एक बात याद रख लो, विभीषण चाहे हमारे युग का हो या इस युग का, जंग जीतने में हमेशा काम आता है। दो देशों के उदाहरण तो वो खुद ही दे गया, विभीषण हो या साधारण मानव अगर उसके अहं को सहलाओगे तो हमेशा तुम्‍हारे काम आयेगा। अगर मैं अभी क्रोध करता, और कल फिर से धरती पर जाना पड़ गया तो हमारी मदद के लिये विभीषण कहाँ से आयेगा। राम की बात सुन लक्ष्‍मण बोले -

समझ गया मैं सब भ्राता, मंदिर में, मैं भी जगह ना पाता।
दशरथ नंदन श्री राम, मेरे बड़े भाई, अगर तुम ना होते।

लक्ष्‍मण के इतना कहते ही दोनों भाई जोर से हँस पड़े और राम सोच रहे थे, चलो लक्ष्‍मण भी दुनियादारी की बातें समझने लगा है, क्यों ना अगली बार अपना और सीते वाला रोल इसके और उर्मिला के लिये लिखवा दूँ।

[ये लेख २२ जनवरी, २००६ को लिखा था, आज फिर से पोस्ट कर रहा हूँ।]

Leave a Reply 1,824 views |
  • No Related Post
Follow Discussion

12 Responses to “अगर तुम ना होते”

  1. ताऊ रामपुरिया Says:

    अगर मैं रावण की नाभि का भेद नहीं बताता तो आप अभी तक रावण के सर काट रहे होते, और वह नामाकुल राक्षसी हँसता रहता और उसके सिर जुड़ते रहते। ना कभी रावण मरता, ना आपका कहीं मंदिर बनता और ना ही इन पृथ्‍वी वासियों को दशहरे की छुट्टियां मिलती जो हर बार ‘घर का भेदी लंका ढाये’ कहते रहते।

    बहुत जोरदार लिखा ! शुभकामनाएं !

  2. संजय बेंगाणी Says:

    जहाँ देखिये आपके ही मंदिर हैं

    कहाँ है मन्दीर?

    अच्छा लिखा है. मजा आया.

  3. dr anurag Says:

    दो साल पहले आप ने किस प्रसंग में लिखा होगा ये तो नही मालूम पर आज इसके कई अर्थ निकलते है

  4. इं. विनय Says:

    बहुत बढ़िया लिखा, ताऊ रामपुरिया आज के हालात देखकर अगुस्से में हैं शायद!

  5. amit Says:

    हम्म, दो वर्ष पूर्व अपन टिप्पणी दिए थे, अब क्या उसे ही दोबारा दे दें? ;) :D

    वैसे जो दो वर्ष पूर्व मैंने कहा था वह है तो सत्य ही, नायकों की ही जयजयकार होती है! :)

    वैसे, श्रीकृष्ण का एक नाम “रणछोड़” भी है लेकिन मैंने कभी नहीं सुना किसी को उन्हें इस नाम से अपमानित करते हुए!! कारण यही है कि उनको ईश्वर का दर्जा मिला हुआ है और ईश्वर का निरादर कोई नहीं करना चाहता। विभीषण चाहे कितने ही सहयोगी रहे हों लेकिन ईश्वर का दर्जा तो नहीं मिला ना। और फिर यह भी है कि जो अपने लोगों का नहीं होता वह किसी का नहीं होता और इसलिए दूसरे भी उसकी कोई कद्र नहीं करते!! :)

  6. ज्ञानदत्त पाण्डेय Says:

    समरथ के नहिं दोस गुसाईं!

  7. Abhishek Ojha Says:

    इस पोस्ट को तो दुबारा ठेलना बनता है… जोरदार !
    हम ये कहाँ से पढ़ पाते अगर तुम ना होते !

  8. डा. अमर कुमार Says:

    सत्य वचन प्रभो..निज सत्तानीति यहि तौ सदा चलि आयी
    हृदयपरिवर्तन होंय, करैं दलबदली सबै, देंय प्रभु की दुहायी

  9. hempandey Says:

    आपका २२-१-२००६ का लिखा और १९-११-२००८ को पुनः पोस्ट किया व्यंग्य लेख आज १०-१-२००९ को पढा और आपकी लेखनी का कायल हो गया. कोशिश करूंगा कि भविष्य में कोई पोस्ट पढने से छूट न जाए.

  10. Tarun Says:

    @हेम दाज्यू, आपको पसंद आया इससे बड़ी और क्या बात हो सकती है, बस मन में जो आता है लिख देता हूँ। आप ऐसे ही आकर उत्साह बढ़ाते रहें, धन्यवाद।

  11. gagansharma Says:

    apne jaise wichar pad kar achhaa to laganaa hi tha.

  12. devendra tripathi Says:

    yaar sabhi ko blog achha hi lagata hai kisi ko kharab nahi lagata,kya baat hai…………
    waise blog achha tha

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

टिप्पणियों का शटर नयी पोस्ट पब्लिश करने के बाद कुछ दिनों ही खुला रहता है। पुरानी पोस्टस में आने वाले स्पॉम टिप्पणियों के मद्देनजर यह निर्णय लेना पड़ा, असुविधा के लिये खेद है। आप को अगर ये ब्लोग और इसमें लिखी पोस्ट पसंद आती हैं तो आप इसे सब्सक्राइब करके भी पढ़ सकते हैं, धन्यवाद।