कुछ बिखरे बिखरे शब्द
आजकल व्यस्तता कुछ ज्यादा ही है वक्त कब मुट्ठी में से रेत की तरह फिसल जाता है पता ही नही चलता। कुछ वैसे ही जैसे कभी-कभी पर्सनल पत्र चर्चा में आ जाते हैं या कब कैसे थूक मुँह से निकल किसी के चेहरे पर आ लगता है या २ साल का कोई बच्चा घर को छोड़ प्ले स्कूल में खेलने पहुँच जाता है। ये बातें अनजाने या अनायास ही होती होंगी। लेकिन हमारी व्यस्तता ना अनजाने है और ना ही अनायास।
आफिस में व्यस्तता छुट्ठी पर जाने से पहले प्रोजेक्ट निपटाने के कारण है तो घर की व्यस्तता उस छोटे से कारण की वजह से है जो तूफानी गति से क्रॉल (Crawl) करने लगी है और आजकल जिसे लड़खड़ाते गिरते पड़ते चलने का शौक लगा हुआ है। अटेंशन लेने के लिये ये कारण कभी भी छोटे छोटे कदमों से सीढ़ियाँ चढ़ने लगता है। यही नही उन छोटे छोटे हाथों से होते हुए छोटी छोटी चीजें कब मुँह की दिशा पकडने लगती है अगर ध्यान ना दो तो पता ही नही चले।
मुझे लैपटॉप पर बैठे देख भोली मासूम-शैतानी सी मुस्कान लिये ये कारण हमेशा ही मेरे लैपटॉप की स्क्रीन पर लटक लेता है, कभी पॉवर कोर्ड निकाल देता है तो कभी की-बोर्ड पर ऐसे मारता है जैसे इसी का खिलौना हो। इसका टीथर घर के किसी कोने पर लावारिस पड़ा अपनी बदनसीबी को जहाँ रो रहा होता है वहीं मेरा आइ-फोन (iPhone) टीथर की शोभा बढ़ा रहा होता है। इससे ज्यादा कुछ नुकसान तो नही होता बस बगैर सोचे लिखी जाने वाली एक चार लाईन की पोस्ट को लिखने में १ घंटा लग जाता है, बा-मुश्किल २-३ ब्लोगस पोस्ट ही पैरा पैरा करके देखी जाती है। मैं भी शब्दों को बिखरा छोड़ इन पलों को पहले समेटना चाहता हूँ और जानकर और सायास व्यस्त हो जाता हूँ।
पिछले २-३ दिनों से इन बिखरे शब्दों को समेटने की कोशिश कर रहा था जो आज जा कर इकट्ठे हो पायें हैं। और भी कई शब्द बिखरे पड़े हैं, कुछ ब्लोगिंग नही करने देने की धमकी को लेकर टूटे पड़े हैं तो कुछ थूके जाने की वजह से लिसड़े पड़े हैं। बस कुछ अक्षर हैं जो बच्चों के किसी प्ले स्कूल में करीने से सजे खिलौनों से पड़े हैं और बिखरने को बेताब रहते हैं यही सोचकर कि शायद कल का दिन इन्हीं का हो।
Send to Twitter and Follow me on Twitter











This post has 13 comments
November 12th, 2008
bhai sahab ab kya kahe..aap or hum bhi to isi rah se kabhi nikale the…inhi nanhe munno se to ghar ki shobha hoti hai warna hum jaise log to aajkal ghar ko sirf buri najar se bachane ke liye rakhe jaate hai..
Accha lekha aapne, pad kar chehre par aati mushkan ko rok na paaya.
November 12th, 2008
आप अपने नए पुनर्जन्म का आनंद ले रहे हैं।
November 12th, 2008
पोस्ट जरासी है , पर आनंद आ गया ! मुबारक हो !
November 12th, 2008
मैं भी शब्दों को बिखरा छोड़ इन पलों को पहले समेटना चाहता हूँ
ऐसे बवण्डर का कौन रसिक न होना चाहेगा!
November 12th, 2008
अरे बाबा , आजकल के बच्चे , मत पूछो। जो पाल रहें हैं , वही जान रहे हैं । अच्छा हुआ, हमलोगों ने कुछ दिन पहले पाल लिया। इतने शैतान नहीं होते थे पहले के बच्चे । समझ में नहीं आता , बच्चे ऐसे जन्म ले रहें हें या मां बाप उन्हें ऐसा बना रहे हैं। जो भी हो झेलना तो मां बाप को ही पडता है , दादा दादी भी तो नहीं होते आजकल साथ में बच्चों के।
November 12th, 2008
इन पलों को समेटना अधिक अच्छा है ..अच्छा लगा इस पोस्ट को पढ़ना
November 12th, 2008
इस व्यस्तता और बिखराव का अंत कहाँ है? हाँ कभी ज्यादा कभी कम… !
November 13th, 2008
आज तो आपके भीतर एक बालक मचल रहा है:) किसी बच्चे को खेलते हुए देखिए, उससे ज्यादा कोई व्यस्त मिला हो तो जरूर बताइएगा:)
November 13th, 2008
बहुत मनभावन पोस्ट और वैसे ही शरारतीनन्हे राजकुमार के लिये आशिष
आप इन लम्होँ को सँजो रखिये ..बहुत खूब लिखा है तरुण भाई
स स्नेह,
–लावण्या
November 13th, 2008
सुंदर। व्यस्त रहे, मस्त रहें।
November 13th, 2008
बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति है. इन अनमोल पलों को वाकई संजो कर रखने की है. अबोध शैतानी के तस्वीरें या वीडियो लेते जाइए. बाद में आप को पछताना पड़ सकता है.
November 14th, 2008
Aur alagse kya likhun…in sabheeke saath sehmat hun ! Kabhi merebhee blogpe aayiyega !
November 18th, 2008
अति सुंदर
बधाईयाँ
Add a comment