उसको जब नंगा कर दिवार पर लटकाया था
चोखेरबाली की पोस्ट ‘शर्मनाक हादसा’ पर जाकर देखा तब इस खबर का पता चला, खबर से ज्यादा ताज्जुब इस बात पर हुआ कि उस पर इतनी प्रतिक्रिया नही देखने को मिली जितनी होनी चाहिये थी। कई बार ना जाने मुझे ऐसा क्यों लगता है कि हिंदी ब्लोगरस को देखकर कहूँ, ‘जब रोम जल रहा था निरो चैन की बंसी बजा रहा था‘।
आज ही जो दूसरी पोस्ट देखी थी उसमें अभय को अचंभा हो रहा था व्हाइट टाईगर को मिले बुकर पुरस्कार पर, अभय अनुभवी हैं उन्हें होना तो नही चाहिये था। बात चाहे पुरस्कार की हो या जरूरी पोस्टस के ऊपर जरूरी प्रतिक्रिया की दोनों में ही लॉबी का बड़ा हाथ होता है। हिंदी ब्लोगरस को ये मानसिकता बदल देनी चाहिये कि अरे ये तो मुझे नही पढ़ता (या टिप्पणी नही करता) मैं फिर क्यूँ इसे पढूँ (या टिप्पणी करूँ)। हिंदी ब्लोगरस को समर्पित है गालिब का ये शेर - रगों में दौड़ते रहने के हम नही कायल, जब आंख से ही ना टपका तो ये लहू क्या है।
खैर वापस खबर पोस्ट की तरफ आते हैं, बात करते हैं उस देश की जिसे हम लोग भारत कहते हैं। कहते हैं असली भारत गाँवों में बसता है और ये वो ही गाँव हैं जहाँ से यदा कदा इस तरह की खबरें आती हैं। जहाँ सरपंच व अन्य खुलेआम कानून और पुलिस का मखौल बना इस तरह का तमाशा करते हैं।
शायद मैं ओवर रियेक्ट कर रहा हूँ, बात इतनी बड़ी तो नही। लीजिये पहले मेरी लिखी इस घटिया कविता का पाठ करते हैं फिर जाकर अपने-अपने घर के मंदिर में देवी की पूजा अर्चना कर उससे आशीर्वाद की उम्मीद करते हैं।
दृश्य १: कुछ सालों पहले
उसको जब नंगा करके दिवार पर लटकाया था
सारे शहरों में उस रोज एक जलजला सा आया था।
क्योंकि
वो दुर्गा थी, वो प्रतिमा थी
वो आस्था थी, वो विश्वास थी
धर्म के प्रति लोगों की श्रद्धा का ऐहसास थी।दृश्य २: अक्सर और कुछ एक दिन पहले
आज फिर एक गाँव में उसे नंगा करके घुमाया था
लोगों का झुंड तमाशबीन बन उसे देखने आया था।
क्योंकि
ना वो दुर्गा थी, ना कोई प्रतिमा थी
ना आस्था और ना ही विश्वास थी
औरत के प्रति मर्दों की लोलुपता का ऐहसास थी।




सामाज का एक घृणित चेहरा
सही कह रहे हैं आप,ये घातक है समाज के लिये
हिंदी ब्लोगरस को देखकर कहूँ, ‘जब रोम जल रहा था निरो चैन की बंसी बजा रहा था‘।
आप बिल्कुल सही कह रहे हैं . हिन्दी ब्लोगिंग की अब यही छवि बनती जा रही हैं . हिन्दी ब्लोगिंग केवल और केवल एक स्माइली बन कर रह गयी हैं और सब महान ब्लोग्गेर्स खुश हैं इस रूप से तो बदलाव की उम्मीद बेकार हैं . केवल और केवल एक दुसरे की टांग खिचाई और हर सही मुद्दे को इग्नोर कर के जाने दो . आप की बात की पुष्टि इस ब्लॉग पोस्ट मे हो रही हैं .
स्माइली ही संदेश है
हिन्दी ब्लोगिंग मे लोग केवल अपने हास्य कहे तो हास्य वरना हास्यपद बातो की पोस्ट लिखते हैं . थीम ब्लोग्स को पुरी तरह इग्नोर किया जाता हैं .
सत्य कह रहे हैं आप !
आपने बहुत सही लिखा है । आपका लेख पढ़कर ही चोखेरबाली पर गई ।
घुघूती बासूती
आपसे सौ प्रतिशत सहमत हूँ। मुझे लगता है अच्छी चीजें ब्लॉग पर आए, विचार के तहत या हास्य के तहत, पढ़ी जानी चाहिए, चाहे टिप्पणी उसपर आए ना आए। रचना जी की बातों में भी सच्चाई है। मैं किसी थीम ब्लॉग पर जाता हूँ तो दो बातें होती हैं, या तो जवाब देता हूँ या ये सोचते हुए जवाबदेही से बचता हूँ कि इतनी परेशानी के बाद घर लौटा हूँ और क्या ब्लॉग पर भी ये खतरा उठाऊँ। हल्के-फुलके मसले पर कहना आसान है, पर बड़े मसले पर कुछ कहना बहुत मुश्किल। मैं मानता हूँ कि पढ़ा-लिखा तबका यूँ ही ज्वलंत मुद्दों से बचता रहा तो एक दिन अपना घर जल रहा होगा और हम मामूली मुद्दों पर हॅसी-ठहक्का कर रहे होंगे।
आपकी कविता ने ही पूरी व्यथा बयान कर दी है। बहुत अच्छा लिखा है।
सही कहा। हिन्दी ब्लॉगर गम्भीर विषयों को नजरअंदाज करते है। शायद हम अभी भी डिमांड एंड सप्लाई मे उलझे हुए है।
किसी खबर को लोग किस तरह लेते हैं यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि उसे पेश कौन करता है! कैसे किया जाता है! प्रतिक्रिया में भी यही होता है। आदमी ब्लागर होकर बदल नहीं जाता है। यह केवल अभिव्यक्ति का माध्यम है भैये! कोई जादू की छ्ड़ी नहीं कि लोगों का स्वभाव बदल दे। पंजाब में जिस महिला के साथ यह घटना हुई वह शर्मनाक है। यह एक उदाहरण है कि जब देश में एक तरफ़ लिव इन रिलेशनशिप की बात हो रही है उसी समय एक गांव में एक औरत को नंगा घुमाया जाता है। इस कोलाजी पोस्ट में सबसे छोटे पैरा में नीरो की बात हुई, दूसरे में गालिब आये , इसके बाद गांव की बात के बाद दो सीन आये। सब मजेदार टाइप। यह खिचड़ी पोस्ट है। गांव में नंगी घुमाई औरत के प्रति इसमें चिंता का स्तर अकबर इलाहाबादी के शब्दों में रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ। वाला है। जहां खबर छपी वहां भी केवल अंग्रेजी के अखबार की खबर का लिंक देकर कितनी घृणित घटना है यह, कारण कुछ भी हो, यह हक किसने दिया सरपंच को? इसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है। कोई भी महिला अपने घर मे क्या करती है किसे बुलाती है, इस का निर्णय सिर्फ़ वही कर सकती है और कोई नही, और इसमे उसका इतना अपमान ! शर्म से सर झुक जाता है देख कर, और यह पहली बार नही हुआ है, नियमित रूप से ऐसी घटना कही न कही होती रहती है, हम सब कुछ दिन कहते हैं और बात ख़तम, इसके लिए हमें एक संस्था बनानी चाहिए, हर शहर मे जो उन महिलाओं को सहायता दे सके क्योंकि बाकी समाज और पुलिस तो कुछ करते नही हैं समय पर. लिख दिया गया। अगर लिंक न खुले कहीं तो किसी को क्या समझ आयेगा माजरा क्या है?
अपनी बात अगर आपको दूसरों तक पहुंचानी है तो उसका सलीका भी सीखना होगा। आपकी बात सही है केवल इतने मात्र से आपकी बात दूसरे के कलेजे में नहीं उतर जायेगी। आपकी प्रस्तुति , आपकी मंशा और आपका लोगों के साथ व्यवहार कैसा है इस पर आपकी बात की संप्रेषणीयता निर्भर करती है।
तरूण की इस बात से सहमत हूं कि सार्थक प्रतिक्रियायें होनी चाहिये बिना यह देखे कि अगला आपके यहां आया कि नहीं!
यह टिप्पणी मेरे अपने विचार हैं। तरुण की खिलाफ़त नहीं! अच्छा लगा कि तरुण ने यह पोस्ट लिखी!
अपनी बात अगर आपको दूसरों तक पहुंचानी है तो उसका सलीका भी सीखना होगा। आपकी बात सही है केवल इतने मात्र से आपकी बात दूसरे के कलेजे में नहीं उतर जायेगी। आपकी प्रस्तुति , आपकी मंशा और आपका लोगों के साथ व्यवहार कैसा है
@अनुपजी, आपकी बात से पूरी तरह सहमत लेकिन जिनको ये सब आता है उनमें से एक ने भी ऐसा लिखा हो मेरे पढ१ने में नही आया या इस तरह के विषय में सीरियसली लिखते हों, सलीके वाले ज्यादातर लोग रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ स्टाईल में ही लिखते हैं। आधे से ज्यादा लोग तो ब्लोगर ही इसीलिये बने हैं कि उन्हें ये सब नही आता। चोखेरबाली के लिये आपकी बात से सहमत क्योंकि वहाँ काफी पोस्ट ऐसे ही ठेली जाती हैं सिर्फ लिंक थमा कर।
जहाँ तक चिंता की बात है मुझे लगता है कविता बहुत कुछ कह देती है। नीरो गालिब इसीलिये आये क्योंकि ये यहाँ सही बैठते थे, और ये भी जरूरी नही कि किसी बात को रखने के लिये फुरसतिया स्टाईल में ही लिखा जाय।
यहाँ हर कोई किसी ना किसी को गुरू या चेला बना रहा है तो सोच रहे हैं कि व्यवहार सीखने के लिये हम भी किसी को अपना गुरू बना लें।
अब भी उस सरपँच को किसीने दँड क्यूँ नहीँ दिया ?
आपने पोस्ट लिखी ये अच्छा किया –
उस स्त्री के साथ जो हुआ
वह बहुत बहुत बुरा हुआ ! :-((
- लावण्या
मामला ईश्टाइल का नहीं है जी। बात का है। आपकी चिंता जायज है लेकिन बाकी चीजों के साथ मिलकर उसका मतलब अपने हिसाब से हो जायेगा। और कोई गुरू न मिलने वाले। चेले बनाओ, प्रभु के गुन गाओ!
लीजिये आप बात की बात कर रहे हैं, उस लिव-इन रिलेसनशिप पर जो अभी कानून नही बना जनता पोस्ट पे पोस्ट ठेले जा रही है और जहाँ कानून की धज्जियाँ ऐसे बिखर रही हों वहाँ कोई बात नही। आइन्दा ध्यान रखेंगे ज्यादा चीजें ना मिले पता लग गया है पढ़ने वालों का हाजमा ज्यादा मजबूत नही।
अच्छा बाकि सबको दबाकर गुरू मिल रहे हैं, हमारे लिये ही गुरू नही
@थीम ब्लोग्स को पुरी तरह इग्नोर किया जाता हैं
इस के कारणो के लिये क्या कभी ’थीम ब्लौग्स’ नें अपने आप से सवाल कर के देखा है ?
क्या उन्होनें अपने सक्रिय पाठकों को ’उदासीन’ या ’निश्क्रिय’ होते हुए देख कर कारण जानने की कोशिश की है ?
यदि ’थीम ब्लौग’ जितने पूर्वाग्रहों से लड़ने का प्रयास कर रहे हैं , उस से कहीं अधिक पूर्वाग्रहों का बोझ लिये हों, हर समस्या को अपने ही चश्में से देखने का आग्रह हो और ’मुझ से पूरी तरह सहमत होना’ वार्ता की शर्त सी बन जाये तो ’इग्नोर’ करने का विकल्प ही बचता है ।
तरुण की कविताएं अच्छी लगी ।
हम ’ब्लौगर’ समाज की समस्याएं हल करेंगे , यह भ्रम तो रहने ही दें । हाँ , समस्या का सही विवेचन कर उस के समाधान के लिये सही, स्वस्थ और सार्थक सुझाव भर दे सकें तो उपलब्धि होगी।
@अनुप भागर्व जी,
सबसे पहले शायद आप पहली बार मेरे ब्लोग में आये इसलिये स्वागत और धन्यवाद एक साथ। आप की हर एक बात से सहमत। जहाँ तक थीम ब्लोग का ताल्लुक है मुझे नही लगता उन्हें कोई इग्नोर करता। मेरे सबसे ज्यादा पढ़ने वाले ब्लोगस में मेरे अन्य थीम ब्लोग ही हैं जबकि मैं उनको सबसे कम वक्त देता हूँ, भले ही ब्लोगरस की टिप्पणी इस ब्लोग को ज्यादा मिलती है।
समाज की समस्या के लिये भी आपका कथन सही है, आपको मेरी कविता पसंद आयी एक बार पुनः शुक्रिया, आशा है आप आगे भी ऐसे ही आकर उत्साहवर्धन करते रहेंगे।
अनूप भार्गव जी ने कहा;
“यदि ’थीम ब्लौग’ जितने पूर्वाग्रहों से लड़ने का प्रयास कर रहे हैं , उस से कहीं अधिक पूर्वाग्रहों का बोझ लिये हों, हर समस्या को अपने ही चश्में से देखने का आग्रह हो और ’मुझ से पूरी तरह सहमत होना’ वार्ता की शर्त सी बन जाये तो ’इग्नोर’ करने का विकल्प ही बचता है ।”
बस जी, यही बात मैं भी कहना चाहता हूँ.
ऐसी घटनाएं होती हैं. प्रकाश में लाई जातीं हैं. अखबार में ख़बर भी छपती है. कानून क्या करता है, ये पता नहीं. अब ऐसे में कानून की करतूतों पर, पुलिस की करतूतों पर भी थीम ब्लाग्स बनाने पड़ेंगे. अखबार एक बार ख़बर छाप देने के बाद उसको फालो करता है कि नहीं, ये बात भी देखनी पड़ेगी. हर बात के लिए थीम ब्लाग्स बनाने पड़ेंगे.
जहाँ तक स्माईली लगाकर पोस्ट और टिप्पणियां लिखने की बात है, तो इसमें क्या बुराई है जी? एक ही बात को कहने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं. सभी अपनी तरह से कहेंगे. लेकिन ख़ुद को समझदार और बुद्धिवादी बताकर दूसरों को छोटा कहना कहाँ तक जायज है?
http://linkitmann.blogspot.com/2008/10/blog-post.html
हिन्दी ब्लोगिंग केवल और केवल एक स्माइली बन कर रह गयी हैं
kaa sandarbh yahaan haen daekh lae upar link sahii nahin lagaa haen
ऐसी घटनाएं देश को शर्मसार करती है ओर बतलाती है की किसी स्त्री से बदला लेने का पुरुषों के पास केवल एक वीभत्स रास्ता है ….
पिछले दो दिनों की अनुपस्थिति में फ़िर कोई सार्थक बहस छिड गयी थी ,आपको कल लगा …हमें तो कई बार ऐसा लगा …पर सवाल ये है की आप का नजरिया क्या है ?किसी चीज को देखने का ?आपने कोई त्रासदी देखी आप आहत हुए ,आपने दर्द महसूस किया …..पर आपने लोगो से क्यों अपेक्षाए रखी ….ब्लॉग darasal अपनी अभिव्यक्ति को व्यक्त करने का एक साधन मात्र है….ओर लिखने वाला एक ब्लोगर्स वो उस वक़्त किस मनोस्थिति से गुजर रहा है वाही उसके लेख में आयेगा ..जाहिर है उसकी अलग अलग पोस्ट उसका अलग अलग व्यवहार दिखायेगी ?सच कहूँ तो क्या आप भी ओर दूसरी बहसों में हिस्सा नही ले पाये होंगे .हर व्यक्ति ने यहाँ अपनी अपनी त्रासदी चुन ली है…ओर कई ने बाँट भी ली है ..लोग अपनी निजी त्र्सदियो से बाहर नही झांकते है ,महतवपूर्ण ये नही की हम असहमतिया व्यक्त न करे ,महत्त्व पूर्ण ये है की उन्हें हम साथ लेकर न चले ….उन्हें ढोये नही .
मुझे ऐसा क्यों लगता है कि हिंदी ब्लोगरस को देखकर कहूँ…
” जब रोम जल रहा था निरो चैन की बंसी बजा रहा था “
सत्य वचन महामहिम, बस राहत यही है कि, बंसी की यह तान
ब्लागर अधिनियम के तहत छोटी पोस्ट पर ही विश्राम ले लेती है,
अन्यथा यह तान अब तक असह्य हो चुकी होती..
” जब रोम जल रहा था निरो चैन की बंसी बजा रहा था “
पर अधिकाधिक टिप्पणी कैसे प्राप्त करें, पाठक कैसे बटोरें
ऎडसेन्स से कमाई कैसे हो सकती है इत्यादि इत्यादि ही..
यहाँ की ज्वलंत चिन्तायें एवं प्रचलित सरोकार हैं
>हिन्दी ब्लागिंग मानो केवल आत्मरति के स्वस्खलन सुख तक ही सीमित रह गयी है
जबकि अधिकांश ब्लागर प्रौढ़ एवं जिम्मेदार शहरी होने का गौरव रखते हैं
मैं कल से आपकी पोस्ट पर आने वाली प्रतिक्रियायें निरख रहा हूँ
हो सकता है कि, यह टिप्पणी इस पोस्ट के अनुकूल न लग रही हो
पर क्या करूँ, लीक से हट कर चलने की आदत पड़ गयी है
आप इसका अन्यथा भी ले सकते हैं, तरुण भाई
पर वह मुझे स्वीकार्य होगा
मैं लावण्या जी की बात से सहमत, उस सरपंच को सजा देने की बात कोई क्युं नहीं करता, उसे भी नंगा घुमाना चाहिए था। अनूप जी की एक बात तो सही है कि आप के पास विचार कितने भी अच्छे हों सही प्रस्तुतिकरण नहीं तो कुछ भी नहीं हो पाता