अपने अपने आकाश के पंछी
आजादी से पहले हो या बाद में आकाश वो ही है, बँटा हुआ हम में तुम में, जैसे कुँए का मेढक एक कुँए से दूसरे में नही जा सकता कुछ वैसे ही उड़ते रहते हैं अपने अपने आकाश में ये पंछी।
ये एक स्कूल है, प्राइमरी यहाँ से बच्चे शुरूआत करते हैं उड़ने की, एक नये सफर की

ये भी एक स्कूल है, प्राइमरी यहाँ से भी बच्चे शुरूआत करते हैं उड़ने की, एक नये सफर की
बस शायद फर्क यही है, दोनों का आकाश अलग अलग है और ये सीख रहे हैं उड़ना अपने अपने आकाश में। हम और तुम भी तो शायद यही करते हैं, उड़ते रहते हैं अपने अपने आकाश में, लेकिन कुछ लोग हैं जो इन सीमाओं को नही मानते और सीमा तोड़ के जा उड़ते हैं दूसरे आकाश में जरूरतमंदों की मदद को, घायलों को फिर से उड़ने लायक बनाने। मैं भी चाहूँगा कि एक दिन ऐसे ही उड़ूँ, खुले आकाश में बगैर किसी सीमा के लेकिन तब तक ये मुट्ठीभर आकाश ही मेरा है, मैं उस ओर देख तो सकता हूँ लेकिन जा नही सकता, ये मत पूछना क्यों अभी जवाब नही है मेरे पास…




परिंदे की परवाज को कब तक कौन थामेगा -एक दिन तो वह उड़ ही चलेगा ! शुभकामनाएं !
भाई तरुण जी आपकी सोच बड़ी उंची है ! ईश्वर आपकी इस उड़ान में हर सम्भव मदद करेगा ! आप बहुत ऊँचे उडे और अपने इरादों में कामयाब हों यही शुभकामना हैं !
जिन्होंने छूना है आसमान वह कब सीमाओं में बंध पाये हैं …बस दिल में इरादे नेक और पक्के होने चाहिए
ye dusra school askot ke paas hai na sirf Tin ke 2 sheds wala, mene aapke Uttaranchal wale blog me shayad dekha tha. Too bad & tough for those kids.
Jaroor aap ek din apne chahat ke aakash me udenge .
कौन कहता है कि आकाश में सूराख हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो
सीमाएं हम इंसानों ने बने है… हम ही उसे तोड़ सकते हैं.
बहुत बढिया लिखा है। काश! ऐसा आकाश सभी पा सकें। जो सीमाऒ के बधंन से मुक्त हो।……..
मैं तो दूसरे वाले आसमान से आया हूं। उड़ना बहुत सीखा। तब भी यदा कदा लगता है अगर पहले वाला आसमान मिला होता तो न जाने कितनी अच्छी उड़ान भर पाता।
अच्छा है। हर आकाश की अपनी अहमियत होती है। जो आकाश मिला उसमें जितना हो सके उड़ना चाहिये। कुछ लोग अपने लिये समुचित आकाश न मिलने का रोना जिंदगी भर रोते हैं और पंख तक नहीं फ़ड़फ़ड़ाते।
bahut achcha tarun bhai….kayee baar ashmaan ki parchai bhi zameen ko hara kar deti hai….aur kayee baar hari zameen ko khula aasman sukha deta hai…dono hi pahlu hain….kahin sukhe se harapan ubharta hai aur kahin hara bhi sukhe kaante deta hai………kathin dagar se gujar kar udana hi udaan kahlaati hai….baki to jsss yatra hai
Isme to school ka picture kahin dikh nahi raha hai…. एक स्कूल है, प्राइमरी - isme school ka picture kahan hai??
Sab equality ki baat karte hein…Yahan kisi ko inequality kyun nahi nazar aati? Derasal jo equality ki baat karte hein uske hi aas - paas parivesh or so called modern samaz mein sabse jyada inequality paya jata hai! Compare to big city hamare gaon mein ye fir bhi kam paya jata hai.
Ab ye dekhiye yahan bhi equality ki demand hai… http://rewa.wordpress.com/2008/09/24/some-ulajhta-se-some-sulajhta/
Anyway, her koi chahta hai mutthi bhar aasman…!
@रेवा जो वो टिन देख रही हैं बच्चों के पीछे बस वो ही है स्कूल की बिल्डिंग या कह लीजिये स्कूल